मेरे संस्मरण – आचार्य नरेंद्रदेव : पहली किस्त

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आचार्य नरेन्द्रदेव (30 अक्टूबर 1889 - 19 फरवरी 1956)

मेरा जन्म संवत् 1946 में कार्तिक शुक्ल अष्टमी को सीतापुर में हुआ था। हम लोगों का पैतृक घर फैजाबाद में है, किन्तु उस समय मेरे पिता श्री बलदेव प्रसाद जी सीतापुर में वकालत करते थे। हमारे खानदान में सबसे पहले अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करनेवाले व्यक्ति मेरे दादा के छोटे भाई थे। अवध में अंग्रेजी हुकूमत सन् 1856 में कायम हुई। इस कारण अवध में अंग्रेजी शिक्षा आरंभ देर से हुई। मेरे बाबा का नाम बा. सोहनलाल था। वह पुराने कैनिंग कॉलेज में अध्यापन का कार्य करते थे। उन्होंने मेरे पिता और मेरे ताऊ को अंग्रेजी की शिक्षा दी। पिताजी ने कैनिंग कॉलेज में एफ.ए. कर वकालत की परीक्षा पास की थी। आँखों की बीमारी के कारण वह बी.ए. नहीं कर सके। मेरे बाबा उनको कानून की पुस्तकें सुनाया करते थे और सुन-सुनकर ही उन्होंने परीक्षा की तैयारी की थी। वकालत पास करने पर वह सीतापुर में मेरे बाबा के शिष्य मुंशी मुरलीधर जी के साथ वकालत करने लगे। दोनों सगे भाई की तरह रहते थे। दोनों की आमदनी और खर्च एक ही जगह से होते थे। मुंशीजी के कोई संतान न थी। वह अपने भतीजे और मेरे बड़े भाई को पुत्र के समान मानते थे। मेरे जन्म के लगभग दो वर्ष बाद मेरे दादा की मृत्यु हो जाने के कारण पिताजी को सीतापुर छोड़ना पड़ा और वह फैजाबाद में वकालत करने लगे।

जब वह सीतापुर में थे, तभी उनको धार्मिक प्रवृत्ति शुरू हो गयी थी। किसी संन्यासी के प्रभाव में आने से ऐसा हुआ था। वह बड़े दानशील और सात्त्विक वृत्ति के थे। वेदांत में उनकी बड़ी अभिरुचि थी और इस शास्त्र का उनको अच्छा ज्ञान था। संन्यासियों का सत्संग सदा किया करते थे। जिस समय उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी, उस समय फारसी का प्रचलन था। किन्तु अपनी संस्कृति और धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्होंने संस्कृत का अभ्यास किया था। वह एक नामी वकील थे। किन्तु वकालत के अतिरिक्त भी उनकी अनेक दिलचस्पियाँ थीं। बालकों के लिए उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और फारसी में पाठ्य-पुस्तकें लिखी थीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई संग्रह-ग्रंथ भी प्रकाशित किये थे। अंग्रेजी की प्राइमर तो उन्होंने मेरे बड़े भाई को पढ़ाने के लिए लिखी थी। मेरा विद्यारम्भ इन्हीं पुस्तकों से हुआ था। उनको मकान बनाने और बाग लगाने का भी शौक था। हमारे घर पर एक छोटा-सा पुस्तकालय भी था। जब मैं बड़ा हुआ तो गरमी की छुट्टियों में इनकी देखभाल भी किया करता था। मैं ऊपर कह चुका हूँ कि मेरे पिताजी धार्मिक थे और इस नाते सनातन धर्म के उपदेशक, संन्यासी और पण्डित मेरे घर पर प्रायः आया करते थे। किन्तु पिताजी कांग्रेस और सोशल कान्फ्रेंस के कामों में भी थोड़ी-बहुत दिलचस्पी लेते थे।

मेरे प्रथम गुरु थे पण्डित कालीदीन अवस्थी। वह हम भाई-बहनों को हिंदी, गणित और भूगोल पढ़ाया करते थे। पिताजी मुझसे विशेष रूप से स्नेह करते थे। वह भी मुझे नित्य आधा घण्टा पढ़ाया करते थे। मैं उनके साथ प्रायः कचहरी जाया करता था। मुझे याद है कि वह मुझे अपने साथ एक बार दिल्ली ले गये थे। वहाँ भारत धर्म महामण्डल का अधिवेशन हुआ था। उस अवसर पर पण्डित दीनदयालु शर्मा का भाषण सुनने को मिला था। उस समय उसके मूल्य को आँकने की मुझमें बुद्धि न थी। केवल इतना याद है कि शर्माजी की उस समय बड़ी प्रसिद्धि थी।

मैंने घर पर तुलसीकृत रामायण और समग्र हिंदी महाभारत पढ़ा। इनके अतिरिक्त बैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, सूरसागर आदि पुस्तकें भी पढ़ीं। उस समय चन्द्रकांता की बड़ी शोहरत थी। मैंने इस उपन्यास को 16 बार पढ़ा होगा। चन्द्रकांता सन्तति को, जो 24 भाग में है, एक बार पढ़ा था। न मालूम कितने लोगों ने चन्द्रकांता पढ़ने के लिए हिंदी सीखी होगी। उस समय कदाचित् इन्हीं पुस्तकों का पठन-पाठन प्रायः हुआ करता था। 10 वर्ष की आयु में मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। पिताजी के साथ नित्य मैं संध्या-वंदन और भगवद्गीता का पाठ करता था। एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण मुझको सस्वर वेदपाठ सिखाते थे और मुझको एक समय रुद्री और सम्पूर्ण गीता कण्ठस्थ थी। मैंने अमरकोश और लघु-कौमुदी भी पढ़ी थी। जब मैं दस वर्ष का था अर्थात् 1899 मे लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। पिताजी डेलिगेट में थे। मैं भी उनके साथ गया था। उस समय डेलिगेट का ‘बैज’ होता था कपड़े का फूल। मैंने भी दरजी से वैसा ही एक फूल बनवा लिया और उसको लगाकर अपने चचाजाद भाई के साथ ‘विजिटर्स गैलरी’ में जा बैठा। उस जमाने में प्रायः भाषण अंग्रेजी में होते थे और यदि हिंदी में भी होते, तब भी मैं कुछ ज्यादा न समझ सकता। ऐसी अवस्था में सिवाय शोर-गुल मचाने के मैं कर ही क्या सकता था। दर्शकों ने तंग आकर मुझे डाँटा और पंडाल से भागकर मैं बाहर चला आया। उस समय मैं कांग्रेस के महत्त्व को क्या समझ सकता था। किन्तु इतना मैं जान सका कि लोकमान्य तिलक, श्री रमेश चंद्र दत्त और जस्टिस रानाडे देश के बड़े नेताओं में से एक हैं। इनका दर्शन मैंने प्रथम बार वहीं किया। रानाडे महाशय की तो सन् 1901 में मृत्यु हो गई। दत्त महाशय का दर्शन दोबारा 1906 में कलकत्ता के कांग्रेस के अवसर पर हुआ।

मैं 1902 में स्कूल में भरती हुआ। सन् 1904 या 1905 में मैंने थोड़ी बंगला सीखी और मेरे अध्यापक मुझको कृत्तिवास की रामायण सुनाया करते थे। पिताजी का मेरे जीवन पर बड़ा गहरा असर पड़ा। उनकी सदा शिक्षा थी कि नौकरों के साथ अच्छा व्यवहार किया करो, उनको गाली-गलौज न दो। मैंने इस शिक्षा का सदा पालन किया। विद्यार्थियो में सिगरेट पीने की बुरी प्रथा उस समय भी थी। एक बार मुझे याद है कि अयोध्या में कोई मेला था। मैंने शौकिया सिगरेट की एक डिबिया खरीदी। सिगरेट जलाकर जो पहला कश खींचा तो सर घूमने लगा। इलायची, पान खाने पर तबीयत सँभली। मुझे आश्चर्य हुआ कि लोग क्यों सिगरेट पीते हैं। मैंने उस दिन से आज तक सिगरेट नहीं छूआ। हाँ, श्वास के कष्ट को कम करने के लिए कभी-कभी स्ट्रैमोलियम के सिगरेट पीने पड़े हैं।

मेरे पिताजी सदा आदेश दिया करते थे कि कभी झूठ न बोलना चाहिए। मुझे इस संबंध में एक घटना याद आती है। मैं बहुत छोटा था। कोई सज्जन मेरे मामूँ को पूछते हुए आए। मैं घर के अंदर गया। मामूँ से कहा कि आपको कोई बाहर बुला रहा है। उन्होंने कहा कि जाकर कह दो कि घर में नहीं हैं। मैंने उनसे यह संदेशा ज्यों का त्यों कह दिया। मेरे मामूँ बहुत नाराज हुए। मैं अपनी सिधाई में यह भी न समझ सका कि मैंने कोई अनुचित काम किया है। इससे कोई यह नतीजा न निकालें कि मैं बड़ा सत्यवादी हूँ। किन्तु इतना सच है कि मैं झूठ कम बोलता हूँ। ऐसा जब कभी होता है तो लज्जित होता हूँ और बहुत देर तक संताप बना रहता है। पिताजी की शिक्षा चेतावनी का काम करती है। मैं ऊपर कह चुका हूँ कि मेरे यहाँ अक्सर साधू-संन्यासी और उपदेशक आया करते थे। मेरे पिता के एक स्नेही थे। उनका नाम था पं. माधव प्रसाद मिश्र। वह महीनों हमारे घर पर रहा करते थे। वह बंगला भाषा अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने ‘देशेर कथा’ का हिंदी में अनुवाद किया था। यह पुस्तक जब्त कर ली गयी थी। वह हिंदी के बड़े अच्छे लेखक थे। वे राष्ट्रीय विचार के थे। मैं इनके निकट संपर्क में आया।

मेरा घर का नाम  ‘अविनाशीलाल’ था। पुराने परिचित आज भी इसी नाम से पुकारते हैं। मिश्र जी पर बंगला भाषा का अच्छा प्रभाव पड़ा था। उन्होंने हम सब भाइयों के नाम बदल दिये। उन्होंने ही मेरा नाम  ‘नरेन्द्र देव’ रखा। सनातन धर्म पर प्रायः व्याख्यान मेरे घर पर हुआ करते थे। सन् 1906 में जब मैं एण्ट्रेंस में पढ़ता था, स्वामी रामतीर्थ का फैजाबाद आना हुआ और वह हमारे अतिथि हुए। उस समय वह केवल दूध पर रहते थे। शहर में उनका एक व्याख्यान ब्रह्मचर्य पर हुआ था और दूसरा व्याख्यान वेदान्त पर मेरे घर पर हुआ था। उनके चेहरे पर बड़ा तेज था। उनके व्यक्तित्व का मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ा और बाद को मैंने उनके उनके ग्रंथों का अध्ययन किया। वह हिमालय की यात्रा करने जा रहे थे। मिश्र जी ने उनसे कहा कि संन्यासी को किसी सामग्री की क्या आवश्यकता। इतना कहना था कि वह अपना सारा सामान छोड़कर चले गये और पहाड़ से उनकी चिट्ठी आयी कि “राम खुश” है।

(जारी)

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