यह घोर मजदूर-विरोधी व्यवस्था है

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— मंजुल भारद्वाज —

भूमंडलीकरण ने श्रमिकों के मानवाधिकारों, श्रम की गरिमा, प्रतिरोध की आवाज, बेहतर पारिश्रमिक को तार-तार कर मालिकों के मुनाफे की राह को आसान कर दिया है।भूमंडलीकरण मजदूर और लोकतंत्र विरोधी है। भूमंडलीकरण ने मजदूरों के साथ ही साथ लोकतंत्र की संकल्पना, प्रक्रिया और मूल्यों को ध्वस्त किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक ने सरकारों पर मानवाधिकार, सामाजिक कल्याण की सभी योजनाओं को बंद करने का दबाव डाला और सरकारों को जनकल्याण के बजाय पूंजीपतियों के कल्याण की एजेंसी बना डाला है। आज सभी सरकारें पूंजीपतियों की मुठ्ठी में हैं।

सरकारों ने मजदूरों के हितों के सभी कानूनों को रद्द कर मालिकों के पक्षधर कानून बना दिए हैं। मजदूरों पर सबसे बड़ी चोट अदालत ने की है। भूमंडलीकरण के पक्ष में खड़ी अदालतों ने मजदूरों के संगठनों पर प्रहार कर यूनियन बनाने के अधिकार को ज़मींदोज़ कर दिया। सरकारों ने निजीकरण अपनाकर मजदूरों को ‘करो या मरो’ की सूली पर लटका दिया है। मजदूर असंगठित होकर शोषित हो रहे हैं और उनकी कोई भी सुनने वाला नहीं है। मालिकों ने जब चाहा काम पर रखा जब चाहा लात मारकर बाहर निकाल दिया। भूमंडलीकरण की ‘खरीदो और बेचो’ की नीति ने मजदूरों को सिर्फ काम करने की मशीन बनाकर उनके मानवाधिकारों का हनन किया है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण कोरोना काल में हुआ जब मजदूरों के साथ कोई भी नहीं खड़ा था। रातोरात मजदूरों को पैदल पलायन करना पड़ा। देश के हाइवे मजदूरों के रक्त से लहुलुहान हो गए।

याद कीजिए, लॉकडाउन में पैदल चलते मजदूरों को पुलिस ने पीटा था। भूख से बड़ी संख्या में मजदूर मर गए थे। चलते-चलते थक गए। रेल की पटरी पर सो गए और कट गए। मजदूरों के पैरों से बहते खून के निशान पूरे देश की सड़कों पर छप गए। गर्भवती महिलाओं (महिला श्रमिकों) ने खुले आसमान के नीचे हाइवे पर प्रसव किये और नाभिनाल काटकर नवजातों को लेकर पैदल चलने को मजबूर हुईं। ये हृदयविदारक दृश्य मीडिया में दिखाए गए। देशबंदी में सबने देखा और सरकार ने अदालत में कहा, पलायन करनेवाले मजदूरों का आंकड़ा उसके पास नहीं है।

सदियों की दासता, सामन्तवाद से संघर्ष करने के बाद दुनिया में मजदूरों ने 1 मई, 1886 को अपने अस्तित्व का परचम लहराया। महज 105 वर्षों में ही पूंजीवाद ने अपने पसीने की महक से विश्व का निर्माण करनेवाले मेहनतकश को नेस्तनाबूद कर दास बनाने का षड्यंत्र रच दिया। 1990 में भूमंडलीकरण ने विश्व के मजदूरों को दफन कर दिया।

निजीकरण के नाम पर एक फेसलेस यानी चेहरा विहीन अर्थव्यवस्था को लागू किया गया है। अदालतों ने दुनिया के 10 प्रतिशत अमीरों के मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर मजूदरों के संघर्ष के हथियार ‘हड़ताल’ पर कुठाराघात किया। मजदूरों के संघर्ष को महानगरों के चिड़ियाघर की तरह एक नुमाइश बना दिया। पूंजीवादी मीडिया ने मजदूरों को अपने समाचारपत्रों और चैनलों से गायब कर दिया है। सर्वहारा की खेवनहारी वामपंथी पार्टियां सोवियत संघ के विघटन के सदमे से आज तक नहीं सम्हल पायी हैं और न ही सम्हलना चाहती हैं। यूनियनें मजदूरों में राजनीतिक चेतना जगाने में नाकाम हैं। निजीकरण ने संगठित मजदूरों को दर-दर की ठोकरें खाने वाला भिखारी बना दिया और यूनियन की औकात ठेकेदार को धमकाने की भी नहीं रही, मांगें मनवाना तो दूर की बात है। सर्वहारा को मुक्ति दिलाने वाली पार्टियां मृत हैं।

पर जब अँधेरा घना हो जाता है तभी सुबह की पौ फटती है। मजदूरों को आज स्वयं को समझना होगा। अपनी मेहनत, जुनून और दुर्गम रास्तों पर चलने के साहस को फिर से परखना होगा। कुदरती संसाधनों के प्रतिबद्ध रखवाले हैं मजदूर। मजदूरों को कुदरती संसाधनों को लूटनेवाली मुनाफाखोर नस्लों से लोहा लेना होगा।

हे पशुता, दासता, सामन्तवादी सत्ताओं को उखाड़ अपना मुकद्दर लिखनेवाले, आज तुझे भूमंडलीकरण के खिलाफ खड़ा होना होगा! हे मुक़द्दस मेहनतकश संगठक उठ, आज विविधता और मनुष्यता की हत्या को रोकनेवाला बस तू ही है सर्वहारा! लोकतंत्र को पूंजी की कैद से तू ही आजाद कर सकता है। सत्ता के तलवे चाटता मुनाफ़ाखोर मीडिया और पूंजी की चौखट पर टॅंगी अदालतों की बेड़ियों को तू ही तोड़ सकता है।

अपने खून से लाल लिखनेवाले ऐ माटी के लाल, अब उठ, विकास के विध्वंस को रोक, पढ़े-लिखे, विज्ञापनों के झूठ को सच मानने वाले अनपढ़ों से तू ही धरती को बचा सकता है। हां, हमें पता है कि तुझे संगठित करनेवाले खुद अपनी-अपनी मूर्खता से विखंडित हैं। आज तुझे सिर्फ लाल झंडों की नहीं समग्र राजनीतिक समझ की जरूरत है। पता है, तू टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरा है पर अब तेरे जिंदा रहने के लिए तेरी मुठ्ठी का तनना जरूरी है। देख, तेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, तू आज जहाँ खड़ा है वहां सिर्फ मौत है!

याद रख, देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने तुझे संविधान की ताकत दी है। संविधान का पहला शब्द तेरी इबादत है। दुनिया में मजदूरों का इतना संवैधानिक सम्मान कहीं नहीं है। मार्क्सवाद के नाम पर बने तानाशाही साम्राज्यों में भी नहीं। ध्यान से पढ़ और समझ, संविधान के इन शब्दों को’ ‘हम भारत के लोग’ यानी हम भारत के मालिक हैं। इस संवैधानिक शक्ति से उठ और संगठित हो! अहिंसा का मार्ग अपना। संविधान सम्मत हथियार उठा अपने वोट को अपना इंकलाब बना! क्रांति सदियों का सपना नहीं तेरी उंगली का फलसफा है।

मजदूर की प्रतिबद्धता जिस दिन पेट से ज्यादा उत्पाद, मजदूरी से ज्यादा साझेदारी, लाचारी से ज्यादा आत्मविश्वास, अशिक्षा से ज्यादा शिक्षा, भाग्य से ज्यादा श्रम, भीड़ से ज्यादा समूह और मांग से ज्यादा अधिकार पर होगी- वही दिन सही मायनों में क्रांति दिवस होगा!

हाल ही में हुए किसान आंदोलन की तर्ज पर देश भर में मजदूर आन्दोलन की दरकार है। आज मजदूरों को स्वयं अपनी राजनीतिक चेतना की लौ जलानी होगी। अपने संख्याबल को संगठित कर, लोकतंत्र में अपनी संख्या के बल पर सत्ता पर काबिज हो, संसद में मजदूरों के हितों को बहाल करना है। अहिंसा व सत्य के मार्ग पर चलते हुए भारतीय संविधान का संरक्षण करने का वक्त है आज। आज मजदूर पूंजीवादी व्यवस्था में अंतिम व्यक्ति है। उसे अपने हकों के लिए लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष करना होगा! आज वक्त मजदूरों को आवाज दे रहा है, ’हम भारत के लोग’ की परिभाषा को सार्थक करने की चुनौती दे रहा है, संसद के मार्ग पर चलो और अपना मुक्ति गीत खुद लिखो!

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