भारत तिब्बत मैत्री संघ का राजगीर घोषणापत्र और कार्ययोजना

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भारत तिब्बत मैत्री संघ के नौवें राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रो सामदांग रिनपोछे, राजगीर, 31 अक्टूबर 2022

4 दिसंबर। भारत-तिब्बत मैत्री संघ का नौवां दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मलेन विगत 31अक्तूबर एवं 1 नवम्बर 2022 को राजगीर (बिहार) के इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में सम्पन्न हुआ था। तिब्बत की आजादी और हिमालय बचाओ अभियान से जुड़े देश भर के कोने-कोने से आए एवं स्थनीय स्तर के लगभग तीन सौ प्रतिनिधियों ने इस राष्ट्रीय सम्मलेन भाग लिया था। इस सम्मेलन ने जो घोषणापत्र जारी किया और कार्ययोजना तय की, वह इस प्रकार है –

राजगीर घोषणा-पत्र एवं कार्ययोजना

सन् 1949 में कम्युनिस्ट चीन ने तिब्बत को अपने कब्जे में लेने की कुचेष्टा प्रारम्भ की। उसी समय डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि चीन रूपी राक्षस एक शिशु (तिब्बत) को दबोच रहा है। 1959 में तो परम पावन दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में निष्क्रमण करना पड़ा। सर्वप्रथम लोकनायक जयप्रकाश जी ने तिब्बत को लेकर विश्व के देशों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए 30 मई, 1959 को कलकत्ता में सम्मेलन आयोजित किया। तभी लोगों के ध्यान में आया कि चीन ने किस तरह तिब्बत को दबोच लिया है। तिब्बत के लोग चीनी उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, आचार्य जे.बी. कृपालानी, डॉ. आंबेडकर, श्री जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, श्री दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. रघुवीर और एम.सी. छागला जैसे भारतीय नेतागण तिब्बत पर चीनी कब्जे के विरोध में और तिब्बत की स्वाधीनता के पक्ष में हमेशा बोलते रहे हैं।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ तिब्बत समर्थक समूह की सबसे पुरानी संस्था है। तिब्बत की स्वाधीनता का समर्थन तथा हिमालय नीति के निर्माण के लिए जनमत तैयार करना ही इसका मूल उद्देश्य है।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ का राजगीर सम्मेलन चीनी शासन की तिब्बत में अलोकतांत्रिक नीतियों की आलोचना करता है। साथ ही तिब्बती जनता द्वारा अहिंसक प्रतिरोध का समर्थन करता है। चीनी शासन के बढ़ते दमन एवं अमानवीय व्यवहारों का विरोध करते हुए एक सौ अट्ठावन (158) युवा, भिक्षु, भिक्षुणी तथा आमलोगों को आत्मदाह करना पड़ा है। इस तरह के विरोध के बावजूद इसकी प्रक्रिया थमने का नाम नहीं ले रही है। हमलोग उनके जज्बे को सलाम करते हैं।

तिब्बत के सबसे बड़े बौद्धधर्म संस्थान ‘लारुंग गार’ को हाल ही में ध्वस्त कर दिया गया। तिब्बती भिक्षुओं के संस्थान ‘याचेन गार’ को ध्वस्त करने के बाद हजारों भिक्षुणियों को वहां से विस्थापित कर दिया गया। 17 फरवरी, 2018 को त्सुलावखांग के जोखांग मंदिर में आग लगने की बहुत बुरी खबर आई। इसे यूनेस्को ने विरासत का दर्जा दे रखा था। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि चीनी शासक तिब्बती लोगों के धार्मिक अधिकार में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

तिब्बत के नैसर्गिक वनों, घने विशाल जंगलों एवं प्राकृतिक संसाधनों का जिस अमानवीय तरीके से चीन ने शोषण किया है, उसके परिणामस्वरूप पर्यावरण में गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो गया है। तिब्बत ऊंचाई पर बसा एक ऐसा देश है जो एशियाई देशों में बहनेवाली दस प्रमुख नदियों का उदगम स्थल है। पर्यावरणविदों के अनुसार, इस कारण अधिकांश नदियां सूखने की स्थिति में आ गई हैं, अथवा उनका बहाव कम हो गया है। उत्तर-पूर्व और असम में बहनेवाली ब्रह्मसपुत्र नदी की धारा को उलटकर चीन की ओर करने का काम चीनी शासकों ने शुरू कर दिया है।

तिब्बत में 46,000 चिह्नित ग्लेशियर होते थे। तापमान में जिस तरह वृद्धि हो रही है, उससे अनुमान लगाया जाता है कि 2030 तक 60 प्रतिशत ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे। तिब्बत को परमाणु कचरे का कूड़ादान बना दिया गया है। तिब्बत के पर्यावरण को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समाज को सामूहिक कार्रवाई करने की जरूरत है ताकि तिब्बत को पर्यावरणीय विनाश से बचाया जा सके। इसका गंभीर वैश्विक निहितार्थ है क्योंकि ‘तिब्बत’ दुनिया की छत है। यह समूचे पृथ्वी ग्रह को प्रभावित करता है।

सम्मेलन तिब्बत में मानवाधिकार की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त करता है। चीनी शासक वर्ग द्वारा तिब्बती जनता के मौलिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता को ही छीन लिया गया है। वहां से तिब्बती जनता को विस्थापित कर चीनी नागरिकों को बसाया जा रहा है।

तिब्बती युवक-युवतियों को चीनी युवक-युवतियों से शादी करने के लिए जबरदस्ती किया जाता है। शिक्षा की व्यवस्था भी चीनी भाषा में की जा रही है। शिक्षा नीति में भी परिवर्तन कर शिक्षा जगत में चीनी हस्तक्षेप बढ़ रहा है। इस प्रकार से तिब्बती भाषा, संस्कृति और सभ्यता को चीनी शासक नष्ट करने में लग गए हैं।

कैलाश-मानसरोवर जैसे पवित्र तीर्थस्थल को चीन ने कमाई का जरिया बना रखा है। इसके प्रति भारत सरकार का भी रुख उदासीन है। इसके प्रति सम्मेलन क्षोभ व्यक्त करता है।

परम पावन दलाई लामा के भारत आगमन का यह 63वां वर्ष है। इस अवसर पर परम पावन दलाई लामा द्वारा बार-बार विनम्रतापूर्वक दोहराई जा रही इस गंभीर चिंता को हम स्वीकार करते हैं कि नैतिक और आचारगत मूल्यों का चारों तरफ विघटन हो रहा है। हम भारतीयों को नालंदा परंपरा से निकले हुए प्राचीन मूल्यों की ओर लौटने की पहल करनी चाहिए। विश्व शांतिदूत परम पावन दलाई लामा का भारत में होना हम भारतीयों के लिए गौरव की बात है। हम भारतीयों को परम पावन के इस महान अवदान के लिए कृतज्ञ होना चाहिए और उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करना चाहिए।

सम्मेलन मांग करता है कि यथाशीघ्र परम पावन दलाई लामा और तिब्बत की निर्वासित सरकार और चीनी सरकार के नेताओं के बीच एक सार्थक वार्ता हो। यही तिब्बत के प्रश्न को हल करने का एकमात्र सम्मानजनक रास्ता है। वार्ता में आए गतिरोध को दूर कर इसे पुन: शुरू करना चाहिए।

सम्मेलन इस बात को मानता है कि तिब्बत का आंदोलन वास्तव में भारत का आंदोलन है। भारत-तिब्बत मैत्री संघ मानता है कि देश के युवाओं, महिलाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं आम जनता के बीच तिब्बत पर लिये गये संकल्प एवं गतिविधियों को अधिक व्यापक, सुसंगठित और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए भारत- तिब्बत मैत्री संघ तथा भारत स्थित तिब्बती संगठन प्रभावशाली समयोग एवं समन्वय से कार्य करेंगे।

कार्य योजना

भारत तिब्बत मैत्री संघ का नवम राष्ट्रीय सम्मेलन निम्नलिखित कार्ययोजना को स्वीकार करता है –

1. भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। परम पावन दलाई लामा को भी भारत आए साठ वर्ष से अधिक हो चुके हैं। भारत सरकार से अनुरोध है कि वह भारत के जनमानस का सम्मान करते हुए परम पावन दलाई लामा को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करे। इसके लिए चलाए जा रहे अभियान में और तेजी लाई जाए। परम पावन दलाई लामा के जन्मदिन 6 जुलाई को विभिन्न इकाइयां सभा और संगोष्ठी करेंगी और भारत रत्न देने की मांग करेंगी। भारत-तिब्बत मैत्री संघ की अलग-अलग इकाइयां हस्ताक्षर अभियान भी चलाएंगी।

2. परम पावन दलाई लामा एवं तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रतिनिधियों के साथ चीन सरकार की वार्ता पुन: प्रारम्भ कराने के लिए भारत सरकार पहल करे। इसके लिए विश्व के सभी मंचों पर भारत को पहल करनी चाहिए। भारत-तिब्बत मैत्री संघ 10 मार्च तिब्बत जनक्रांति दिवस के अवसर पर प्रदर्शन, सभा, सत्याग्रह और संगोष्ठी के माध्यम से जनमत तैयार करेगा ताकि भारत सरकार पर इसका असर दीख सके।

3. तिब्बत में मानवाधिकारों की दयनीय स्थिति पर सम्मेलन चिंता व्यक्त करता है। 10 दिसंबर विश्व मानवाधिकार दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर आमलोगों को वहां मानवाधिकारों की दयनीय स्थिति से परिचित कराया जाएगा। प्रस्तावों के माध्यम से भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र को जगाने का कार्य होगा ताकि उनके हस्तक्षेप से वहां (तिब्बत में) मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार हो सके।

4. सम्मेलन चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का सघन अभियान चलाने का निर्णय लेता है। स्थानीय स्तर पर गोष्ठ‍ियों और प्रदर्शन के माध्यम से आम जनता को बहिष्कार के लिए जागृत किया जाएगा। समय-समय पर चीनी सामग्रियों को टोकन रूप में जलाकर भी लोगों को बहिष्कार के लिए प्रेरित किया जाएगा।

5. भारत-तिब्बत मैत्री संघ की इकाइयां अपने स्थानीय जन प्रतिनिधियों को संपर्क कर अभियान चलाएंगी कि भारत की संसद में तिब्बत पर बहस हो। यह सम्मेलन मांग करता है कि परम पावन दलाई लामा को भारतीय संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने के लिए सादर आमंत्रित किया जाए। इस दिशा में आवश्यक कदम उठाया जाएगा। लोकसभा के अध्यक्ष से भारत-तिब्बत मैत्री संघ का प्रतिनिधिमंडल मिलकर प्रस्ताव की भावना से उनको अवगत कराएगा।

6. एक सुखद समाचार है कि कल सम्मेलन को माननीय मुख्यमंत्री, बिहार का संदेश प्राप्त हुआ है। उनके प्रतिनिधि भी यहां उपस्थित थे। बिहार सरकार ने बोधगया में परम पावन दलाई लामा को 26 एकड़ भूमि भी एक बौद्ध संस्थान खोलने के लिए उपलब्ध कराई है। इस निर्णय के लिए सम्मेलन माननीय मुख्यमंत्री, बिहार और बिहार सरकार को बधाई देता है। सम्मेलन मांग करता है कि प्रदेशों के विधानमंडलों को संबोधित करने के लिए परम पावन दलाई लामा को आमंत्रित किया जाए। इस दिशा में हमलोग बिहार के माननीय मुख्यमंत्री और विधानसभा के अध्यक्ष से मांग करते हैं कि परम पावन जी को संबोधन के लिए बिहार विधानमंडल में आमंत्रित किया जाए। इसकी शुरुआत बिहार से ही हो।

7. कैलाश-मानसरोवर की मुक्ति के लिए शिव शक्ति दें। क्योंकि कैलाश-मानसरोवर की यात्रा भारत और तिब्बत के प्राचीन परस्पर संबंधों का द्योतक है। सम्मेलन शिवरात्रि 18 फरवरी 2023 के दिन प्रदर्शन, गोष्ठियां और धरना आयोजित करने का निर्णय लेता है। यह कार्यक्रम एक सप्ताह तक ‘कैलाश-मानसरोवर मुक्ति सप्ताह’ के रूप में मनाया जाएगा।

सम्मेलन भारत-तिब्बत मैत्री संघ को संगठित और सुदृढ़ करने का निर्णय लेता है। अगले राष्ट्रीय अधिवेशन तक भारत के पचास प्रतिशत जिलों यानी 383 जिलों में अपनी इकाइयां खड़ा/संगठित करने का निर्णय लेता है। इस दौरान व्याख्यान शृंखला विश्वविद्यालयों में चलाया जाएगा। तिब्बत समर्थक आंदोलन को मजबूत करने के लिए प्रदेशों के विभिन्न समूहों, विशेषकर विधानमंडल के सदस्यों तथा मीडियाकर्मियों के साथ संपर्क तथा महाविद्यालयों/ विश्वविद्यालयों में शिक्षक तथा विद्यार्थियों के बीच गतिविधियों पर जोर दिया जाएगा। साथ ही भारतीय लोगों, विशेषकर महिलाओं और युवाओं के संगठनों को प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाएगा।

8. भारत-तिब्बत मैत्री संघ बदलती हुई वैश्विक परिस्थिति में तिब्बत मुक्ति साधना को और अधिक सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय चिंतन शिविर आयोजित करने का निर्णय लेता है। भारत-तिब्बत मैत्री संघ की प्रादेशिक इकाइयां 2023 में अपने-अपने प्रदेशों में सम्मेलन आयोजित करेंगी।

9. अखिल भारतीय तिब्बत मुक्ति विद्यार्थी मोर्चा विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के स्तर पर इकाइयां गठित कर इस आंदोलन से नौजवानों को जोड़ेगा। रचनात्मक एवं कला, नाटक, कविता के माध्यम से विद्यार्थियों के बीच जागरूकता कायम की जाएगी। सम्मेलन विद्यार्थी मंच का दो दिनों का सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लेता है।

10. भारत-तिब्बत मैत्री संघ पंचेन लामा के जन्मदिन पर 25 मार्च को उनको मुक्त कराने के लिए कार्यक्रम आयोजित करेगा। कार्यक्रम का स्वरूप भारत-तिब्बत मैत्री संघ की इकाइयां अपनी सुविधानुसार तय करेंगी।

11. 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भारतीय संसद द्वारा 14 नवंबर 1962 को लिये गये संकल्प/प्रस्ताव को याद करते हुए भारत-तिब्बत मैत्री संघ की जिला इकाइयां/ प्रादेशिक इकाइयां जन प्रतिनिधियों को प्रस्ताव की प्रति भेंट करेंगी तथा प्रस्ताव पर उचित कार्रवाई करने के लिए सरकार से निवेदन करने को कहेंगी। इस महीना भर के कार्यक्रम में सभा, गोष्ठी, प्रदर्शन और सत्याग्रह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। प्रस्ताव पारित कर भारत के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति से निवेदन किया जाएगा कि चीन के कब्जे में जो भारत की भूमि हैं, उसे मुक्त कराया जाए। भारत सरकार हिमालय नीति की घोषणा भी करे।

शोक प्रस्ताव – 1

1. भारत-तिब्बत मैत्री संघ का यह सम्मेलन तिब्बत में हो रहे उत्पीड़न, लोकतांत्रिक मौलिक अधिकारों पर रोक तथा मानवाधिकारों के दमन पर चिंता व्यक्त करता है। इसके विरोध में अब तक 158 तिब्बती भिक्षुओं, नौजवानों और तिब्बती लोगों ने आत्मदाह किया है। सम्मेलन इन बलिदानी लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है।

2. तिब्बत के अंदर अपने अधिकारों की रक्षा तथा आजादी के लिए संघर्ष करते हुए तथा चीन सरकार की दमनात्मक कार्रवाईयों का शिकार होकर जिन लोगों ने बलिदान दिया है, उनका हमलोग अभिनंदन करते हैं। उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं। मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।

3. सम्मेलन भारत-चीन संघर्ष के दौरान लद्दाख में शहीद हुए भारतीय सेना के जवानों एवं अधिकारियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। सम्मेलन उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है।

4. सम्मेलन एसएसएफ के तिब्बती जवान शहीद तेंजीन को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

शोक प्रस्ताव – 2

भारत-तिब्बत मैत्री संघ अपने नेतृत्व के वरिष्ठ नेताओं तथा कार्यकर्ताओं की मृत्यु पर दुख व्यक्त करता है। सम्मेलन उनके प्रति भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है। भारत-तिब्बत मैत्री संघ उनकी सेवा के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उन्हें नमन करता है। उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है। सम्मेलन निम्नलिखित व्यक्तियों का स्मरण करता है –

1. श्रीमती निर्मला देशपांडे, उपाध्यक्ष
2. श्री लोदी ग्यारी रिन्पोछे, परम पावन दलाई लामा जी के विशेष दूत
3. श्री (प्रो.) कृष्णनाथ जी- प्रसिद्ध दार्शनिक एवं चिंतक
4. श्री रवि राय – अध्यक्ष, भारत- तिब्बत मैत्री संघ
5. श्री सत्यप्रकाश मालवीय, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं उपाध्यक्ष, भारत-तिब्बत मैत्री संघ
6. डॉ दाऊजी गुप्ता, पूर्व सदस्य उत्तर प्रदेश विधान परिषद और उपाध्यक्ष भारत-तिब्बत मैत्री संघ
7. डॉ ज्योतिकर पी.जी., बौद्ध चिंतक और उपाध्यक्ष, भारत-तिब्बत मैत्री संघ
8. प्रो. (डॉ.) राजनारायण राय, अध्यक्ष, भारत-तिब्बत मैत्री संघ, मुजफ्फरपुर इकाई, बिहार
9. श्री रामचंद्र खान, आईपीएस, अध्यक्ष, भारत-तिब्बत मैत्री संघ, बिहार
10. श्रीमती शशि त्यागी, सचिव ग्रेविस सदस्य, भारत-तिब्बत मैत्री संघ, जोधपुर।
11. श्री थुबटेन सम्फेल, पूर्व निदेशक, तिब्बत नीति शोध केंद्र
12. श्री लोबसांग खेदुप द्रोंग्रेत्संग, पूर्व न्याय आयुक्त, तिब्बत प्रशासन
13. श्री 33वें क्याब्जे मेनरी त्रिजिन, तिब्बती धार्मिक प्रमुख
14. श्री थिनली फोंतसोक, राजनीतिक बंदी
15. श्री हरीश अड्यालकर, अध्यक्ष, महाराष्ट्र प्रदेश भारत- तिब्बत मैत्री संघ
16. श्री त्रिदु पोन चिमी नामग्याल, पूर्व उपाध्यक्ष, तिब्बत निर्वासित संकाय।

प्रस्ताव 1

भारत सरकार से तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता की मांग

भारत-तिब्बत मैत्री संघ का नवम राष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय जनमानस में तिब्बती जनता, राष्ट्र एवं संस्कृति के प्रति व्याप्त श्रद्धा एवं ममत्व का अभिनंदन करते हुए तिब्बती मुक्ति साधना के साथ भारतीय जनता की हार्दिक एकता प्रकट करता है। यह सम्मेलन तिब्बत मुक्ति साधना के प्रति भारत सरकार की उदासीनता के प्रति क्षोभ व्यक्त करता है।

राष्ट्रीय सम्मेलन मांग करता है कि भारत सरकार हिमालय नीति पर श्वेत-पत्र जारी करे तथा व्यापक और समावेशी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन कर इस मुद्दे पर बहस कराए। हिमालय क्षेत्र में हो रहे पर्यावरण विनाश, चीन द्वारा तिब्बत में आणविक परीक्षण एवं प्रक्षेपास्त्रों की तैनाती तथा लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक की सीमाओं पर बढ़ रही असुरक्षा के कारण समूचा भारत चिंतित है।

यह सम्मेलन भारत सरकार से मांग करता है कि तिब्बत की आजादी और भारत की रक्षा की परस्पर निर्भरता संबंधी जनभावना का सम्मान करते हुए तिब्बत की निर्वासित सरकार और तिब्बती जनता के प्रति सद्भावना और सद्व्यवहार बनाए रखे। परम पावन दलाई लामा के प्रति आदर का भाव भारत सरकार बनाए रखे। साथ ही भारत सरकार से तिब्बत मुक्ति साधना को हरसंभव सहयोग देने की मांग करता है।

प्रस्ताव 2

मानवाधिकार हनन : पर्यावरण का विनाश बंद हो

यह राष्ट्रीय सम्मेलन तिब्बत पर आधिपत्य कायम करने वाले चीनी शासकों द्वारा धार्मिक उत्पीड़न, मानवाधिकारों का लगातार हनन, धार्मिक संस्थानों एवं मठों का पूर्ण विध्वंस, पर्यावरण विनाश, तिब्बत में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, चीनियों का तिब्बत में स्थानांतरण आदि-आदि कदमों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से तिब्बती जनता की अस्मिता को नष्ट करने के कुप्रयास की भर्त्सना करता है। इतने वर्षों तक चीन द्वारा दमन और बर्बरतापूर्ण अत्याचारों के बावजूद तिब्बती जनता का मनोबल ऊंचा है। तिब्बती जनता निरन्तर संघर्षरत है। सम्मेलन संघर्षशील तिब्बती जनता का अभिनंदन करते हुए उनके प्रति एकजुटता प्रकट करता है। यह राष्ट्रीय सम्मेलन भारत की जनता से अपील करता है वह तिब्बत की जनता के स्वतंत्रता संघर्ष में पूर्ण सहयोग करे। यह सम्मेलन मांग करता है कि विश्व मंचों पर तिब्बती मुक्ति साधना को उन्मुक्त समर्थन देने के साथ-साथ भारत के जनमत का सम्मान करते हुए भारत सरकार तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता दे।

प्रस्ताव 3

कैलाश-मानसरोवर यात्रा मुक्त हो

कैलाश-मानसरोवर तिब्बत का हिस्सा है। यह अभी चीन के कब्जे में है। जब यह तिब्बत का अंग था तो परंपरागत रूप से भारतीय साधु, गृहस्थ, व्यापारी, विद्यार्थी कभी राहदनी लेकर तो कभी बिना राहदनी लिये कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करते थे। भारतीय इतिहास पुराण में कैलाश शिव का स्थान है। शिव कैलाश के वासी हैं। हिन्दुओं के लिए यह पवित्र स्थली है। लेकिन वर्तमान में कैलाश-मानसरोवर की यात्रा मुक्त नहीं है। तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भी यह परंपरागत यात्रा जारी थी। शायद 1961 तक ऐसी यात्रा हुई। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद यह यात्रा बंद हो गई। 1981 में जब यह यात्रा शुरू हुई तो भी यह बंधन में है। कैलाश-मानसरोवर की नियंत्रित यात्रा विदेशी मुद्रा की कमाई का अदृश्य स्रोत है। चीन की सरकार ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है।

कैलाश-मानसरोवर सांस्कृतिक रूप से भारत का अंग है। राजनीतिक दृष्टि से यह तिब्बत का है। चीन का इससे कोई संबंध नहीं है। इसलिए अनुमति लेनी हो तो नियमानुसार भारत सरकार और परम पावन दलाई लामा या तिब्बत की प्रवासी सरकार से अनुमति और आशीर्वाद लेकर यात्रा शुरू की जानी चाहिए।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ भारत सरकार से मांग करता है कि तत्काल कैलाश-मानसरोवर की यात्रा को मुक्त करने के लिए चीन की सरकार से बातचीत करे तथा इस बाबत 1962 की पूर्व स्थिति बहाल की जाए। कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की मुक्ति का तात्कालिक अर्थ है कि सरकारी एकाधिकार से मुक्ति।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ का यह सम्मेलन सन् 2023 के शिवरात्रि के दिन यानी 18 फरवरी को कैलाश-मानसरोवर मुक्ति दिवस मनाने का निर्णय लेता है। इस अवसर पर कैलाश-मानसरोवर की मुक्ति के लिए सभी इकाइयां धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह और संगोष्ठी आयोजित करेंगी।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ का राजगीर सम्मेलन प्रस्तावित करता है कि भारत सरकार को प्रयास करना चाहिए कि तिब्बत की समस्या के सम्मानजनक समाधान के लिए चीन की सरकार और परम पावन दलाई लामा के बीच वार्ता/ संवाद की शुरुआत की जाए।

प्रस्ताव 4

11वें पंचेन लामा के बारे में स्थिति स्पष्ट करे चीन

परम पावन दलाई लामा द्वारा मनोनीत पंचेन लामा (गोधुन चोयक्की न्यिमा) के विषय में कई बार चीन सरकार ने अपने वक्तव्य में उनके पैतृक गांव में सुरक्षित होने की बात कही है। परन्तु अभी तक उनसे मिलने की अनुमति चीन सरकार द्वारा नहीं दी गई है। इससे पंचेन लामा के सुरक्षित होने को लेकर समस्त विश्व में शंका और संशय की स्थिति बनी हुई है। यह सम्मेलन मांग करता है कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा एक टीम गठित की जाए और चीन सरकार उस टीम को पंचेन लामा से मिलने की व्यवस्था करे। ताकि पंचेन लामा के सुरक्षित होने की आधिकारिक जानकारी विश्व को मिल सके।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ का नवम राष्ट्रीय सम्मेलन यह मांग करता है कि परम पावन दलाई लामा द्वारा मनोनीत/ चयनित पंचेन लामा की चीनी सरकार से रिहाई के लिए भारत सरकार प्रयत्न करे एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहल करे।

प्रस्ताव 5

परम पावन दलाई लामा

परम पावन दलाई लामा विश्व की धरोहर हैं। विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए उनका योगदान अमूल्य है। परम पावन जी के प्रति विश्व कृतज्ञ है। भारतवासियों का सौभाग्य है कि भारत को उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया है।

भारत-तिब्बत मैत्री संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिनिधिगण-

– परम पावन के स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं।

– भारत के राष्ट्रपति से मांग करते हैं कि परम पावन दलाई लामा को भारत की संसद के दोनों सदनों (लोकसभा एवं राज्यसभा) के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने हेतु ससम्मान आमंत्रित किया जाए।

– इस दिशा में ऑल पार्टी तिब्बत समर्थक संसदीय मंच को विशेष पहल करनी चाहिए। भारत-तिब्बत मैत्री संघ की विभिन्न इकाइयों को अपने-अपने क्षेत्र के संसद सदस्यों से संपर्क कर प्रस्ताव के समर्थन में उनको बताना चाहिए और इसके कार्यान्वयन हेतु उनलोगों से अनुरोध करना चाहिए।

– परम पावन दलाई लामा को ‘भारत रत्न’ से भारत सरकार सम्मानित करे।

– सम्मेलन चीनी शासकों की उस नीति की निन्दा करता है, जिसके अंतर्गत तिब्बत के अंदर भोट संस्कृति एवं धर्म को पूरी तरह नष्ट करने का कुचक्र बड़े पैमाने पर विगत वर्षों में तेज किया गया है। परम पावन दलाई लामा जी के चित्रों को रखना, तिब्बत में अपराध मान लिया गया है। यह सम्मेलन परम पावन दलाई लामा की छवि को नष्ट करने के किसी भी प्रयास की निन्दा करता है।

प्रस्ताव 6

संसद से पारित संकल्प को याद करने का समय

1962 के भारत-चीन युद्ध के बीच 14 नवंबर को भारत की संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर चीन द्वारा अधिकृत भारतीय भूमि को वापस लेने का संकल्प लिया था। आज भारत अपनी स्वतंत्रता/आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव के विशिष्ट अवसर पर याद भारतवासियों तथा भारत सरकार को सम्मेलन उस संकल्प की याद दिलाना चाहता है।

सीमाओं पर निरंतर संघर्ष की स्थिति बरकरार है। भारत-चीन संबंध सामान्य बनाने के नाम पर भारत की सरकार द्वारा सीमा संबंधी मौलिक प्रश्नों की उपेक्षा की जा रही है। यह सम्मेलन इस पर चिंता व्यक्त करता है तथा भारत सरकार से मांग करता है कि 1962 में लिये गये संकल्प के आधार पर ही सीमा विवाद को हल करे। हाल ही में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन की सीमा के बीच युद्ध जैसी स्थिति हो गई थी। इसमें भारतीय सेना के दर्जनों जवान/अधिकारी मारे गये। जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के सहित एक लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक भारत की भूमि चीन के कब्जे में है।

सम्मेलन यह निर्णय लेता है कि 2024 में संसद के आगामी आम चुनाव में भारत के सभी राजनीतिक दल यह स्पष्ट घोषणा करें (अपने चुनाव घोषणापत्र में स्थान दें) कि वे तिब्बत मुक्ति साधना एवं हिमालय की सुरक्षा की नीति का समर्थन करते हैं।

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