महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे

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When Mahatma Gandhi returned from South Africa

हात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे, तब उन्होंने ठेठ काठियावाड़ी परिधान में यह तस्वीर खिंचवाई थी। सूट-बूट पहनना तो ख़ैर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही छोड़ दिया था। यहाँ वे पारम्परिक भारतीय पोशाक में अलबत्ता वस्त्रों से लदे-फदे दिखलाई देते हैं। किन्तु सितम्बर 1921 में जब उन्होंने मदुरै में देखा कि भारत के अधिकांश ग़रीब लोग पूरे-तन के कपड़े भी पहन पाने में असमर्थ हैं, तब उन्होंने यह विलासिता भी त्याग दी। उन्होंने निश्चय किया कि वे भी साधारण ग़रीबों की तरह न्यूनतम वस्त्र पहनेंगे। फिर तब से अपने जीवन के अंतिम दिन तक महात्मा गांधी की वही पोशाक रही : धोती या लंगोट और चादर।

रिचर्ड एटेनबरो ने गांधी पर अपनी फिल्म में इस कथानक पर दो दृश्य रचे हैं। एक दृश्य में महात्मा गांधी रेलगाड़ी से देशाटन कर रहे हैं। एक जगह गाड़ी रुकती है तो वे उतरकर एक नदी किनारे जाते हैं। वहाँ देखते हैं कि एक ग्रामीण स्त्री फटी साड़ी के कारण अपनी लज्जा ढँकने में भी असमर्थ है। गांधी अपनी चादर उतारते हैं और नदी के प्रवाह में उसकी ओर बहा देते हैं। यह महाकाव्यात्मक ऊँचाइयों का दृश्य है और एक भारत-मूर्ति के रूप में देश के जनमानस से महात्मा गांधी की संलग्नता का रूपक है।

दूसरे दृश्य में चम्पारण सत्याग्रह की सफलता के बाद कांग्रेस नेताओं के निजी जलसे का चित्रण है। सभी वरिष्ठ नेता सूट-बूटधारी हैं। तभी महात्मा गांधी अपनी लंगोट में वहाँ प्रवेश करते हैं। नेहरू, पटेल, जिन्ना आदि उन्हें देखकर चकित रह जाते हैं। गांधी कहते हैं, उन्होंने अब बहुसंख्य देशवासियों जैसे ही वस्त्र पहनने का निर्णय ले लिया है। एक सेवक कुछ शरबत वग़ैरा लेकर दृश्य में प्रवेश करता है तो गांधी उसके हाथों से ट्रे लेकर स्वयं ही शरबत परोसने लग जाते हैं। नायक और अनुकर्ता के बीच द्वैत मिट जाता है। लोकोन्मुखी राजनैतिक-निष्ठा में अद्वैत की प्रतिष्ठा होती है!

मितव्ययिता सदैव स्वयं से शुरू होती है। त्याग और संकल्प भी। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ तो संसार में बहुत हैं, किन्तु जो दूसरों से कहते हैं, उसे पहले अपने जीवन में ढालकर बानगी प्रस्तुत करने वाले कम हैं। फिर महात्मा गांधी को जिस मिट्टी से रचा गया था, वह तो और विरली थी।

यही महात्मा गांधी जब 1931 में सम्राट जॉर्ज पंचम से मिलने बकिंघम पैलेस गए तो उन्होंने वही धोती-चादर की दरिद्र-दशा पहन रखी थी। इसे सम्राट की अवज्ञा माना गया। जब सम्राट ने गांधी से इंग्लिस्तान की कड़कड़ाती सर्दी के बावजूद इतने कम परिधानों में आने का कारण पूछा तो उन्होंने राष्ट्रवादी शैली में गरजकर यह नहीं कहा कि यही मेरे देश की वेशभूषा है। इसके बजाय उन्होंने एक गहरा कटाक्ष किया : “क्योंकि आपने हम दोनों के हिस्से के कपड़े अकेले ही पहन रखे हैं!”

जब कोई एक, दो जन के हिस्से के कपड़े स्वयं पहनता है, सौ के हिस्से के संसाधनों का दोहन करता है, और हज़ार के हिस्से की चीज़ों पर कब्ज़ा कर लेता है- तो यह व्यापक जनसमूह के लिए दरिद्रता रचता है। मितव्ययिता तब उनकी विवशता होती है, किन्तु महात्मा गांधी के परिप्रेक्ष्य में यह प्रतिकार की एक भंगिमा भी होती है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के शीर्ष नेता के पास एक जोड़ी वस्त्रों का अभाव नहीं था, किन्तु अपने चरखे की खादी से बुनकर पहनी गई धोती और चादर से उन्होंने स्वाभिमान का जो दृष्टान्त प्रस्तुत किया था, वह महत् था।

और सबसे बढ़कर, वह आत्मत्याग दूसरों की नज़रों के लिए, प्रचार-माध्यमों के लिए नहीं था, वह कोई ‘गिमिक’ या हथकण्डा नहीं था, वह स्वयं के परिशोधन की उसी कड़ी में था, जो महात्मा गांधी के पूरे जीवन में पृष्ठभूमि के अश्रव्य संगीत की तरह गूँजती रही थी : सत्य के अनवरत प्रयोग!

एक सच्चा नेता अपने आचरण, चरित्र और आदर्शों से अनुकरणीय होता है। किसी फ़रेबी की तरह उसमें कथनी-करनी का निर्लज्ज भेद नहीं हो सकता!


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