जिस देश की जनता का जीवन-स्तर जितना ऊंचा होता है, दुनिया उस देश को भी उतना ही अधिक महत्व देती है। ट्रम्प ने खुलेआम भारत को अपमानित किया। उसने कहा, भारत के लोग नारकीय जीवन जीते हैं। दुनिया के दूसरे विकसित देश के लोग भी समझते हैं कि वे भारत के अच्छे स्कूल-कालेज से डिग्री प्राप्त करने वाले डाक्टर, इन्जिनियर को अपने टोले-मोहल्ले में रहने दे सकते हैं, लेकिन उनके देश में भारत के वैसे युवक और युवतियों के लिये जगह नहीं है जो बेरोज़गार हैं, दुख-दैन्य-पीडित हैं, जातिवाद और सम्प्रदायवाद के पक्षधर हैं और जिनका वैफल्य-जनित आक्रोश हिंसा या दंगा-फसाद के रूप में अभिव्यक्त होता है। जब भारत जगद्गुरु के रूप में सम्मानित था, भारत विश्व का सर्वाधिक समृद्ध देश था। अठारहवी सदी के अंत तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद विश्व में सबसे ज्यादा था। भारतवर्ष जगत की ईर्ष्या का पात्र था, लेकिन आज चीन, दक्षिण कोरिया, श्री लंका, भूटान, फिलिपीन्स आदि देश भारत से काफी आगे हैं। बांगलादेश और कम्बोडिया के लोगों की प्रतिव्यक्ति औसत आय भी भारतीयों की अपेक्षा करीब एक सौ डाॅलर अधिक है। जो लोग यह कहते हैं कि आज का भारत विश्वगुरु है, वे भोले-भाले तोताराम हैं या मिथ्याभिमान की व्याधि से ग्रस्त हैं। ऐसे लोग किसी विषय पर स्वतंत्र रूप से सोचने में असमर्थ हैं। भारत सरकार “विश्वगुरु” की प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करना चाहती है, तो युवावर्ग को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराये, शक्तिशाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करे ताकि हर हाथ को काम मिले। इसके बाद युवा हिंसा और साम्प्रदायिक विद्वेष के मार्ग से दूर जायेंगे और भारत सुख-शान्ति का देश बन सकेगा।
आज पश्चिम बंगाल मे एक नये मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह सम्पन्न हुआ। बंगाल आधुनिक भारत के आध्यात्मिक नेता विवेकानंद की जन्मभूमि है। एक युवक ने स्वामीजी से कहा, “मैं रोज ध्यान करता हूँ, मंदिर जाता हूं, पूजा-पाठ करता हूं, किंतु इन उपायों से मुझे शांति नहीं मिली।”स्वामी जी ने स्नेह भरे स्वर में उत्तर दिया , “सर्वप्रथम अपने कमरे का दरवाज़ा खुला रखो। अपने पड़ोस में रहने वाले अभावग्रस्त, दुखी, रोगी और भूखे लोगों का पता लगाओ और यथाशक्ति उनकी सेवा-सहायता करो। जो अनपढ़ और अज्ञानी हैं, उन्हें पढ़ाओ और समझाओ। तुम्हें अवश्य शांति मिलेगी।”युवक ने शंका व्यक्त की, “अगर किसी रोगी की सेवा करते समय मैं स्वयं बीमार पड़ जाऊँ तो?” विवेकानंद बोले, “तुम्हारी इस आशंका से लगता है कि तुम हर अच्छे कार्य में बुराई खोजते हो। यही कारण है कि तुम्हें शांति नहीं मिलती। शुभ कार्य में देरी न करो और उसमें कमी मत खोजो। यही शांति का मार्ग है।”
बंगाल की धरती सेवा की प्रतिमूर्ति मदर टरेसा की कर्मभूमि है। कुमारी टरेसा ने अठारह वर्षो तक मिशनरी स्कूल में अध्यापन किया, लेकिन उनका मन अशांत और उद्वेलित रहा करता था। स्कूल की चार दीवारियों के बाहर मोती झील की बस्ती थी। समय मिलने पर वे अक्सर उस बस्ती में चली जाती थीं। कच्चे घरों के आँगन में बैठकर लड़के-लड़कियों के दुःख-सुख की कहानियाँ सुनतीं। लौटकर आतीं तो गरीब माता-पिता की संतानों के उदास चेहरों को वे भूल नहीं पाती थी। ।एक दिन पढ़ाई समाप्त होने पर उन्होंने छात्राओं को बुलाया और कहा, “तुम लोग रोज़ अपने लिए मिड-डे खाना लाया करती हो। क्या तुम सप्ताह में एक दिन का खाना सामने वाली बस्ती में रहने वाले लड़के-लड़कियों को नहीं दे सकतीं?” सभी छात्राओं ने सहमति में हाथ उठा दिए।तब से यह उनकी दिनचर्या बन गई। कुमारी टेरेसा के अन्तस की अशान्ति दूर हो गई और उनके भावी पथ की दिशा भी निर्धारित हो गई। 1946 के अंत में उन्होंने निर्णय ले लिया कि वे अपना जीवन दीन-दुखी, रोगग्रस्त, पीड़ित और उपेक्षित मानवता की सेवा में अर्पित कर देंगी।
आज आधुनिक भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी के रूप में सर्वसमादृत गुरुदेव जिनके साहित्य के माध्यम से विश्व ने बंगाल के मनप्राण को जाना, का जन्मदिन है। रविबाबू का गीत है, आमार सोनार बांग्ला। बंगाल के आक्रोशित युवक और युवतियों के हाथों में लट्ठ, ईंट, बुलडोजर देखकर, बंगाल की सडकों पर विनाश की प्रलयलीला देखकर, सोनार बांग्ला को विध्वंसेर बांग्ला के रूप मे परिणत होते देखकर क्या कविगुरु की आत्मा प्रसन्न हुई होगी? 1916 में जब गुरुदेव ने जापान की यात्रा की, उन्होने देखा कि जापानी लोग 1904 में रूस-जापान युद्ध में जापान की विजय और 1910 में कोरिया में स्थापित जापानी औपनिवेशिक प्रशासन के कारण दम्भ-स्फीत थे। उन्होने लिखा, “दिल्ली का कुतुबमीनार हिन्दू राजाओ की पराजय की नींव पर स्थित आक्रांताओं के अहंकार की मशाल है जिसे देखकर चित्त मे आनंद का उन्मेष नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे काशी मे औरंगजेब द्वारा बनाये गये मस्जिद मे न तो श्री-सौन्दर्य दृष्टिगोचर होता है, न ही शिव की भावना परिलक्षित होती है। लेकिन जब हम ताजमहल के सामने खड़े होते हैं, हमारे हृदय मे यह भाव उत्पन्न नही होता कि यह इमारत हिंदू की कीर्ति का आख्यान है या मुस्लिम की यशोगाथा है। हम अपने हृदय में इस ऐतिहासिक विरासत को मानवीय उपलब्धि के रूप में महसूस करते हैं। जापानी चेतना की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति गौरव की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्म-बलिदान की अभिव्यक्ति है जो हमारा आह्वान करता है, हमे आहत नहीं करता। इसी कारण से जापान में जहाँ भी मैं इस चेतना का विरोध देखता हूँ (रूस-जापान युद्ध के विजय की दर्प-दुन्दुभि की प्रतिध्वनि सुनता हूँ) मेरे हृदय में विशेष पीड़ा होती है। 1938 में जब उनके जापानी मित्र योने नोगुची ने चीन पर जापान के आक्रमण और चीनी जनता के नरसंहार का समर्थन किया, उन्होंने कठोर शब्दों में साम्राज्यवादी जापान की भर्त्सना की। उनकी दृष्टि में सच्चा बुद्धिजीवी सरकार का भोंपू नही होता, वह राजनेताओं के आगे घुटने नहीं टेकता, वह अपने प्रज्ञादीप से मानवता के कल्याण के शान्तिमार्ग को सतत आलोकित करता है। बंगाल के शीर्ष नेतृत्व से यह आशा की जाती है कि शपथग्रहण के समय वह रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्र पर पुष्प वर्षा ही न करे, उनके भाव को आत्मसात कर बंगाल के हर धर्म और जाति के उत्थान का संकल्प ले, यह प्रार्थना करे:
“विकसित करो,
हमारा अन्तःकरण विकसित करो, हे !
उज्ज्वल करो,
निर्मल करो,
सुन्दर कर दो, हे !
करो जाग्रत,
करो निर्भय,
करो उद्यत, निर्भय कर दो हे !” (गीतांजलि)
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.








