
— राजकुमार सिन्हा —
आज के जमाने में डिजिटल उपकरण लाख दुखों की एक दवा के दर्जे पर काबिज हो गए हैं, लेकिन क्या ये सचमुच इतने निरापद हैं? दूसरी तरफ, क्या पारंपरिक कागज के उपयोग ने हमारे पर्यावरण को नेस्तनाबूद नहीं किया है? ऐसे में दोनों तौर-तरीकों को जरूरत और प्रासंगिकता के आधार पर उपयोग किया जाए तो कैसा हो? प्रस्तुत है, इसी की पड़ताल करता राजकुमार सिन्हा का यह लेख।
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पेपरलेस व्यवस्था ने कागज की जरूरत घटाई है, लेकिन ‘डेटा सेंटरों का पर्यावरणीय प्रभाव बढ़ा दिया है। दशकों तक दुनिया भर में ‘कागज-रहित’ होने के अभियान को पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। दावा था कि इससे पेड़ बचेंगे और कचरा कम होगा, लेकिन अब यही दुनिया को नष्ट कर रहा है। पर्यावरण पर डिजिटल प्रौद्योगिकी के वास्तविक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट और उसका सहायक सिस्टम दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग एक अरब टन ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का उत्सर्जन करता है। ई-मेल कागज की खपत कम करता है, लेकिन ‘बेटा सेंटर’ पानी की खपत करता है, हवा को गर्म करता है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव डालता है। आधुनिक डेटा सेंटर’ स्टील और कंक्रीट से बना विशाल परिसर है, जिनमें हमारे क्लाउड स्टोरेज, स्ट्रीमिंग सेवाओं और कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) को चलाने वाले सर्वर रखे जाते हैं। ये धरती की सबसे अधिक संसाधन खपत वाली सुविधाओं में शामिल हो गया है। हजारों शक्तिशाली सर्वरों को अत्यधिक गर्म होने से बचाने के लिए इन केंद्रों में बड़े पैमाने पर शीतलन प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है, जो भारी मात्रा में पानी और ऊर्जा की खपत करती हैं। इस तरह एक पर्यावरणीय लागत को दूसरी पर्यावरणीय लागत से बदल दिया गया है।
इंटरनेट, ई-मेल और क्लाउड स्टोरेज को चलाने के लिए बड़े ‘डेटा सेंटर’ दिन-रात काम करते हैं। इन सेंटरों में भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है, जो अक्सर कोयले या अन्य जीवाश्म इंधन से बनती है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने और ‘डेटा सेंटरों’ को ठंडा रखने के एयर कंडीशनरों से भी ‘ग्रीनहाउस गैसें निकलती है। इससे पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ता है। डिजिटल डिवाइस की बैटरी और चिप्स के लिए लिधियम, कोबाल्ट और सोना जैसे खनिज निकाले जाते हैं। इस खनन से जंगल नष्ट होते हैं, जैव-विविधता खत्म होती है और स्थानीय जलस्रोत प्रदूषित होते हैं। अध्ययनों के अनुसार, किसी बड़ी ‘पीडीएफ फाइल को इंटरनेट या ई-मेल से बार-बार डाउनलोड करके पढ़ना, उसे एक बार प्रिंट करवाकर पढ़ने से अधिक बिजली खाता है।
सर्टिफिकेट, जमीन के कागज जैसे दस्तावेजों को जीवन भर सुरक्षित रखना है और साल में एकाध बार ही देखना है, तो उन्हें कागज पर रखना बेहतर है। वे बिना बिजली खाए सार्ता सुरक्षित रह सकते हैं। रोजाना छपने वाले अखबारों की तुलना में ‘डिजिटल न्यूज ऐप’ का कार्बन फुटप्रिंट लंबे समय में कम बैठता है। यदि कोई व्यक्ति साल में केवल 2-3 किताबें पढ़ता है, तो टैबलेट या ई-रीडर बनाने में हुआ कार्बन उत्सर्जन (करीब 100-200 किलो कार्बन डाइऑक्साइड) कागजी किताबों के मुकाबले पर्यावरण को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। कार्यालयों की ऐसी फाइलें या डेटा जिन्हें बार-बार बदलना पड़ता है, डिजिटल रखना बेहतर है। कागज को 5 से 7 बार रीसायकल किया जा सकता है, परन्तु ई-कचरे का एक बड़ा हिस्सा रीसायकल नहीं हो पाता और जहरीला प्रदूषण फैलाता है।
डिजिटल दुनिया की छिपी पर्यावरणीय कीमत से ‘भारहीन’ डिजिटल दुनिया का भम अब टूट चुका है और हमें पर्यावरणीय स्थिरता के वास्तविक अर्थ में गंभीरता से पुनर्विचार करना आवश्यक है। डिजिटल प्रदूषण पर अभी तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन यह जल्द ही ‘एकल उपयोग प्लास्टिक जैसी गंभीर समस्या बन सकता है। डिजिटल तकनीक की पर्यावरणीय लागत केवल बिजली तक सीमित नहीं है। उसका वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव उसके पूरे जीवन-चक्र में छिपा होता है, खनिजों के खनन से लेकर उपकरणों के निर्माण, वैश्विक परिवहन, नेटवर्क संचालन, ‘डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की खपत तथा अंत में ई-कचरे के निपटान तक।
यह कहना कि डिजिटल है, इसलिए पर्यावरण के अनुकूल है, अधूरा निष्कर्ष होगा। विशेष रूप से ‘एआई,’ वीडियो स्ट्रीमिंग, क्लाउड स्टोरेज और लगातार बढ़ते डिजिटल डेटा के कारण ‘डेटा सेंटरों की मांग तेजी से बढ़ रही है। एक फोटो, वीडियो, ई-मेल या दस्तावेज को डिजिटल रूप में रखना भले ही भौतिक रूप से दिखाई नहीं देता, लेकिन उसे सर्वर पर सुरक्षित रखने के लिए लगातार ऊर्जा, स्टोरेज क्षमता और नेटवर्क संसाधनों की आवश्यकता होती है। डिजिटल दुनिया में डिलीट किया गया डेटा भी हर बार तुरंत और पूरी तरह समाप्त हो जाए, यह जरूरी नहीं है, बैकअप और विभिन्न सर्वरों पर प्रतियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
दूसरी ओर, कागज का पर्यावरणीय प्रभाव भी वास्तविक है। पेड़ों की कटाई, कागज निर्माण में पानी और ऊर्जा की खपत, रसायनों का इस्तेमाल, परिवहन तथा कागज के कचरे का निपटान इसकी पर्यावरणीय लागत बढ़ाते हैं। इसलिए सवाल यह नहीं है कि कागज पूरी तरह खराब है या डिजिटल तकनीक पूरी तरह अच्छी है। वास्तविक सवाल यह है कि किस काम के लिए कौन-सा माध्यम कम पर्यावरणीय नुकसान करता है।
जिन दस्तावेजों को बार-बार संशोधित, साझा या इस्तेमाल किया जाता है, वहां डिजिटल माध्यम कागज की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाले महत्वपूर्ण दस्तावेजर्जी, सीमित उपयोग वाली सामग्री और ऐसे रिकॉर्ड जिन्हें वर्षों तक केवल कभी-कभार देखना है, उनके लिए भौतिक प्रति रखना कई परिस्थितियों में अधिक टिकाऊ हो सकता है।
किताबों के मामले में भी उपयोग की मात्रा महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति बहुत अधिक किताबें पढ़ता है, उसके लिए एक ई-रीडर कई मुद्रित पुस्तकों की जगह लेकर पर्यावरणीय प्रभाव को कम कर सकता है, लेकिन यदि कोई उपकरण केवल कुछ किताबें पढ़ने के लिए खरीदा जाता है और उसका निर्माण, ऊर्जा उपयोग तथा अंततः ई-कचरा बनने की लागत जोड़ दी जाए, तो तस्वीर बदल सकती है। इसलिए ‘पेपरलेस’ के बजाय हमें ‘रिसोर्स-लेस’ या संसाधन-कुशल सोच की जरूरत है, जहां किसी माध्यम को केवल आधुनिक या सुविधाजनक होने के कारण नहीं, बल्कि उसके पूरे पर्यावरणीय जीवन-चक्र को देखकर चुना जाए।
भौतिक और डिजिटल कचरे में एक महत्वपूर्ण अंतर है। जब पर्यावरण में कचरा होता है, तो हम उसे एक समस्या के रूप में देखते हैं, लेकिन डिजिटल कचरे को ऐसे नहीं देखते और प्रकृति पर इसके प्रभाव के प्रति
विशेष रूप से अनभिज्ञ हैं। परिणामस्वरूप, डिजिटल कचरा भौतिक कचरे की तुलना में कहीं अधिक तेजी से उत्पन्न हो रहा है। अनावश्यक ई-मेल, बार-बार भेजी गई बड़ी फाइलें, बेकार क्लाउड बैकअप, अनावश्यक वीडियो, लगातार स्ट्रीमिंग और कुछ समय बाद बदल दिए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस अदृश्य कचरे को बढ़ाते हैं।
अब समय आ गया है कि ‘पेपरलेस’ के साथ-साथ ‘लो-कार्बन डिजिटल’, ‘कम डेटा’, ‘कम ई-कचरा, उपकरणों की लंबी उम, मरम्मत, पुनःउपयोग और जिम्मेदार रीसाइक्लिंग को भी पर्यावरण नीति का हिस्सा बनाया जाए। सच्ची पर्यावरणीय स्थिरता का अर्थ केवल पेड़ बचाने के लिए कागज कम करना नहीं है। इसका अर्थ है, पानी, ऊर्जा, खनिज, भूमि, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले पूरे प्रभाव को समझकर संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग।
इसके लिए दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करके हम अपने डिजिटल कार्बन फुटप्रिंट को कम कर सकते हैं। फालतू के ई-मेल और स्पैम मैसेज डेटा सेंटर्स में जगह घेरते हैं। इन-बॉक्स साफ रखने से सर्वर पर लोड कम होता है। जिन न्यूजलेटर या प्रमोशनल ई-मेल को आप नहीं पढ़ते, उन्हें अन-सब्सक्राइब कर दें। ईमेल में भारी फाइलें भेजने के बजाय क्लाउड लिंक जैसे गूगल ड्राइव या वन ड्राइव का लिंक शेयर करें। यूट्यूब, फेसबुक या इंस्टाग्राम पर वीडियो का आटो-प्ले फीचर बंद कर दें, ताकि बिना जरूरत वीडियो न चले। एक स्मार्टफोन बनाने में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है। अपने फोन या लैपटॉप को कम-से-कम 3 से 4 साल तक इस्तेमाल करें। अब जरूरत केवल पेपरलेस समाज की नहीं, बल्कि पर्यावरण-सम्मत और संसाधन-कुशल समाज बनाने की है। (सप्रेस)
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