सुधा उपाध्याय की पांच कविताएं

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पेंटिंग : कौशलेश पांडेय

सवाल : एक

निहायत ही आसान तरीके से उनसे पूछा,
मैं हिन्दू हूं, कब तक सुरक्षित रहूंगा?
उन्होंने कहा, जबतक तुम्हारे सवाल
तुम्हारे मुंह में क़ैद हैं।

मैंने फिर से पूछा
अगर मुसलमान हुआ, तब कब तलक सुरक्षित हूं?
उन्होंने कहा, मौत की राह देख, तरीके हम बताएंगे।

मुझे लगा, उधर ज़ुबान को बांधकर रखा है
इधर मौत को कब्ज़े में किया है
क़ैद और मौत की इस नई परिभाषा में उलझा
कुछ बोलता उससे पहले मेरे हाथ ऊपर उठे
उनके लोगों ने ‘मेरे’ और ‘धर्म’ के बीच की दूरी को भांप लिया
देशद्रोही करार दिया और मार दिया।

इस देश का सबसे बड़ा सच है भ्रम
जो सवाल उठाते हैं वो देशद्रोही।
इस भ्रम और देशद्रोह में रह गए वो सारे सवाल
जो पूछने आया था मैं
सवाल, जो पूछती है अकसर खाली जेब,
पूछती है, फटे जूते और घिसटते तलवे की तू-तू मैं-मैं,
फटी साड़ी को तहों में खुद को छुपाती मां की आंखें
पूछती है, अपने ही खेत में एक साथ फांसी लगाने से पहले
बाप और बेटे के बीच आंखों-आंखों से कही गई अनकही बातें,
पीटने वाले की मार और पिटने वाले की चीख,
नजीब की अम्मी, जिनके आंसू न तो हिन्दू हैं न मुसलमान
और ऐसे ही रह गए अनगिनत सवाल।

जानता हूं इन सवालों की कोई अहमियत नहीं
कल फिर से होगा एक और बड़ा इवेंट
हर तरफ होगा जयघोष
कमल पर नाचेंगी औरतें और मर्द
और दूर से बहुत सारे लोग
टीवी पर देख रहे होंगे फिल्म।

सवाल : दो

फेसबुक पर एक स्टेटस डाला
“सवाल उठाने वालों की खैर नहीं”
उनके लोगों ने तो पहले नक्सली कहा
फिर देशद्रोही का तमगा पहनाकर
गढ़ दिया गालियों का नया शब्दकोश।
इस तरह संवादहीनता के बीच
मेरा सवाल हार गया और
पत्थरबाज़ को जीप से घसीटने वाला बहादुर कहलाया।

सवाल : तीन

वो झूम-झूमकर बोलता रहा
जानते थे कि झूठ है सारी बातें
फिर भी सुनते रहे चुपचाप
बीच-बीच में फुसफुसा लेते हम आपस में।
ग्लोबल वॉर्मिंग की तरफ वह बढ़ता गया
नदियां सूखने लगीं, समंदर फैलता गया
हम सिमटते गए, घरों, दीवारों और तहखानों में।
बाहर घूम रहे हैं ट्रंप, पुतिन और मोदी
न जाने गांधी कौन था?

पेंटिंग : भारत गुप्ता

सवाल : चार

बनारस के हिन्दू बुनकर मजदूरों ने पूछा
हमारी क्या गलती?
हम तो हिन्दू हैं
फिर भी इतने गरीब क्यों?
भेदभाव तो मुसलमानों के साथ है।
अफसोस से झुक गईं आंखें
नज़र उठाई तो देखा
एक गाय पॉलिथीन भरे कूड़े को चबा रही है।

सवाल : पांच

क्या यही #लोकतंत्र है

एकांगी लोग
एकांगी धर्म
एकांगी पत्रकारिता
एकांगी संसद
एकांगी गुंडे
एकांगी अपराध
एकांगी पीड़ित
सब एकांगी होता जा रहा है
यहाँ चलती है सिर्फ
शाह और शहंशाह की
और मन की बात
सिर्फ एक की सुनी जाती है
फिर भी कहते हो
यह लोकतंत्र है
क्या यही लोकतंत्र है???

8 COMMENTS

  1. अच्छी कविताएँ। आज के जरूरी सवालों को उठाती कविताएँ। लोक और तंत्र की असलियत को बयान करती कविताएँ।

  2. बेहतरीन कविताएँ । समसामयिक महत्व की कविताएँ ।
    अपने कथ्य और शिल्प में अलग पहचान रखती है आपकी कविताएँ ।

  3. वर्तमान को सवालों के घेरे में खड़ा करती कविताएं यकीनन उन दबी आवाजों को बुलंद करती हैं जो आज के धार्मिक उन्माद में कही सुनी नहीं जाती।

  4. नमस्ते साथियों आपको भी जानकर हर्ष होगा …हर अंधेरे का एक सुप्रभात तय होता है। हर रात की सुबह होती है। रोज़ केवल उठे ही नहीं उठायें अपने अपने को केवल खुद ही ना जगे ..जगायें अपने अपनों को भी। आप सब मेरे अपने हैं …आपको आज यह प्रसन्नता साझा करती हूँ साहित्य समय और समाज की बेहतरीन पेशकश समता पोर्टल लगातार अंधेरों से जूझ रहा है सबको प्रकाशित करना सबके पोर पोर में रौशनी भरना। कोने अंतरों से समाज राजनीति और परिवेश में पसरी विसंगतियों को पकड़ना समता मार्ग पोर्टल की खूबी है। आज इतवार हमको प्रकाशित किया हृदय से आभार…. https://samtamarg.in/2022/11/13/five-poems-of-sudha-upadhyay/#comment-4863

  5. सभी कविताएं बहुत बढ़िया है, मगर “सवाल एक” दिल को ज्यादा छू लिया। Congratulations Sudha ji

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