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ऐसे थे लोहिया

by Rajendra Rajan
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— बृजमोहन तूफान —

लोहिया जी से मेरी मुलाकात 1946 में जेल से छूटने के बाद दिल्ली में हुई। हम कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के मेंबर थे। कोई जलसा था, डॉ. साहब भी वहां आये हुए थे। उन दिनों दो नेता, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया, सूरज की तरह चमक रहे थे। जयप्रकाश जी से मिलना जरा मुश्किल लगता, क्योंकि वह अलग रहते थे या उनके सोचने और रहन-सहन का ढंग दूसरा था। लेकिन डॉ. साहब हर आदमी से मिलते थे। मेरे जेल से छूटने के बाद वह मेरे घर आये। यह मेरे लिए गर्व की बात थी कि अखिल भारतीय स्तर का आंदोलनकारी नेता स्वयं मेरे घर आया। यहीं से हमारी दोस्ती बढ़ी। डॉ. साहब की एक खूबी थी कि वह छोटी उम्र के लड़कों को ढूंढ़ते थे क्योंकि वह मानते थे कि छोटे लड़कों पर सिद्धांत जल्दी हावी होते हैं।

उस समय देश में अंग्रेजी राज था। हम कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये और घर छोड़ दिया। हम जिन नेताओं के पास जाते थे उनमें से डॉ. लोहिया बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत करते थे। उनके पास बैठकर और उनसे बात करके हमें बहुत खुशी होती थी कि एक आदमी ऐसा है जो हर हालत में हमारा साथ देता है, हमारी कुछ मदद करता है।

समाजवाद के बारे में डॉ. साहब कुछ और ही कहा करते थे। जैसे पंजाब व कश्मीर की समस्या है। हिंदुस्तान का कोई नेता पंजाब व कश्मीर के बारे में राय देने को तैयार नहीं है। अगर डॉ. साहब होते, वहां एक मसला होता, पचासों राय देते। ऐसे करो, वैसे करो। उनकी राय में फर्क होता था। जैसा कि डॉ. साहब ने कहा था कि ‘हिमालय बचाओ’ तो वह उन्होंने चीन के बारे में नहीं कहा था। हिंदुस्तान के बारे में ‘हिमालय बचाओ’ की पुकार की थी। दूसरा, समाजवाद के बारे में उनका अपना तरीका था।

हम कोई जलसा करते और अगर उसमें केवल दस-पांच लोग ही आ पाते, जिसके कारण हम डॉ. साहब को जलसा रद्द करने की राय देते, तो वह यही कहते कि आठ आदमी क्या कम हैं, हमें एक आदमी मिल जाए तो वही काफी है।

उऩ दिनों समाजवादी दर्शन में भी यही मूल बात थी कि गरीब आदमी को कैसे उठाया जाए। मैं समझता हूं कि चौबीस घंटे वह यही चिंतन करते रहते थे कि कितने गरीब है, कहां-कहां गरीब हैं, और इसके लिए कहां-कहां, क्या-क्या हो।

उनका विचार यही था कि सारा समाज बराबर हो जाए। उन्होंने अपने 1955 के सोशलिस्ट पार्टी के विचार या चिंतन में पांच हजार साल की हिंदुस्तानी संस्कृति का भी जिक्र किया है। वह मानते थे कि समाज के अंदर ऊंच और नीच के भेदभाव का खत्म होना लाजिमी है। डॉ. साहब मानते थे कि औरतों, किसानों और छोटे लोगों (दलितों) को उठाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें एक और दस के बीच में लाया जाए, बल्कि उनमें एक जागृति लानी है ताकि वे अपना अधिकार मांगें और जहां से वे मांगना शुरू कर देंगे वहीं उनकी उन्नति होगी। बेरोजगारी की समस्या पर वह बड़े सुलझे हुए तरीके से विचार करते थे। उऩका मानना था कि जरूरत नौकरी पाने की नहीं, बल्कि नौकरी करने की है। वह (लैंड आर्मी) भूमि सेना की बात तो करते थे पर वह मानते थे कि इसका मतलब यह नहीं है कि वे लाल टोपी पहने सड़कों पर आएं। भूमि सेना का मतलब था कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के बीच दो नहरें, दो सड़कें बनायी जाएं जहां लोगों को कुछ न कुछ काम मिल सके।

एक बार मैंने उनसे सवाल किया था कि डॉ. साहब, गांधीजी ने जो खादी शुरू की थी, क्या अंगरेजों के कपड़े को खत्म करने के लिए? उन्होंने कहा कि गांधीजी ने इसलिए खादी का चलन किया था कि अगर आदमी हाथ से कमाना शुरू कर दे तो उसमें आत्मविश्वास आ जाएगा कि मैं कुछ कमा सकता हूं। दूसरा, वह देश के लिए कुछ पैदा कर रहा है और अपने हाथ से काम कर रहा है इसलिए वह ‘सेल्फ इंप्लाइड’ हो जाएगा। इस देश में ज्यादा नौकरी नहीं मिल सकती। अतः अपने हाथ से काम करके रोजगार खोजना होगा। डॉ. साहब मानते थे कि उन्नति की रफ्तार गांव व शहर में एक-सी होनी चाहिए और उससे इतने काम निकलने चाहिए कि हर छोटे से छोटा आदमी काम पर लगा रहे।

डॉ साहब ने कहा था कि मेरे बाद, मेरी ये किताबें पढ़ी जाएंगी। मेरा अपना कहना यह है कि आज भी अगर कोई एक छोटी संस्था बन जाए जो उनके विचारों को फैलाती रहे, उनकी किताबों को निकालती रहे, जैसे कि बाइबिल यहां मुफ्त बंट सकती है, गीता यहां मुफ्त बंट सकती है, तो मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि देश को सही दिशा मिल जाए। डॉ लोहिया का दरजा हिंदुस्तान के बड़े-बड़े विचारकों से ऊंचा इसलिए है कि डॉ लोहिया और किस्म के विचारक थे। वह इस तरह के विचारक नहीं थे जैसे यूनिवर्सिटी में हुआ करते हैं। डॉ लोहिया में चिंतन था, सोच थी, सोच के साथ एक दुख था।

(दिल्ली के पुराने समाजवादियों में स्व. बृजमोहन तूफान का नाम अग्रणी है। वह स्वतंत्रता सेनानी थे और आजीवन आचार्य नरेन्द्रदेव व डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी रहे। हिंद मजदूर सभा के महासचिव के नाते उनकी छवि एक मजदूर नेता की भी थी। जनता पार्टी की सरकार के समय दिल्ली की मेट्रोपोलिटन काउंसिल के सदस्य भी चुने गये थे। 90 वर्ष की आयु में 2010 में उनका देहांत हुआ। लोहिया के बारे में उनका यह संस्मरण मार्च 2003 में प्रकाशित सामयिक वार्ता के लोहिया विशेषांक से लिया गया है।)

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