भीलों के गांधी : मामा बालेश्वर दयाल – दूसरी किस्त

0
मामा बालेश्वर दयाल (10 मार्च 1905 - 26 दिसंबर 1998)


— रामस्वरूप मंत्री —

दिवासियों में आयी इस जन जागृति को मामा बालेश्वर दयाल ने मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा जिसके फलस्वरूप आजादी के बाद के पहले आम चुनावों में इस पूरे क्षेत्र में मामा जी से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता विधायक और सांसद चुने गये। 1952 के पहले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में झाबुआ की पाँचों सीटों से समाजवादी कार्यकर्ता जीते। इनमें जमना देवी भी थीं जो बाद में उप मुख्यमंत्री भी बनीं। राजस्थान में जसोदा बहन विधानसभा में जानेवाली पहली महिला विधायक थीं। सन 1971 में जब पूरे देश में इंदिरा गांधी की लहर थी, बांसवाड़ा में मामा जी के सहयोगी 45 हजार वोट से जीते थे। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि मामा जी ने समाजवादी पार्टी को देश के इस आदिवासी क्षेत्र में पहचान दिलायी।

इसी बात को समझते हुए मामाजी ने शराबबंदी को बहुत महत्त्व दिया। 1954 में दारूबंदी आंदोलन फिर से जोर-शोर से शुरू हुआ। मामा जी को फिर से देश-निकाला हो गया और उन्हें गुजरात जाकर रहना पड़ा। इस आंदोलन में महिलाओं ने बहुत सक्रिय भूमिका निभायी। महिला विधायकों ने इस मुद्दे को उठाया। रैली और सत्याग्रह हुए। धीरे-धीरे सत्याग्रह जेल भरो आंदोलन में परिवर्तित हो गया। आदमी जेल जाने के लिये स्वेच्छा से तैयार होते थे और महिलाएँ उन्हें गीत गाते हुए जेल तक छोड़ने जाती थीं। झाबुआ से इंदौर तक पदयात्रा कर, वहाँ भी सत्याग्रह किया गया। आंदोलन सफ़ल हुआ और शराब की दुकाने बंद कर दी गयीं।

झाबुआ और पड़ोस के जि़लों की एक और चुनौती थी वहाँ की चोरी-चकारी। चोरी के लिए भील बहुत बदनाम थे। हालाँकि यह काम राजनैतिक सरपरस्ती व पुलिस संरक्षण में होता था मामाजी का मानना था कि धंधे के अभाव में ही चोरियाँ होती हैं। मामाजी ने धंधों की एक सूची बनवायी जिसमें 712 छोटे-मोटे धंधे निकले जो यहाँ किये जा सकते थे पर यह काम बहुत आगे नहीं जा सका। रोजगार की तलाश में उन्होंने जंगल पर आदिवासियों के हक की मुहिम छेड़ी। आदिवासी इलाकों में वन विभाग का बहुत आतंक रहता है। इसके विरोध के लिए उन्होंने लोगों को तैयार किया।

पुराने लोगों से बहुत किस्से हमने सुने जहाँ वे वनकर्मियों से भिड़ गये क्योंकि लाल टोपी का नियम था कि कर्मचारी के साथ दोस्ती नहीं करना, उन्हें रिश्वत नहीं देना। एक बुजुर्ग ने तो हमें अपनी टाँग और पीठ में अब तक गड़े छर्रे भी दिखाये जो वनकर्मियों की बंदूक से उसे लगे थे। इस मुहिम के चलते आदिवासी ठेकेदारों द्वारा साफ की गयी जंगल-जमीन पर खेती कर सके, दैनिक जरूरतों के लिए लकड़ी ला सके और वनोपज भी इकठ्ठा करने लगे।

साठ के दशक तक मामा जी ने राजस्थान, म.प्र. व गुजरात के सीमावर्ती इलाकों के भीलों के लिए एक पूज्य गुरु का रूप धारण कर लिया था। लोग उनसे अपने बच्चों को आशीर्वाद दिलवाने लाते थे। सम्मेलनों में एक एक रूपया चंदा करते थे।

अपने समय के अनेक समाजवादी नेताओं से मामाजी का जोर लोगों के बीच रहकर उनकी समस्याओं के निवारण लिए संघर्ष करना था। बुद्धिजीवीपने में उनका बहुत विश्वास नहीं था पर विचारों के फैलाव का महत्त्व वे बखूबी समझते थे। एक समय वे हैदराबाद से निलकले वाली समाजवादी पत्रिका चौखम्बा के सम्पादक मण्डल के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने गोबर नाम की एक पत्रिका भीली भाषा में भी निकाली।

1962 में लोहिया के कहने पर मामा जी को समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। इमरजेन्सी के दौरान वह जेल गये और 1978 में राज्यसभा सदस्य बने।

अपने जीवन में मामाजी ने बहुत-से आंदोलन छेड़े जो लोगों के रोजमर्रा के मुद्दों से जुड़े थे। उस समय के बहुत सारे नेताओं से उन्हें यही बात अलग करती है कि वे पूरी तरह लोगों के दिलों से जुड़े हुए थे। और देश आज़ाद होने के बाद जब सब कुर्सी की होड़ में थे तब मामाजी सत्ता से बहुत दूर लोगों के मुददों को लेकर आंदोलनरत थे।

सबसे बड़ी बात यह थी कि लाल टोपी आंदोलन ने इसमें जुड़े चेना बाबा जैसे लाखों आदिवासियों के दिमाग में गरीबों के राज का सपना फिट कर दिया था। आज के मुद्दा आधारित आंदोलनों के लिए यह सीखने जैसी बात है।

अंत में यह बताना जरूरी है कि इतने बड़े इलाके में, इतने लम्बे समय तक आंदोलन चलानेवाले मामा बालेश्वर दयाल ने कोई निजी सम्पत्ति इकट्ठा नहीं की। बामनिया में एक भील आश्रम बनाया गया चंदे से, जहाँ वे रहते थे। सादे सूती कपड़े। सादा रहन-सहन और बहुत ही आत्मीय और सरल व्यवहार। अंतिम समय में मित्रों ने बहुत कहा कि दिल्ली के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए आ जाइए पर वे नहीं माने। उनका आग्रह था कि जो स्वास्थ्य सुविधा आदिवासियों को मिल रही है वे उसी के भरोसे इलाज कराएंगे। अंत तक उन्होंने अपना क्षेत्र नहीं छोड़ा।

मामा जी को भीलों का गांधी कहा जाए तो कुछ गलत न होगा। जिस तरह गांधी, स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए जाने गये उसी तरह भीलों के लिए तो राजाओं और कर्मचारियों की तानाशाही से आजादी इस लाल टोपी आंदोलन से ही आयी। 26 दिसम्बर 1998 को इन्होंने अपनी 86 वर्ष की लम्बी पारी समाप्त की।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here