धर्म पर कुछ विचार : पहली किस्त

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— राममनोहर लोहिया —

र्म या और किसी सत्य के मामले में किसी एक कोने या दृष्टि से ही बातें समझ में आती हैं। जैसे यह चाँद, सूरज को देख रहे हो, एक कोने से, एक दृष्टि से देख रहे हो। इसी समय काहिरा में या फारस में एकदम सुबह, गुलाबी सूरज निकल रहा होगा। वह वहाँ का कोना है। हरेक कोना इतना अलग होता है। सच को आप हमेशा किसी एक कोने से देखोगे, यह देह-धरे का दोष है। इस दोष से पूरी तरह से कभी छुटकारा हो ही नहीं सकता। किसी एक कोने से ही देखोगे। यह बात अलग है कि जिस किसी कोने से, जिस किसी दृष्टि से सच को देखो, कोशिश करो कि पूरे सच को समझ पाओ, एक सम्यक, पूरी दृष्टि बन पाये। लेकिन दृष्टि हमेशा किसी एक कोने की रहेगी। यहाँ तक कि सच की बहुत खोज करनेवाले हमारे पुरखे थे, और निचोड़ निकालते-निकालते अद्वैत तक पहुँचे। यह न समझ लेना कि अद्वैत ही एक कोना, एक दृष्टि है, उसके साथ और बहुत-सी हैं, लेकिन फिर उस अद्वैत में भी कई दृष्टियाँ निकलने लगीं, विशुद्ध अद्वैत, केवल अद्वैत।

मेरी दृष्टि वह नहीं है जो साधारण तौर से धर्म वाले रखते हैं। मिसाल के लिए मैं कुछ चीजें आपके सामने रखता हूँ, जैसे नदियाँ साफ करना, खासतौर से गंगा, कावेरी, जमुना, कृष्णा वगैरह नदियाँ। आजकल इनमें कारखानों का गंदा पानी, शहरों का पेशाब-पाखाना, सब बहाया जाता है। आप जब तीर्थयात्रा करने जाते होंगे तो वृन्दावन में आपने देखा होगा, जो वह पेड़ है, जहाँ आज भी हिंदुस्तान की औरतें एक छोटा-सा चीर का टुकड़ा बाँध दिया करती हैं। जहाँ कृष्ण की चीरहरण लीला हुई थी। अभी तक वह प्रसंग चला आ रहा है। देखने में मुझे खुशी हुई, अच्छा सा लगता है, कुछ हँसी भी आती है। औरतों को मालूम हो जाय कि वे क्या कर रही हैं, तो शायद थोड़ी देर के लिए लजा जाएँ। खैर, उसी के ठीक नीचे वृन्दावन शहर का गंदा नाला बहता हुआ जमुना में गिरता है। लोग उसमें स्नान करते हैं। नदियों के साफ करने की बात किसके मुँह से निकली? जो धर्म के लोग हैं, उनमें से किसी ने नहीं कहा। मुझे साधारण तौर से कहा जाएगा– अधर्मी आदमी, उसके मुँह से यह बात निकली कि नदियों को साफ करो। इस पर कभी आप सोच-विचार करना कि ये धर्म वाले लोग तो ऐसी बात नहीं कहते, मेरे जैसा अधर्मी आदमी कह देता है यह बात।

उसी तरह, एक दूसरा प्रसंग लीजिए। कुछ अरसा पहले दिल्ली में सफाई की एक प्रदर्शनी हुई थी, जिसमें डेढ़-दो करोड़ रुपया खर्च हुआ था। दिल्ली के लोगों के घरों में ज्यादातर आधुनिक सफाई का इंतजाम हो चुका है। जंजीर खींच देने से पाखाना बह जाता है। और आजकल तो ऐसे पाखाने हो गये हैं जिनमें जंजीर की भी जरूरत नहीं है, चौबीस घंटे पानी बहता रहता है। वह दिल्ली में भी बहुत कम लोगों के घर में आया है। मैं समझता हूँ, दिल्ली में ज्यादा से ज्यादा 100 आदमी होंगे और हिंदुस्तान में ज्यादा से ज्यादा 2000 आदमी होंगे जिनके घरों में चौबीसों घंटे बहते हुए पानी का पाखाना है। लेकिन यूरोप में हजारों, लाखों के घरों में है। ऐसी सफाई की प्रदर्शनी दिल्ली में होती है जिसकी कोई जरूरत नहीं है। इस पर मैंने एक सुझाव रखा कि हिंदुस्तान के जो तीर्थस्थान हैं, जहाँ हिंदुस्तान की जनता करोड़ों, लाखों की तादाद में हर साल इकट्ठा हुआ करती है, द्वारका, रामेश्वरम, गया, काशी, और एक चीज पर ध्यान रखना, इन्हीं के साथ-साथ मैं अजमेर भी जोड़ता हूँ।

मुझे इससे विशेष मतलब नहीं कि वे तीर्थस्थान किसी एक विशेष धर्म और संप्रदाय के होते हैं। मुझे इससे मतलब है कि वे तीर्थस्थान ऐसे हैं कि जहाँ पर करोड़ों-लाखों की तादाद में लोग इकट्ठा होते हैं। उन तीर्थस्थानों को साफ बनाया जाए, सुथरा बनाया जाए, जिससे ये लाखों आदमी हर साल देखें कि किस तरह सफाई की जिंदगी चला सकते हैं। यह बात भी मुझ जैसे अधार्मिक आदमी के मुँह से निकली, धार्मिक ने नहीं कहा कि हमारे तीर्थस्थानों को सुंदर, साफ और पवित्र बनाओ।

उसी तरह, एक तीसरी चीज की तरफ आपका ध्यान खींचता हूँ कि जब कैलाश पर्वत पर, जिसको कि आप अपने सत्संग में अक्सर शिव-पार्वती का कहा करते हो, उस पर चीनियों ने अपना पंजा मारा और उसको अपने कब्जे में लिया। मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तान में धर्म, अधर्म के जो कुछ भी लोग हैं उनमें सिर्फ मैं ही था कि जिसने इस चीज के ऊपर हल्ला मचाया कि देखो यह क्या हो रहा है, और जो धर्म के संगठित संप्रदाय हैं, उनकी तरफ से इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया। जरा थोड़ी देर के लिए आप सोचना कि ये सब चीजें क्या होती हैं?

वैसे, कैलाश के संबंध में एक जिक्र कर दूँ। कुछ दिनों पहले तक मैं सोचता था कि यह केवल भूगोल, इतिहास, संस्कृति, रहन-सहन के ढंग के आधार पर हिंदुस्तान के नजदीक है, लेकिन अबकी बार मुझे कुछ और भी सबूत मिला। कैलाश के पास एक गाँव है जिसका नाम है मनसर। वह मानसरोवर नदी या झील के ऊपर है। उस मनसर गाँव की मालगुजारी अभी कुछ दिनों पहले तक हिंदुस्तान सरकार को मिली थी। उस गाँव की मर्दुमशुमारी हिंदुस्तान की मर्दुमशुमारी के अंकों में शामिल की जाती है। ये सब बातें मुझे मालूम हुईं एक ऐसे हिंदुस्तानी अफसर से जो 1946-47 तक लद्दाख सरकार का नौकर था। उसने मुझे बताया कि किसी जमाने में लद्दाख के किसी राजा ने अपने सार्वभौमत्व, अपने राज्य के एक नमूने की तरह तिब्बत के राजा को वह इलाका भेंट स्वरूप दे दिया, लेकिन मनसर गाँव को रख लिया ताकि सबूत रह जाय कि यह हमारा इलाका था। मेरा उस पर यह कहना है कि एक तो वह भेंट गैरकानूनी थी, दूसरे अगर कानूनी भी थी तो वह भेंट तिब्बत की सरकार को थी, न कि चीन की सरकार को। अगर इसके ऊपर अच्छी तरह से बहस चले तो संभव है कि कानूनी दृष्टि से भी यह साबित किया जा सके। या तो तिब्बत को पूरा स्वतंत्र होना चाहिए तो कैलाश, मानसरोवर वगैरह हम अपने भाई तिब्बत की रखवाली में रख सकते हैं। मेरा यह इरादा है और हर एक का यही इरादा होना चाहिए। लेकिन, अगर तिब्बत स्वतंत्र नहीं होता है, तो फिर कैलाश, मानसरोवर का इलाका हिंदुस्तान में आना चाहिए।

मैंने आपको ये तीन बातें बतायीं। इसी पर आप सोच लेना कि क्या कारण है कि मुझ जैसा आदमी इन बातों को हिंदुस्तान की जनता के सामने रखता है और धर्म पर ज्यादा सोच-विचार करने वाले या धर्म से ज्यादा संबंध रखने वाले लोग नहीं रखते। एक अधर्मी आदमी, या जो शायद ईश्वर के मामले में समझा जाता है कि नास्तिक है, शायद कुछ हद तक सही भी है, मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता, वह इन सब चीजों को उठाता है कि नदियाँ साफ करो, तीर्थस्थानों को साफ करो, कैलाश-मानसरोवर को या तो तिब्बत की रखवाली में रखो या हिंदुस्तान को दो। लेकिन जो धर्म वाले लोग हैं, उनके दिमाग में ये बातें नहीं आतीं। कुछ कोना कहीं न कहीं खराब है। वह कोना, दृष्टि के संबंध में मैंने बताया कि आप यहाँ सूरज को देख रहे हो और फारस में या काहिरा में इसी समय सुबह का गुलाबी सूरज होगा। मुझे ऐसा लगता है कि धर्म और फिर हिंदू धर्म के अंदर भी वैष्णव धर्म, शैव धर्म वगैरह जो कुछ भी हो, उसका अर्थ सबके लिए व्यापक होना चाहिए, और वह दरिद्रनारायण वाला कि जो सब लोगों के हित का हो। इसीलिए, मैं समझता हूँ, गाँधीजी ने भी धर्म को या ईश्वर को या सत्य को दरिद्रनारायण में देखा था और विशेष करके दरिद्रनारायण की रोटी में, क्योंकि दरिद्रनारायण का हित और अहित जो है, उसे ही यदि किसी अर्थ में आप धर्म समझो तो फिर करोड़ों लोगों के फायदे और नुकसान की जो बातें हैं वह हमेशा दिमाग पर टकराती हैं। वरना, हम लोग एक अलग-सी, हवाई दुनिया बसा लिया करते हैं, चाहे धर्म की, चाहे भोग की, चाहे काम की, चाहे मोक्ष की।

(जारी)

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