राजनीति

अपने-अपने हिस्से का समाजवाद

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— जयराम शुक्ल — गांधी और समाजवाद ये दो ऐसे मसले हैं कि हर राजनीतिक दल अपने ब्रांडिंग के रैपर में चिपकाए रखना चाहता है। पर वास्तविकता यह है कि जैसे गांधी की तस्वीर वाले...

उत्तर प्रदेश बन गया है कुशासन की मिसाल

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भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के वादे पर सत्ता में आयी थी, लेकिन उसने इसे जंगलराज में बदल दिया है। इस बात को महज राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं किया...

लहू बोलता भी है

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— प्रोफ़ेसर राजकुमार जैन — सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी की किताब का टाइटल ‘लहू बोलता भी है’ पढ़कर शुरू में अटपटा सा लगा, क्‍योंकि लहू खौलता है, लहू बहता है, लहू के निशान हैं, वगैरहा-वगैरहा के जुमले तो अक्‍सर सुनने और...

गांधीवादी संस्थाओं पर गिद्ध-दृष्टि

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— जागृति राही — गांधी विचार की संस्थाओं, आश्रमों में घुसपैठ और उन पर कब्जे की कोशिश बीजेपी की सरकारें और संघ के समर्थक लगातार करते आ रहे हैं। वाराणासी में राजघाट स्थित गांधी विद्या...

लोकजनशक्ति पार्टी का बिखराब क्यों

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— डॉ. अनिल ठाकुर — आजकल बिहार की राजनीति में भूचाल सा आया हुआ है। बिहार की धरती आरंभ से ही राजनीतिक आंदोलन की उर्वरा धरती रही है, वो गांधी का चंपारण आंदोलन हो या...

जब जेपी की हुंकार से सिंहासन हिल उठा

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— जयराम शुक्ल — कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ का नारा ‘इंदिरा इज इंडिया’ गली-कूचों तक गूँजने लगा। इसी बीच मध्यप्रदेश में पीसी सेठी को हटाकर श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाया गया। अखबारों की हालत...

बिहार आंदोलन के नारे

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(किसी भी आंदोलन की सबसे ऊर्जस्वी और संक्षिप्ततम अभिव्यक्ति नारों में होती है। नारे धीरे-धीरे उस आंदोलन की पहचान और प्रेरणा भी बन जाते हैं। लोक-स्मृति में रच-बस जाते हैं। किसी आंदोलन की आकांक्षा...

आपातकाल को भूल नहीं सकते

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— रामबाबू अग्रवाल — आजाद भारत के इतिहास में 25 जून की तारीख अहम है। इसी दिन यानी 25 जून 1975 को स्वतंत्र भारत के इतिहास का डेढ़ साल लंबा सबसे ज्यादा अलोकतांत्रिक दौर शुरू...

जाति कब टूटेगी

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— संजय कनोजिया — एक समय था जब दकियानूसी तथा पाखंड व अन्धविश्वास से सनी प्रथाओं के बारे में लोग कहते थे कि सती-प्रथा कभी खत्म न होगी, बाल विवाह की प्रथा अनंत काल तक...

‘राष्ट्र के नाम’ संदेश बनाम ‘राष्ट्र का’ संदेश

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— श्रवण गर्ग — जनता अपने प्रधानमंत्री से यह कहने का साहस नहीं जुटा पा रही है कि उसे उनसे भय लगता है। जनता उनसे उनके ‘मन की बात’, ‘उनके राष्ट्र के नाम संदेश’, चुनावी सभाओं...