आसमान की नजर से धरती की सच्चाई

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— भोला प्रसाद सिंह

सामान्य अर्थ में मिशन होलोकास्ट एक औपन्यासिक कृति है। और कृतिकार हैं राकेश कुमार सिंह। राकेश कुमार सिंह के अन्य उपन्यासों की तरह इसकी कथावस्तु भी झारखंड प्रदेश के चट्टानी जीवन पर केन्द्रित है। पलामू झारखंड प्रदेश का बियाबान है। इसके चप्पे-चप्पे पर ट्राइबल जन-जीवन के अमानवीय संघर्ष की कथा अंकित है। ‘मिशन होलोकास्ट’ इस अंतहीन संघर्ष-गाथा की एक अविस्मरणीय कड़ी है। जब से भूमंडलीकरण और विश्वपूंजी का दौर आया है आदिवासी क्षेत्रों का दोहन ही तेज नहीं हो गया बल्कि उनके जीवन के आधार जड़-जंगम को निगल जाने की अमानुषिक कोशिश तीव्र से तीव्रतर होती गयी। ‘मिशन होलोकास्ट’ इसी दुरभिसंधि की कथा है।

गहन वैज्ञानिक दृष्टि और आदिवासियों के सामाजिक तंतुओं को आत्मसात किये बिना इस या ऐसे उपन्यासों की रचना अकल्पनीय है। अविकसित या विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर आधिपत्य जमाने के लिए अब उपनिवेश  स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। औपनिवेशिक दृष्टि अब काफी बदल गयी है। ‘ओरविया’ जैसे देशों पर आधिपत्य जमाने के लिए शक्तिशाली जासूसी गतिविधियाँ, षड्यंत्र के बहुआयामी जाल चाहिए। ‘ओरविया’ में आर्यावर्त प्रतिध्वनित होती है। आलोच्य उपन्यास समकालीन आर्यावर्त की सत्ता के ऊँचे शिखर के आतंरिक गह्वर के बहुस्तरीय दाँव-पेच को अनावृत करने का अटूट प्रयास है। उपन्यासकार ने ओरविया के माध्यम से आजाद हिन्दुस्तान के सत्ताधारियों की असलियत को रखा है।

उपन्यास पढ़ते हुए लगता है कि आसमान बोल रहा है धरती की सच्चाई को। इसमें आर्यावर्त के स्वर्णिम अतीत का यशोगान न होकर उसके भयावह सत्य का अन्वेषाणात्मक यथार्थ है। ‘भारत : एक खोज’ का उत्तरकालीन अध्याय सरीखा। इस खोज के क्रम में उपन्यासकार ने एक कालयात्री की कल्पना की है। दूसरे ग्रह से आया यह कालयात्री पृथ्वी ग्रह पर स्थित भारत की खोज में यात्रा पर निकल पड़ा है। दूसरे ग्रह से अवतरित कालयात्री पृथ्वी की सतह पर उतरने के लिए भारत को ही चुनता है। लेकिन उसे निराश होना पड़ता है। ग्लोब पर तो भारत है लेकिन जनजीवन में कोई भारतीय उसे कहीं नहीं मिलता। महानगर कलकत्ता से लेकर कश्मीर तक वह अपने यान दौड़ाता है लेकिन कहीं भी भारतीयता नाम की कोई चिड़िया नहीं मिलती।

राकेश कुमार सिंह

इस अंश को पढ़ते हुए राही मासूम रजा का यह कथन याद आता है कि भारत के नक्शे पर भारत कहाँ है? यहाँ कोई बंगाली है तो कोई कश्मीरी है तो कोई मराठी। हरिशंकर परसाई की एक बहुचर्चित कहानी है ‘इंस्पेक्टर माता दीन चाँद पर’। इस कहानी में धरती आसमान (चाँद) की कहानी बयाँ करती है लेकिन समीक्ष्य उपन्यास में क्रम उलट गया है क्योंकि परसाई जी के जमाने तक चंद्रयान का अकल्पनीय विकास नहीं हो पाया था। ‘मिशन होलोकास्ट’ को पढ़ते हुए लगता है कि हम हिन्दी का उपन्यास नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अंतरिक्ष संबंधी ‘इसरो’ का शोध पेपर पढ़ रहे हैं। अंतरिक्ष सम्बन्धी गहन सूचनाओं के बिना ऐसे  उपन्यास की रचना संभव नहीं है। ‘मिशन होलोकास्ट’ उपन्यास आरम्भ में ही पाठकों का ध्यान इस ओर खींचता है- “किसी भी देश को अगर नष्ट  करना हो तो सबसे पहले उसकी भाषा भ्रष्ट करो।” अपनी भाषा के प्रति संवेदनशील लोग भारतीय भाषाओं को भ्रष्ट होते देखते हैं और सिर धुनकर रह जाते हैं।

आलोच्य उपन्यास  नयी औपनिवेशिक शक्तियों के भयानक रूपों को सर्जनात्मक कल्पना के माध्यम से व्यक्त करता है। उत्कृष्ट काव्य जैसी मिथकीय चेतना है और विज्ञान सम्मत दृष्टि भी। इस उपन्यास को यदि वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना देखें तो उनकी शिकायत दूर हो जाएगी कि “हिंदी के साथ दो दुर्घटनाएं एक साथ हुईं। एक तो उर्दू से नाता टूटना और दूसरा विज्ञान और तकनीकी से उसे काट दिया जाना।” राकेश जी कम से कम उनकी दूसरी शिकायत तो दूर कर देते हैं।

इस उपन्यास का यथार्थ अधुनातन विज्ञान की गहरी पैठ के बिना संभव  नहीं। वैसे भी उपन्यासकार विज्ञान (रसायन शास्त्र) के प्राध्यापक हैं। उपन्यास को दो खण्डों में बांटा गया है, लेकिन दोनों खंड एक दूसरे से असम्बद्ध नहीं हैं। इसका एक खंड अंतरिक्ष यान की कथा से संबद्ध है, इसमें भारतीय जीवन के बिखराव की कथा है। क्षेत्रीयता राष्ट्रीयता को बहुत पीछे फेंक चुकी है। दूसरे खंड में नामोरा और ओक्टोवियान जैसे समृद्ध देश हैं जो विकासशील और प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न हैं लेकिन आर्थिक रूप से विपन्न देशों को धीरे-धीरे अपने शिकंजों में कसते जा रहे हैं।

अब वह जमाना लद गया जबकि यूरोपीय देश तीसरी दुनिया के देशों को अपना उपनिवेश बनाकर उनके शासक बन जाते थे। बदलते समय में औपनिवेशिक जंजीरें टूटने लगीं और ये ताकतवर देश तीसरी दुनिया के देशों के दोहन करने के नये तरीके अपनाने लगे हैं क्योंकि वे अच्छी तरह से समझ गये हैं कि “आज के समय में किसी देश का छोटा सा टुकड़ा भी युद्ध से नहीं जीता जा सकता है। जिस राष्ट्र को अपने इशारों पर नचाना हो उसकी तीन चीजों को तबाह कर दो– मात्र तीन– संस्कृति, अर्थव्यवस्था और भाषा।” ओरविया को आर्यावर्त कह लें तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी उच्च संस्कृति और समृद्ध भाषाओं से सम्पन्न आर्यावर्त में भाषाई कारण के साथ सांस्कृतिक गुलामी तेजी से बढ़ी है और भूमंडलीकरण का अर्थ है आर्थिक और सांस्कृतिक गुलामी। इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। भूमंडलीकरण का अर्थ है अपने सांस्कृतिक जीवन के प्रति उदासीन। सीआईए और केजीबी जैसी जासूसी संस्थाएं इस कार्य को बीसवीं शताब्दी के छठे-सातवें दशक से सम्पन्न कर रही थीं।

‘नामोरा’ और ‘ओक्टोविया’ देश सम्प्रति एप्स का विस्तृत संसार उन जासूसी संस्करणों से ज्यादा ताकतवर है। भारत जैसे देशों में इसने अपना ओरविया नेटवर्क फैला रखा है। ओरविया के राजकुमार के साथ डोरिन ब्राउन का विवाह तथा कालान्तर में वहां की ताकतवर रानी की हत्या इसी साजिश का हिस्सा है– नयी औपनिवेशिक नीति का मूर्त रूप है। ओरविया के राजभवन में रहते हुए डोरियन ब्राउन की मानसिकता बदल जाती है। वह नामोरा या ओक्टोविया वापस नहीं लौटती। आखिर क्यों लौटेगी? ओरविया की राजनीति में वह शिखर पर पहुँच गयी है। ओरविया की रानी की हत्या के बाद किम्बरली की अंदरूनी राजनीति में डोरियन का कद बढ़ने लगा। किम्बरली के अंत:पुर में ही सारे महत्त्वपूर्ण विषयों को देखने-सुनने के निर्णय लिये जाने लगे। किम्बरली की राजनीति में निर्णायक स्थिति में आने के बाद डोरियन वापस लौटने को तैयार नहीं है क्योंकि ओरविया की राजनीति की वह केन्द्रीय धुरी बन गयी है।

किताब : मिशन होलोकास्ट (उपन्यास)

लेखक : राकेश कुमार सिंह

प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियांज, नयी दिल्ली-110002; फोन : संपर्क : (0)7065507086, (0)9869934715  मूल्य : 400 रु.

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