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जनता पार्टी के बाद के दौर को समझने के लिए एक जरूरी गवाही

by Rajendra Rajan
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— डॉ. सुरेश खैरनार —

यप्रकाश नारायण के आंदोलन के पहले अस्सी के दशक की शुरुआत में ही तरुण शांति सेना नाम से एक संगठन जेपी की पहल पर शुरू हुआ था, जिसमें  भारत के विभिन्न प्रदेशों के युवाओं ने सबसे पहले भागीदारी की थी और वर्तमान शिक्षा के निषेध-स्वरूप कुछ युवक-युवतियों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी।

बाद में बिहार आंदोलन के लिए गैरदलीय संगठन  छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की स्थापना जेपी की पहल पर हुई  थी। उसके बावजूद कुछ  युवाओं ने संसदीय लोकतंत्र का रास्ता अपनाय! कुछ युवा स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने लगे, और अन्य युवा पत्रकारिता तथा दूसरी नौकरियों मे लग गये।

संतोष भारतीय पहले पत्रकार फिर संसदीय क्षेत्र और पुनः पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उनकी वीपी सिंह, चंद्रशेखरसोनिया गांधी और मैं शीर्षक से एक भारी-भरकम और जबरदस्त गेटअप वाली, पौने पांच सौ पृष्ठों की किताब मेरे हाथ लगी। और किताब की विषयवस्तु- जनता पार्टी के बाद भारत की संसदीय राजनीति का विश्लेषण- विलक्षण आपाधापी का समय का होने के कारण और इस दौरान खुद मैं उम्र के तीस साल के पड़ाव में होने के कारण मेरी उत्सुकता की विषयवस्तु रही है। इसीलिए किताब दो बार में पढ़ने के बाद तुरंत प्रतिक्रिया लिखने बैठ गया।

यह कुल मिलाकर पंद्रह-बीस साल की भारत की संसदीय राजनीति का दस्तावेज भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। और कुछ हदतक वीपी सिंह और चंद्रशेखर, इन दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के चरित्र पर रोशनी डालने का काम मुझे ज्यादा  नजर आ रहा है। हालांकि पूरी जीवनी तो नहीं है, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की जीवनी कहाँ जाए तो बेहतर होगा।

संतोष भारतीय

संतोष जी की पत्रकारिता की शुरुआत कलकत्ता से आनंद बाजार प्रकाशन समूह की तरफ से पहली बार हिंदी में रविवार नाम की पत्रिका से हुई। अभी वह चौथी दुनिया पत्रिका के संस्थापक-संपादक हैं। पहले जेपी आंदोलन में शामिल होने के कारण जेपी की वजह से उनका चंद्रशेखर जी से परिचय हुआ, और वीपी सिंह जी से पत्रकार के नाते परिचय जरूर हुआ लगता है लेकिन वह उनके काफी विश्वासपात्र बन गये थे ! और उन्हीं की वजह से फर्रूखाबाद सीट से वह  1989 में लोकसभा के लिए चुने गये थे।

एक तरह से 1977 के बाद भारत की संसदीय राजनीति का दौर काफी उठापटक का दौर रहा है! जिसके साक्षी संतोष जी पहले पत्रकार फिर संसद सदस्य के रूप में रहने के कारण,  इस दरम्यान के कई-कई महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गवाह रहे हैं। इसलिए उन्होंने प्रसंगों और घटनाओं का जो खाका खींचा है उसकी विश्वसनीयता अपनी जगह है। और इसीलिए वर्तमान पीढ़ी जो कुछ अस्सी के बाद, कुछ नब्बे के बाद और कुछ इक्कीसवीं सदी में पैदा हुए, और यह सभी लोग आज भारत के मतदाता हैं, उनके लिए यह जानकारी बहुत उपयोगी है। हालांकि हमारे संपूर्ण इतिहास के बारे मे ही जानकारी जरूरी है! लेकिन आजादी के बाद भारत की संसदीय राजनीति का इतिहास ज्यादा महत्त्वपूर्ण है  क्योंकि कोई कुछ भी कोशिश करे भारत की संसदीय राजनीति बदस्तूर जारी रहेगी।

अगर संतोष जी की भाषा में ही कहूँ तो चंद्रशेखर, वीपी सिंह और सोनिया गाँधी से जुड़ी यादें सिर्फ यादें नहीं हैं वे भारत के उस राजनीतिक कालखंड का दस्तावेज हैं जो सबसे ज्यादा हलचल भरे रहे हैं ! यह राजनीतिक इतिहास का वह हिस्सा है जिसकी घटनाएं छुपी रहीं, लोगों की नजरों में आयीं ही नहीं! जबकि इसका रिश्ता राजीव गाँधी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर और सोनिया गाँधी से सीधा रहा है, और यह सिलसिला मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर खत्म होता है।

हालाँकि एक पाठक के रूप में, मेरी नजर में, वह खत्म नहीं हुआ, उलटे  एक संकट का दौर शुरू हुआ, और इसके लिए 1977 से ही नींव डालने का काम शुरू हुआ था, जिसका प्रतिफल वर्तमान सांप्रदायिकता के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति है। पिछले सभी घटनाक्रम के परिणामस्वरूप आज की स्थिति बनी हुई है ऐसी मेरी मान्यता है। लेखक क्यों यह छोड़ कर सिर्फ उन पिछले  पच्चीस-तीस साल तक आकर रुक गए? बेहतर होता और बीस-पच्चीस पन्ने खर्च कर वर्तमान स्थिति तक लाने की कोशिश की गयी होती। खैर, उनके अपने कारण वह जानते होंगे, और एक लेखक के नाते उन्हें वह अधिकार भी है!

मेरी नजर में वीपी सिंह और राजीव गाँधी की अनबन, यह वीपी सिंह की राजनीति का निर्णायक मोड़ है। राजीव गांधी के करीब के लोगों में मुख्यतः अरुण नेहरू ने यह काम किया, फिर वही आदमी वीपी सिंह की टीम में शामिल होकर उस टीम का सबसे महत्त्वपूर्ण सदस्य बना! और वीपी सिंह को यह सब पता नहीं था? यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है कि सरकार को एक साल पूरे होने के पहले ही हटाने के लिए जिम्मेदार लोगों में अरुण नेहरू भी दिखायी देते हैं ! और यह सबकुछ वीपी सिंह जैसे पर्याप्त होशियार राजनेता को भी नहीं समझ में आया यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है।

जनमोर्चा की 2 अक्टूबर 1987 को घोषणा हुई हुई थी! यह संगठन वीपी सिंह ने  अरुण नेहरू, रामधन, आरिफ मोहम्मद ख़ान और विद्याचरण शुक्ल के साथ मिलकर बनाया और जनमोर्चा बनने के पीछे के कारणों को भारतीय राजनीति की कमजोरीयों का दस्तावेज माना जा सकता है! (यह किताब के अध्याय 14 पृ. 114 का उद्धरण है) जनमोर्चा बनने का समय और 1975 और एक दशक पहले अण्णा हजारे के नाम पर जो आंदोलन हुआ जिसमें से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ, इसमें एक मौलिक फर्क यह दिखायी देता है कि वीपी सिंह ने सिर्फ अपनी व्यक्तिगत छवि को प्रोजेक्ट किया, कैडर बनाना तो दूर, उन्होंने कहा कि हवा बनाओ कैडर की जरूरत नहीं है ! जबकि आम आदमी पार्टी के लोगों ने जगह-जगह अपने कैडर बनाना उतना ही अहम माना जितना माहौल बनाना! आज आम आदमी पार्टी दिल्ली में दूसरी बार सरकार है तो उसका यही राज़ है। और शुरुआत में ही जो लोग उनके हिसाब से बेकाम के लगे उन्हें दूध में की मक्खी की तरह उठाकर फेंका और वे लोग कुछ भी नहीं कर सके! क्योंकि वे भी हवा की थियरी वाले थे ! सिर्फ कसमसाकर रह गये और अब स्वराज इंडिया नाम से कुछ कोशिश कर रहे हैं।

आजादी के बाद भारत की संसदीय राजनीति के सफर में से संतोष जी ने एक विशिष्ट कालखंड को चुना, शायद वह उस समय उसके खुद एक कारक तत्व होने के कारण उन्होंने अपनी आँखों देखी और कानों सुनी बातों को पौने पांच सौ पन्नों में दर्ज किया है। शैली पाठक को बांधकर रखनेवाली है! और रहस्यकथा की तरह आगे क्या, की उत्सुकता बनी रहती है। और शायद ही कोई ऐसे पाठक होंगे, जो इसे पूरा नहीं पढ़ेंगे!

महात्मा गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में संसद को गणिका की उपमा दी है! और यह किताब पढ़ते हुए जगह-जगह पर उस उपमा की याद आती है ! लेखक ने पृ. 217 पर ‘अव्यवस्थित सरकार अव्यवस्थित दल’ शीर्षक से बताया है कि वीपी सिंह अकसर कुछ फैसले बदल दिया करते थे! मेरे पास एक जानकारी आयी और मुझे लगा कि प्रधानमंत्री को बताना चाहिए। जानकारी यह थी कि एक मंत्री ने 15 फीसद कमीशन की मांग की थी और माँग प्रधानमंत्री के नाम पर हुई थी!

उन दिनों भारत सरकार कोशिश करती थी कि बार्टर के सिद्धांत पर विदेशों से सामान मंगवाया जाए। मेरे पास एक कॉरपोरेशन के चेयरमैन आए, और उन्होंने मुझसे कहा, किसी भी विदेशी सौदे में 10 फीसद ईमानदारी का कमीशन होता है जो मंत्री के पास जाता है। परेशानी तब होती है जब इससे ज्यादा की मांग होती है ! इस बार प्रधानमंत्री के नाम पर 5 फीसद ज्यादा माँग रहा है ! मैंने प्रधानमंत्री वीपी सिंह को बताया तो उन्होंने चेयरमैन का नाम पूछा, मैंने बता दिया। उन्होंने फोन उठाया और कैबिनेट सेक्रेटरी से कहा कि इस अफसर के खिलाफ सीबीआई जांच बैठाइए, यह अफवाह फैला रहा है! मैं चौंक गया और बुरा भी लगा!

मैंने फौरन प्रतिवाद किया, आप करवाइए सीबीआई जाँच लेकिन इसके बाद कोई भी भ्रष्टाचार की जानकारी नहीं देगा! यह कहकर मैं उठ गया। 45 मिनट बाद वीपी सिंह का बुलावा आया। मुझसे बोले, मैं कैबिनेट सेक्रेटरी से तुरंत मिलूं। मैं कैबिनेट सेक्रेटरी के पास गया। वे मुस्कुरा रहे थे, पूछा क्या बात है ? मैंने सारी बात बतायी और कहा कि आपने सीबीआई जांच का आदेश दे दिया होगा? वे बोले नहीं दिया! मैं एक घंटे इंतजार करता हूँ , क्योंकि मुझे मालूम है कि वह फैसले बदल दिया करते हैं! और ठीक चालीस मिनट बाद पीएम का फोन आया कि संतोष जैसा कहे वैसा कीजिए। मुझे विनोद पांडे हसते हुए कहने लगे, मंत्री का नाम सही है, लेकिन कुछ नहीं कर सकते!

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वीपी सिंह और राजीव गांधी के दरम्यान फासला बढ़ा, लेकिन वीपी सिंह की सरकार को देखिए तो क्या फर्क नजर आता है? हम्माम में सभी नंगे होते हैं वाली कहावत याद आ रही है! शायद राजीव गाँधी भी व्यक्तिगत रूप से मिस्टर क्लीन की इमेज वाले थे, और वी पी सिंह भी!

हालांकि मिली-जुली सरकार की कुछ मजबूरियाँ होती हैं! उदाहरण के लिए, जनता पार्टी की सरकार मे उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने भारत से पेप्सी और कोका-कोला को निकाल बाहर किया था! और आई.के. गुजराल के प्रधानमंत्रित्व-काल में अकाली दल का समर्थन होने की वजह से और सिखों के अमेरिकी-कनाडियन कनेक्शन की वजह से गुजराल सरकार को समर्थन देने की एक शर्त थी, वापस पेप्सिको भारत में आने दो, और इस तरह दोबारा यह शीतलपेय भारत वापस आया! उसी तरह, भारतीय उद्योगपतियों का हर सत्ताधारी दल के ऊपर दबाव रहता है, और हर उद्योग घराने का एक आदमी दिल्ली में सिर्फ विभिन्न मंत्रालयों से अपनी कंपनियों के काम निपटाने के लिए विशेष रूप से लायजन अफसर की हैसियत से होता है! और उसका काम सरकार में बैठे संबंधित लोगों को कमीशन देकर अपनी कंपनी का काम निकालना होता है!

वीपी सिंह ने राजीव गांधी के समय वित्तमंत्री रहते हुए अंबानी की नकेल कसने की शुरुआत की! शायद उसी कारण राजीव गांधी ने उन्हें न सिर्फ उद्योग मंत्री के पद से हटाया, कांग्रेस  से भी निकाल बाहर किया था! और उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप वीपी सिंह के अंदर का बगावती विश्वनाथ जगा! और ग्यारह महीनों के लिए ही सही, राजीव गांधी की जगह प्रधानमंत्री बनने का चमत्कार उन्होंने कर दिखाया! उन ग्यारह महीनों में और क्या काम किया? पर वह इतिहास में डॉ राममनोहर लोहिया के सौ में पिछड़ा पावे साठ नीति के अंतर्गत मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए हमेशा याद किये जाएंगे ! और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी जी को गिरफ्तार करने की इजाजत दी, हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी यह करने की कोशिश की थी, पर रथयात्रा के रास्ते में पहले बिहार आया तो लालू प्रसाद यादव को अडवाणी जी को रोकने का श्रेय मिला!

वीपी सिंह शायद पहले पूर्व प्रधानमंत्री होंगे, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद झुग्गीवासियों और किसानों के लिए आंदोलन किये। लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए किसानों के लिए सिर्फ शरद जोशी को फसल के दाम तय करने का जिम्मा दिया था, पर जोशीजी ने क्या किया पता ही नहीं चला!

प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद वीपी सिंह ने मुंबई में जो अनशन किया, जिसमें उन्होंने पानी तक नहीं ग्रहण किया था, उसी के कारण उनकी किडनी खराब हो गयी, और उनका अंत उसी कारण हुआ! लेकिन एक दिन डायलिसिस और दूसरे दिन आंदोलन में जाते रहे! ऐसे प्रधानमंत्री दूसरे नहीं दिखायी दे रहे!

संतोष भारतीय जी की नजदीकी और एक पूर्व प्रधानमंत्री के साथ रही, वह थे चंद्रशेखर, और उनके संबंध में  भी इस किताब में काफी कुछ बातें लिखी हैं! मेरी ही तरह चंद्रशेखर कश्मीर समस्या को देखते थे, यह संतोष जी की किताब से ही ज्ञात हुआ। इसलिए मैं उस बात को लिखने का मोह छोड़ नहीं सकता!

प्रधानमंत्री की शपथ लेकर चंद्रशेखर जी को सीधे सार्क देशों की बैठक में जाना पड़ा। पहला भाषण नवाज़ शरीफ़ का हुआ, और बाद में चंद्रशेखर जी का। नवाज़ शरीफ़ अपनी जगह से उठकर चंद्रशेखर जी की तरफ आने लगे, तो चंद्रशेखर भी उनकी तरफ चलकर उन्हें गले लगाते हुए प्रेम से बोले कि आप बहुत बदमाश हो! तो नवाज शरीफ ने कहा कि आप हमें कश्मीर दे दीजिए, तो चंद्रशेखर जी ने एक क्षण सोचकर बोला  कि दे दिया। तो नवाज शरीफ बगल के एक कमरे में चंद्रशेखर जी को लेकर गये और कहने लगे अब बताइए यह कैसे किया जाए? तो चंद्रशेखर बोले कि सिर्फ एक शर्त है। कश्मीर के साथ-साथ भारत के पंद्रह-बीस करोड़ मुसलमान भी लेकर जाने की शर्त है! क्योंकि इतने बड़ी जनसंख्या को सुरक्षित रखने के लिए हमारे पास इतनी सेना या पुलिस नहीं है। वैसे कश्मीर को सँभालने के लिए भारत को काफी कीमत चुकानी पड़ती है! लेकिन क्या कर सकते हैं? भारत के मुसलमानों को सुरक्षित रखने के लिए यह सब करना पड़ता है। यह सुनकर नवाज़ शरीफ़ हक्का-बक्का होकर कुछ और बातें करने लगे।

किताब का अंतिम भाग सोनिया गांधी के संदर्भ में है। संतोष जी की किताब से ही ज्ञात हुआ अभिताभ बच्चन और गांधी परिवार के बीच बढ़ती दूरी, और सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने  के लिए वीपी सिंह और चंद्रशेखर दो पूर्व प्रधानमंत्रियों के प्रयास देखकर (जो कि उनके दोनों बच्चे, राहुल और प्रियंका के कारण, उन्होंने खुद न बनकर मनमोहन सिंह को बनाया वह बात दीगर है) आश्चर्य होता है!

हालांकि सांप्रदायिक राजनीति को रोकने के लिए यह प्रयास सराहनीय था, पर सांप्रदायिक राजनीति करनेवाले लोगों को लेकर भी चंद्रशेखर, वीपी सिंह ने राजनीतिक सफर किया है ! और सबसे अहम बात 1989 के अक्टूबर से भागलपुर में हुआ दंगा, राजीव गांधी के समय में हुआ! उसके बाद तुरंत वीपी सिंह की सरकार आयी, और साल भर के अंदर चंद्रशेखर जी की सरकार ! भागलपुर दंगे के बाद के तीनों प्रधानमंत्रियों ने भागलपुर की भेंट दी है! फिर तीन साल बाद बाबरी विध्वंस! देश भर में दंगे, मुंबई में सबसे भीषण ! और दस साल बाद गुजरात में शत-प्रतिशत राज्य सरकार की शह से हुआ दंगा देखकर भी सांप्रदायिक राजनीति को समझने में दोनों की कमजोरी दिखती है!

और उस कांड के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के जिम्मेदार रहते हुए भी ये लोग उनके खिलाफ कुछ खास नहीं कर सके। और आज वह चौवालीस इंची छाती फुलाकर छप्पन इंची बनाकर देश के सर्वोच्च शिखर पर बैठे  संपूर्ण देश की छाती पर मूंग दल रहे  हैं!

चंद्रशेखर जी और इस किताब के लेखक की संघ को लेकर हुई चर्चा में चंद्रशेखर संघ को लेकर कितना ‘अंडर एस्टिमेट’ करते हुए दिखते हैं ! मैं बहुत हैरान हूँ कि अपने जीवनकाल में गांधी की हत्या से लेकर समय-समय के दंगे और बाबरी-जन्मभूमि के मुद्दे के बाद भी संघ का सही-सही आकलन चंद्रशेखर जी क्यों नहीं कर पाये? सचमुच संघ का आकलन नहीं कर पाये या यह भी डिप्लोमेटिक जवाब था! लेकिन यह  संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के लिए कितना नुकसानदेह साबित हो रहा है ? और यह नुकसान सदियों के लिए हो सकता है!

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