विकास की प्रचलित अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा

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चित्र 'डाउन टु अर्थ' से साभार


— राजू पाण्डेय —

म सब विकास के जिस मॉडल को आदर्श मानते हैं वह मनुष्य विरुद्ध प्रकृति के नैरेटिव पर आधारित है। यही कारण है कि हमारी अभिव्यक्तियां प्रकृति पर विजय प्राप्त करना और प्रकृति को अपने अधीन करना जैसी होती हैं। प्रकृति के साथ हिंसात्मक बर्ताव करते हुए उसका अपनी लोलुपता और भोग लिप्सा के लिए मनमाना दोहन कर हमने अपने पर्यावरण को नष्ट कर लिया है। पर्यावरण रक्षा के हमारे उपाय कॉस्मेटिक अधिक हैं, क्योंकि हमारी विकास प्रक्रिया में ही प्रकृति के निरादर और अपमान की प्रवृत्ति छिपी हुई है। 

गांधी के लिए प्रकृति उपभोग की वस्तु नहीं है। गांधीवाद की अवधारणा अनेक स्थानों पर मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व से भी आगे निकल जाती है। गांधीवाद मनुष्य को प्रकृति के एक अविभाज्य अंग के रूप में देखता है, यदि मनुष्य प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है तो इस तरह वह खुद का ही अहित करता है।

हमें विकास की प्रचलित अवधारणा पर पुनर्विचार करना होगा। विकास किसका? विकास किसके लिए? जैसे प्रश्न हमें स्वयं से पूछने होंगे। असमानता की बढ़ती खाई, नष्ट होते पर्यावरण, अनिश्चित होते आर्थिक जीवन और तकनीकी द्वारा अपहृत होती निजता के बीच महात्मा गांधी एक आशा की किरण की भांति नजर आते हैं। आधुनिक सभ्यता की आलोचना जितनी समग्रता से गांधीजी ने की वैसी शायद किसी अन्य मनीषी ने नहीं की। किंतु गांधी को पुरातनपंथी मानना बड़ी भूल होगी। उनका प्रत्येक विचार तर्क और इससे भी बढ़कर आचरण की कसौटी पर कसे जाने के बाद ही आम जन तक पहुंचता था।

गांधीजी के आर्थिक दर्शन के मूल मंत्र थे- अपनी जरूरत के मुताबिक उत्पादन करना, आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, लोभ न करना, यदि आप के पास अधिक धन संपत्ति है तो यह समझना कि परमात्मा द्वारा प्रदत्त दौलत के आप मालिक नहीं हैं, अपितु एक ट्रस्टी हैं। और परमात्मा की इस दौलत का जनकल्याण के लिए अधिकतम उपयोग करने की जिम्मेदारी आप पर है।

आज जिस मुक्त अर्थव्यवस्था के मॉडल का हम अनुकरण कर रहे हैं वह भी अंततः पूंजीवाद के उस सिद्धांत पर आधारित है जो बाजार की शक्तियों पर विश्वास करता है। अपनी आदर्श स्थिति में बाजार क्रेता और विक्रेता के लिए बेस्ट डील के सारे अवसर प्रदान करता है। ग्लोबलाइज्ड इकोनॉमी उच्चस्तरीय टेक्नोलॉजी का उपयोग करती है जिसके विषय में यह कहा जाता है कि वह क्रेता और विक्रेता दोनों के लिए अनंत संभावनाएं पैदा करती है और वे विश्व बाजार का अधिकतम लाभ उठाने की स्थिति में आ जाते हैं। टेक्नोलॉजी मानवीय अकार्यकुशलता और भ्रष्टाचार आदि पर अंकुश लगाकर व्यापार को सुगम बनाने वाली मानी जाती है।

गांधीजी ने बहुत पहले समझ लिया था कि कोई भी अर्थव्यवस्था जो केवल भौतिक समृद्धि और भौतिक संसाधनों के बंटवारे तथा आधिपत्य को केंद्र में रखती है, कभी भी सफल नहीं हो सकती। नैतिक रूप से पतित मनुष्य बाजार के संतुलन से अपने निजी मुनाफे के सृजन के लिए हमेशा खिलवाड़ करेगा और टेक्नोलॉजी का उपयोग अपना वर्चस्व कायम करने के लिए करेगा। यदि आप बहुत सतर्कतापूर्वक अवलोकन करें तो टेक्नोलॉजी का उपयोग विकसित देशों द्वारा अविकसित एवं विकासशील देशों को स्वयं पर आश्रित बनाये रखने तथा मनुष्य की निजता पर अतिक्रमण करते हुए उसे अपनी सतत निगरानी और नियंत्रण में रखने हेतु किया जा रहा है। पहले के उपनिवेशवाद के दौर में शक्ति और वर्चस्व की भूख सैन्य हस्तक्षेप और युद्धों की जन्मदात्री थी किंतु नवउपनिवेशवाद के इस दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्रांति तथा नवउदारवाद अप्रत्यक्ष आर्थिक नियंत्रण द्वारा सत्ता और सर्वोच्चता की भूख की हिंसक परितुष्टि कर रहे हैं।

भौतिक संसाधनों के समान वितरण के लिए एक प्रयास साम्यवाद द्वारा किया गया जो सर्वहारा की हिंसक तानाशाही पर आधारित था। अपने बाहरी स्वरूप में पूंजीवाद का विलोम लगनेवाला साम्यवाद दरअसल उसी मूल्य मीमांसा पर विश्वास करता था जो पूंजीवाद की बुनियाद हैं- हिंसा, प्रतिशोध, भौतिक समृद्धि और सर्वोच्चता की आकांक्षा। इसलिए इसका असफल होना अवश्यम्भावी था। गांधीजी के शब्दों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद ने अर्थ विद्या और नीति विद्या में विभेद किया इसलिए समानता और समरसता लाने में ये पूर्णतः विफल रहे।

गांधीजी का आर्थिक दर्शन सामाजिक समरसता की स्थापना की सम्पूर्ण कार्य योजना को प्रस्तुत करता है। गांधीजी लिखते हैं- “मेरी राय में भारत की- न सिर्फ भारत की बल्कि सारी दुनिया की अर्थ रचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव की तकलीफ ना सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने पहने की जरूरत पूरी कर सके। और यह आदर्श निरपवाद रूप से तभी कार्यान्वित किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जनता के नियंत्रण में रहें। वे हर एक को बिना किसी बाधा के उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जिस तरह से भगवान की दी हुई हवा और पानी हमें उपलब्ध है। किसी भी हालत में वे दूसरों के शोषण के लिए चलाए जानेवाले व्यापार का वाहन ना बने। किसी भी देश, राष्ट्र या समुदाय का उन पर एकाधिकार अन्यायपूर्ण होगा।” (‘यंग इंडिया’, 15 नवंबर 1928)

गांधी लिखते हैं- “यह प्रकृति का निरापद बुनियादी नियम है कि वह रोज केवल उतना ही पैदा करती है जितना हमें चाहिए और यदि हर एक आदमी जितना उसे चाहिए उतना ही ले, ज्यादा न ले तो दुनिया में गरीबी न रहे और कोई आदमी भूखा न मरे। मैं समाजवादी नहीं हूं और जिनके पास संपत्ति का संचय है उनसे मैं उसे छीनना नहीं चाहता लेकिन यह मैं जरूर कहता हूं कि हममें से जो लोग प्रकाश की खोज में प्रयत्नशील हैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर इस नियम का पालन करना चाहिए।” (स्पीचेस एंड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गांधी, पृष्ठ 384)

गांधी जी के अनुसार- “जिस तरह सच्चे नीति धर्म में और अच्छे अर्थशास्त्र में कोई विरोध नहीं होता उसी तरह सच्चा अर्थशास्त्र कभी भी नीति धर्म के ऊंचे से ऊंचे आदर्श का विरोधी नहीं होता। जो अर्थशास्त्र धन की पूजा करना सिखाता है और बलवानों को निर्बल लोगों का शोषण करके धन का संग्रह करने की सुविधा देता है उसे शास्त्र का नाम नहीं दिया जा सकता। (हरिजन 9 अक्टूबर 1937)। ——–आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है पूंजी और मजदूरी के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना। 

“इसका अर्थ यह होता है कि एक ओर से जिन मुट्ठी भर पैसेवालों के हाथ में राष्ट्र की संपत्ति का बड़ा भाग इकट्ठा हो गया है उनकी संपत्ति को कम करना और दूसरी ओर से जो करोड़ों लोग आधे पेट खाते और नंगे रहते हैं उनकी संपत्ति में वृद्धि करना। जब तक मुट्ठी भर धनवानों और करोड़ों भूखे रहनेवालों के बीच बेइंतहा अंतर बना रहेगा तब तक अहिंसा की बुनियाद पर चलनेवाली राज्य व्यवस्था कायम नहीं हो सकती। अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलनेवाली सत्ता को खुद राजी खुशी से छोड़कर और सब के कल्याण के लिए सब के साथ मिलकर बरतने को तैयार ना होंगे तो यह समझ लें कि हमारे देश में हिंसक और खूंखार क्रांति हुए बिना न रहेगी। 

“ट्रस्टीशिप के मेरे सिद्धांत का बहुत मजाक उड़ाया गया है, मैं फिर भी उस पर कायम हूं। (रचनात्मक कार्यक्रम पृष्ठ 40-41)। ————मेरी सूचना है कि यदि भारत को अपना विकास अहिंसा की दिशा में करना है तो उसे बहुत सी चीजों का विकेंद्रीकरण करना पड़ेगा। केंद्रीकरण किया जाए तो फिर उसे कायम रखने के लिए और उसकी रक्षा के लिए हिंसा बल अनिवार्य है। गांवों को मुख्य मानकर जिस भारत का निर्माण होगा उसे शहर प्रधान भारत की अपेक्षा विदेशी आक्रमण का कम खतरा रहेगा भले ही शहर प्रधान भारत जल, स्थल और वायु सेनाओं से अधिक सुसज्जित होगा।” (हरिजन 30 दिसंबर 1939)।

(जारी)

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