स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा – मधु लिमये : 58वीं किस्त

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मधु लिमये (1 मई 1922 - 8 जनवरी 1995)

समापन 

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की समालोचना करते समय आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर हमने नजर डाली है। प्रारंभ में राष्ट्रीय कांग्रेस का आंदोलन इने-गिने उच्चवर्णीय और उच्चवर्गीय लोगों का आंदोलन बना रहा। धीरे-धीरे इसका जनाधार व्यापक होता गया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में इस आंदोलन को वास्तव में जन आंदोलन का स्वरूप प्राप्त हुआ। फिर भी राष्ट्रीय तथा विभिन्न प्रांतों के नेतृत्व का यदि विश्लेषण हम करें तो हमें यह स्वीकारना पड़ेगा कि स्वतंत्रता आंदोलन की बदौलत हिंदुस्तान में स्थानीय निकायों, प्रांतों और केंद्र में जो क्रमशः स्वाधीनता अधिकार मिले उनका इस्तेमाल भी गरीबों, पीड़ितों और दलितों के उत्थान के लिए नहीं हुआ। कुछ छिटपुट कानून और कार्य ऐसे हुए जिससे साधारण लोगों को राहत मिली। लेकिन मोटे तौर पर राजनैतिक सत्ता का इस्तेमाल भद्र लोगों या अगली जातियों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ही किया। यह बात उल्लेखनीय है कि जब 1937 और 1939 के बीच कांग्रेस ने आठ राज्यों में अपनी सरकारें बनाईं तो एक अपवाद को छोड़कर शेष सभी राज्यों में जो मंत्रिमंडल-प्रमुख नियुक्त हुए वे अगली जातियों के ही नहीं बल्कि सिर्फ ब्राह्मण जाति के ही थे। अपवादस्वरूप अकेले डॉ. खां साहब मुस्लिम बहुसंख्यक सीमावर्ती प्रांत के मुख्यमंत्री बने थे।

1942 के आंदोलन में बड़े पैमाने पर साधारण शहरी जनता, किसानों और ग्रामीणों में अद्भुत चेतना जगी जिसके फलस्वरूप राजनैतिक सत्ता में वे साझेदारी माँगने लगे। इसका कुछ असर 1946 के चुनावों के बाद दिखाई देने लगा था। आज स्वतंत्रता के पैंतीस साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन आज भी सही मायनों में राजनीतिक प्रशासन और आर्थिक व्यवहार में पिछड़े और दलित वर्गों को उचित साझेदारी नहीं मिल पायी है, यह मानना ही पड़ेगा। यदि मिली है तो केवल संपन्न किसान समुदायों को ही।

हमारे मुल्क में जातीयता की भी अजीब व्यवस्था है। इसीलिए स्वतंत्रता आंदोलन के उदात्त मूल्यों में सामाजिक समानता को जोड़ा गया, सामाजिक समानता का यह मतलब नहीं कि लोग संकीर्ण दायरों में सोचें, यानी कोयरीवाद, कुर्मीवाद, यादववाद, कम्मावाद अथवा इसी तरह के वाद चलाएं। सामाजिक समता का स्पष्ट मतलब है कि सबका सामाजिक दर्जा एक-सा हो और अगली, पिछड़ी जातियों जैसी संज्ञाओं की अहमियत खत्म हो जाए। हमारे संविधान में दलितों और पिछड़ों को जो विशेष अवसर और संरक्षण देने की बात कही गयी हैं, उसके पीछे यही भावना है।

स्वतंत्रता आंदोलन का एक उद्देश्य राष्ट्रीय एकता की स्थापना करना भी था। अतः ज्यों-ज्यों आंदोलन असरदार और पैना होता गया हिंदुस्तान के विभिन्न इलाके इसमें शामिल होने लगे। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह भी रही कि जैसे-जैसे गैर-मुस्लिम इलाके कांग्रेस की विचारधारा से प्रभावित होने लगे, वैसे-वैसे मुस्लिम लीग का असर मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में बढ़ने लगा। इसकी स्पष्ट झलक 1945 के सेंट्रल असेंबली चुनावों में दिखाई दी जबकि मुल्क पूरी तरह दो हिस्सों में बँट गया– एक तरफ कांग्रेस, गैर-मुस्लिम और गैर-मुस्लिम क्षेत्र तथा दूसरी ओर मुस्लिम लीग, मुस्लिम बहुसंख्यक के इलाके और मुस्लिम। संयुक्त हिंदुस्तान के सपने को साकार करने के लिए यह जरूरी था कि पंजाब और सिंध राष्ट्रीयता की मुख्यधारा में आ जाते। सिर्फ सीमावर्ती इलाके में कांग्रेसी हुकूमत होना काफी नहीं था। परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया। जब सांप्रदायिक उपद्रवों के कारण यूनियनिस्ट मंत्रिमंडल का पंजाब में टिके रहना असंभव हो गया और कलकत्ता, नोआखली और बिहार से लेकर पंजाब तथा सीमावर्ती इलाकों तक दंगों की आग फैल गयी तो हिंदुस्तान को एक सूत्र में पिरोये रखने का स्वप्न भी बिखर गया।

1912 से लेकर 1922 तक देश में हिंदू-मुसलमानों में राजनैतिक एकता थी। मुस्लिम लीग और खिलाफत कमेटी कांग्रेस से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थीं। लेकिन खिलाफत आंदोलन समाप्त होने के बाद यह स्थिति नहीं रही। 1925 का सर्वदलीय सम्मेलन असफल होने के बाद हिंदू-मुसलमान राजनैतिक एकता की बातचीत से गांधी जी ने अपने आपको बिल्कुल अलग कर लिया। 1937 में जब प्रांतीय स्वायत्तता का प्रयोग शुरू हुआ तो उसके पहले और चुनावों के तुरंत बाद मुस्लिम लीग से समझौता करने की संभावना को कांग्रेस द्वारा नकार दिया गया। जब मुसलमानों ने देखा कि लोकतांत्रिक प्रणाली और जवाबदेह सरकार लागू करने का मतलब होगा कि अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की एकछत्र हुकूमत कायम हो जाएगी, तो उनमें बड़े पैमाने पर असंतोष उत्पन्न हो गया। इस असंतोष का एक चाल के रूप में प्रयोग करके राजनैतिक लाभ उठाना तब मुस्लिम लीग और जिन्ना साहब के लिए बहुत आसान हो गया। नतीजतन कांग्रेस और मुस्लिम लीग के रास्ते अलग-अलग हो गए और मुल्क का बँटवारा अनिवार्य जान पड़ने लगा। आखिर तक कांग्रेस नेता कहते रहे कि पाकिस्तान असंभव है, लेकिन वे यह नहीं जान सके कि उनके पैरों के नीचे से जमीन तेजी से खिसक रही थी।

मुल्क का बँटवारा तो हो गया लेकिन बँटवारे के बाद भी इस समस्या का आज तक कोई संपूर्ण हल नहीं निकल पाया है। आज भी भारतीय मुसलमान पूरी तरह राष्ट्र की मुख्यधारा में अपने आपको शामिल नहीं पाते हैं। आज भी उन्हें अपनी पहचान की समस्या परेशान कर रही है और सही नेतृत्व के अभाव में वे राजनीति में अपना रोल अदा नहीं कर पा रहे हैं। सत्ताधारी दल द्वारा क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिक्ख, क्या हरिजन सभी को अलग-अलग रखने का यथासंभव प्रयास होता रहा है और हो रहा है ताकि सत्ता पर उसका एकाधिकार बना रहे। सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं है कि देश बचे या टूटे, अर्थात् अन्ततः सारांश यही निकलता है कि राष्ट्रीय आंदोलन मुल्क की एकता को बरकरार रखने में पूर्णतः असफल रहा। उधर पाकिस्तान के राष्ट्रवाद का भी हमारे जैसा ही हश्र हुआ। वे न इस्लाम के सूत्र को और न पाकिस्तानी राष्ट्रीयता और राज्य की एकता के सूत्र को बचा पाए हैं।

पीछे हमने स्वतंत्रता आंदोलन की आर्थिक नीति का भी विश्लेषण किया था जिसके फलस्वरूप हमें पता चला कि यह मुख्यतः दो वर्गों के हितों के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटती रही थी। एक वर्ग था अंग्रेजी पढ़े-लिखे संपन्न और संभ्रांत लोगों का, जो प्रशासन में हिस्सेदारी चाहता था, और दूसरा था नवोदित उद्योगपतियों का, जो अपने उद्योगों के लिए राज्य का संरक्षण, प्रोत्साहन और सहायता चाहता था ताकि विदेशी माल की स्पर्धा से निजात पा सकें।

गांधीजी के राजनीति में प्रवेश के बाद इस विचारधारा में थोड़ा व्यतिक्रम आया था। उनकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों तथा हस्त व्यवसायों के हित का विचार राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के मन में आया। फिर भी 1936 तक पूँजीपतियों और जमींदार वर्ग को किसी भी रूप में नाखुश करने के लिए वे तैयार नहीं थे। इसीलिए 1934 में कांग्रेस ने वर्ग युद्ध के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था जिसमें इन संभ्रांत वर्गों को आश्वस्त किया गया था कि कांग्रेसी राज में उनके हितों की रक्षा की जाएगी। यह स्थिति भी धीरे-धीरे ही बदली। आर्थिक कारणों को भारत की गरीबी का जिम्मेदार माननेवाले जो उग्र तत्त्व कांग्रेस में थे वे तब प्रबल होने लगे थे जिस कारण 1946 के चुनावों तक कांग्रेस किसानों की कुछ प्रमुख माँगों के प्रति वचनबद्ध हुई। जैसे अलाभकर जोतों पर से लगान समाप्त करना, किसानों के ऋण को घटाना और सबसे महत्त्वपूर्ण जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करके काश्तकार और सरकार के बीच सीधा रिश्ता स्थापित करना। साथ ही साथ औद्योगिक मजदूरों को भी बोहतर सुविधाएँ, जैसे न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे, यूनियन बनाने का अधिकार आदि के आश्वासन दिए गए। अतः मोटे तौर पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय संविधान ने पूंजीवादी समाज व्यवस्था का रास्ता ही प्रशस्त किया।

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