इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका – एम.एन. राय : चौथी किस्त

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एम.एन. राय (21 मार्च 1887 - 25 जनवरी 1954)

(भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी होने के बावजूद अन्य धर्मावलंबियों में इस्लाम के प्रति घोर अपरिचय का आलम है। दुष्प्रचार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के फलस्वरूप यह स्थिति बैरभाव में भी बदल जाती है। ऐसे में इस्लाम के बारे में ठीक से यानी तथ्यों और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य समेत तथा मानवीय तकाजे से जानना समझना आज कहीं ज्यादा जरूरी है। इसी के मद्देनजर हम रेडिकल ह्यूमनिस्ट विचारक एम.एन. राय की किताब “इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका” को किस्तों में प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है, यह पाठकों को सार्थक जान पड़ेगा।)

स बात के प्रमाणों का अभाव नहीं है कि जब सरासेनी (अरब) योद्धाओं ने अपनी वीरता से लोगों को पराजित कर उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया तो उस दौर में भी उनका व्यवहार बर्बर हत्यारों और लुटेरों के समान नहीं था, जो अपने आक्रमणों के बाद लूटपाट, औरतों के साथ दुर्व्यवहार, हत्या और विनाश, धर्म के नाम पर किया करते थे। इसके साथ ही उनकी विजयों का दौर थोड़े समय चला और खलीफाओं के संरक्षण, ज्ञान और संस्कृति के प्रसार का लंबा युग शुरू हुआ और यही बात उनके अधीन स्वतंत्र साम्राज्यों में भी फैली। बगदाद में अब्बासियों की हुकूमत कायम होने के बाद युद्धकाल समाप्त हो गया और बगदाद को शांति का नगर बनाया गया, जैसा कि एक सौ वर्ष पहले हजरत मुहम्मद ने मदीना शहर को बनाया था। उसके बाद अरब सेनाओं के कार्यकलाप सुरक्षात्मक थे और दूरदराज के राज्यों पर ही उनके आक्रमण होते थे।

सरासेनी (अरब) योद्धाओं का अदम्य उत्साह समय बीतने और समृद्धि पाने के बाद नरम पड़ गया। उन लोगों ने युद्ध के द्वारा धन एकत्र करने के बजाय व्यापार और उद्योग के द्वारा धन अर्जित करना शुरू किया। उन्होंने युद्ध के मैदानों में यश प्राप्त करने के बजाय विज्ञान और साहित्य के द्वारा यश का अर्जन किया। उनमें केवल एक-ईश्वर की कट्टर आराधना से ही नहीं, वरन सामाजिक और पारिवारिक जीवन से आनन्द पाने की इच्छा जागृत हुई। अब उनमें युद्ध का उन्माद नहीं रह गया था जिसके लिए सरासेनी अरब योद्धा प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे संसार में शांति स्थापित करने और शांतिमय संसार की रक्षा में दिलचस्पी लेने लगे थे, जो उनके पूर्वजों ने स्थापित की थी। सरासेनी अरब योद्धाओं के पूर्वज अबूबकर और उमर के झण्डों के नीचे एकत्र हुए थे। उन्हें यह विश्वास था कि धर्मयुद्धों में वीरगति पाने पर उन्हें स्वर्ग प्राप्त होगा और विजय प्राप्त करने से उन्हें संसार में धन और संपत्ति मिलेगी। लेकिन उन पूर्वज योद्धाओं की संतानों को व्यापार और उद्योग में अधिक संतोष मिलता था।

तीन सौ वर्षों की शांति, समृद्धि और उन्नति के युग में वीरता के लक्षण में जो कमी आयी थी वह ईसाइयों के कथित धर्मयुद्ध के आक्रमण से पुनः जागृत हुई। जब मुसलमान सैनिकों में मध्य एशिया के बर्बर मंगोल सैनिकों की संख्या सरासेनी अरब सैनिकों से अधिक हो गई तो मुसलमानों की विजय में लूटपाट, अत्याचार और दमन अधिक होने लगा था। अरब लोगों की विद्वत्ता और संस्कृति शासकों के दरबारों के विलासपूर्ण जीवन के प्रभाव से नष्ट हो गयी और इस्लाम के गौरवपूर्ण आत्माभिमान का क्रांतिकारी रूप नष्ट हो गया और इस्लाम के नाम पर तुर्क और तातारी सैनिकों के कुकृत्यों का बोलबाला हो गया।

इस्लाम के इतिहास को केवल युद्धवाद के रूप में समझना एकदम गलत बात है। हजरत मुहम्मद केवल सरासेनी योद्धाओं के ही रसूल (मसीहा) नहीं थे, वरन वे अरब व्यापारियों के भी रसूल थे। उनके धर्म का जो नामकरण है उससे उसके लक्ष्य के संबंध में प्रचलित धारणा का खंडन होता है। शाब्दिक अर्थ के रूप में इस्लाम का अर्थ शांति है : उसका लक्ष्य अल्लाह से शांति संबंध स्थापित करना है और उसकी भावना से एकाकार होना है। इस्लाम ने मूर्तियों में धोखे से ईश्वरीय भावना समझने का खंडन किया था क्योंकि उनके द्वारा मानव की भक्ति भावना पर एकाधिकार कर लिया गया था। इस्लाम का लक्ष्य अरब-एकता स्थापित करके संसार में शांति स्थापित करना था। उसके लिए संसार में शांति का तात्कालिक महत्त्व था और उसके फल का अधिक महत्त्व था। अरब व्यापारियों के भौतिक हितों के लिए भी यह लाभदायक था क्योंकि शांति में ही व्यापार का प्रसार संभव था। शक्तिहीन राज्य और पतित धर्मों से ऐसे कीटाणु फैले थे जिनके कारण निरंतर विद्रोह और युद्ध होते रहते थे। इन कारणों को समाप्त करना शांति के लिए आवश्यक था। हजरत मुहम्मद के धर्म ने अरब में शांति स्थापित की और सरासेनी अरब योद्धाओं की वीरता और शौर्य से समरकन्द से स्पेन तक अरब साम्राज्य स्थापित हो गया।

जैसे ही अरब लोगों का देश पर आधिपत्य स्थापित हो गया, उसके आर्थिक जीवन में उद्योग और कृषि को प्रोत्साहन दिया गया। इस्लामी राज्य की नीतियों को निर्धारित करने में अरब व्यापारियों की भावना और हितों का प्रभाव था। रोम साम्राज्य और सभी प्राचीन सभ्यता वाले देशों में शासक वर्ग उत्पादक श्रम को हेय दृष्टि से देखते थे और व्यापार तथा उद्योग को भी  नीची निगाह से देखते थे। अरब लोगों का दृष्टिकोण इससे भिन्न था। मरुस्थल के घुमंतू जीवन ने उन्हें श्रम का प्रशंसक बना दिया था और उसे वे स्वतंत्रता का स्रोत समझते थे। उनमें व्यापार भी प्रतिष्ठादायक  काम माना जाता था और स्वतंत्र व्यक्तियों के लिए उसको सम्मानजनक लाभदायक माना जाता था।

इस प्रकार इस्लामी राज्य पुरानी व्यवस्थाओं की तुलना में नवीन सामाजिक संबंधों पर आधारित था। व्यापार और व्यवसाय मुक्त थे और उनमें लगे लोगों को राज्य कर्मचारियों- युद्ध, ज्ञान और विज्ञान के कर्मचारियों की भांति ऊँचा स्थान प्राप्त था। बगदाद के खलीफा केवल बड़े व्यापारी ही नहीं थे, वरन् वे विद्वान् थे और वे स्वयं कुछ ऐसा काम करते थे जिससे अपने जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन अर्जित कर सकें। अधिकांश अरब दार्शनिक और विद्वान संपन्न व्यापारिक परिवारों से आए थे। बुखारा और समरकंद के राज-दरबारों की संस्कृति और नफासत, अफ्रीका के फातमी शासकों की दयालुता और अंडालूसिया के सुलतानों का वैभव समृद्ध व्यापार से उत्पन्न हुआ था, न कि केवल निरंकुश ढंग से वसूले गए करों से।

(जारी)

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