युद्ध के विरुद्ध पॉंच कविताऍं

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Ram sharan

— रामशरण —

सैनिक, स्त्री और सूरजमुखी के बीज

सायरन बजना बंद हो गया है
क्या सभी जगह सायरन एक-सा बजता है?
क्या सभी मौतें एक-सी होती हैं?

कुहासा और नीम अंधेरा

एक परछाईं आ रही है
कोई स्त्री है
बंदूक के सामने निडर।

‘क्यों हो तुम यहाँ?’
उसने मेरी भाषा में पूछा
वर्दी से उसने मुझे पहचान लिया था।

मैं निरुत्तर था
उसने फिर पूछा

मैंने अपनी जेब टटोली
नोट भरे हुए थे
जिनके कारण मैं आया था।
मैं क्या कहता?

क्यों हो तुम यहाँ?
मैंने अपना मन टटोला

दुश्मन है?
हितैषी है?
कुछ भी हो, कायर नहीं है।

क्या जवाब दूँ?
उसने फिर पूछा—
बार-बार पूछा—
तुम्हारी जरूरत क्या है यहाँ?
किसके लिए हो?

अपने देश के लिए,
इस देश के लिए
या एक तानाशाह के लिए?

उसने मुझे दिया
एक मुट्ठी सूरजमुखी के बीज
और कहा—
जेब में रख लो
तुम्हारे मरने पर
वहाँ ढेर सारे फूल खिलेंगे

सूरजमुखी के फूल
तुम उनके लिए खाद बनोगे
यही एक अच्छा काम होगा।
कहकर वह गायब हो गई।
(यूक्रेन की एक घटना से प्रेरित)

— सूर्यनाथ सिंह —

युद्ध : अबरा जबरा थपरा

मारता है पहले जबरा ही
और जब मारता है तो
चाहता है कि रोए भी नहीं अबरा
रोया अगर अबरा तो
खाता है एक और थपरा

दोष अबरा का यही कि
जबरा की खींची लकीर पर
रख देता है पांव कभी
चाहता है चुनना
पथ कोई मनचीता
कोई साथी कोई मनमीता
उठा देता है तर्जनी प्रतिकार में
हो जाता है खड़ा तन तान
अपनी अस्मिता
अपनी पहचान के बचाव में

जबरा को अभिमान अपनी भुजा पर
अबरा को चाहिए आजादी
जिसे अभिमान अपनी भुजा पर
देता कहां है वह आजादी किसी को
अबरा की जर जोरू जमीन पर
रहती ही है नजर हर पड़ोसी की
उन्हीं में से कोई जबरा
कोई दूसरा, दूसरों के साथ
फड़काने लगता है अपनी भुजा
अबरा के बचाव में

इस तरह
अबरा की छाती पर पांव रखे
भिड़ते हैं कई जबरा
कभी इसका थपरा
कभी उसका थपरा
बस सहता है अबरा।

umesh prasad singh— उमेश प्रसाद सिंह —

युद्ध के उन्माद में-

युद्ध के उन्माद में
जो युद्ध के विरुद्ध होते हैं
उन्हें हिकारत से तटस्थ
कहा जाता है।

इस तरह जो तटस्थ होते हैं
दोनों सेनाओंकी घृणा
और क्रोध के अयाचित हकदार होते हैं।

वे लड़ने वालों से
पहले ही मार दिये जाते हैं
उपेक्षा और अपमान के विष से
अपने ही घरों में।

वे न शहीद होते हैं
न बलिदानी
विजयोत्सव से वंचित है सौभाग्य जिनका
इतिहास उन्हें निकाल कर फेंक देता है
अपने गौरव के दूध में गिरी हुई मक्खी की तरह।

सीने से लगाकर सोता है समय
जिनकी ललकार उसके कानों में
गूँजती है।

जो युद्ध के षडयंत्र को देख लेते हैं
उनकीआँखे बेकाम करार कर दी जाती हैं
जिनके कान सुन लेते हैं दुरभिसन्धि की
गोपनीय खबरें
उनको बहरा बना दिया जाता है।

युद्ध के अपराध में
शामिल न होने वाले
सबसे बड़ेअपराधी
घोषित कर दिये जाते हैं
अपने समय में।

— केशव शरण —

युद्ध महान

अपना रथ भी दौड़ाऊं
बाण भी चलाऊं
और जीत भी लूं युद्ध महान
मेरी सैन्य-सुविधाएं क्या यही भगवान !

मैं वीर-गति को प्राप्त हो जाऊं
और पाऊं स्वर्ग में स्थान
इस सांत्वना के अलावा
और कुछ नहीं भगवान !

Ram Prasad bhairav— रामजी प्रसाद भैरव —

युद्ध

कभी युद्ध
हुआ करते थे
भूमि के स्वामित्व
को लेकर
देव असुर के रूप में
फिर जल के लिए
राजा राजा का युद्ध
दसराज्ञ के रूप में
फिर हुआ
भाई भाई का युद्ध
भूमि को लेकर
महाभारत के रूप में
बीच में राम रावण का युद्ध
जिसे कुछ लोग संस्कृति का
युद्ध मानते हैं
तो कुछ लोग साम्राज्यवादी
नीति के विरोध का युद्ध
मुझे लगता है
यह मनुष्य के अस्तित्व में
होने का संघर्ष है
जो होता रहेगा
तब तक
जब तक पृथ्वी से जीवन
नष्ट न हो जाय
धार्मिक भाषा में कहें तो प्रलय
यह भाषा शायद हर मनुष्य
समझता है।

सभी पेंटिंग : कौशलेश पांडेय

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