सावित्रीबाई फुले
एक युग था
जब अक्षर थे अपराध,
तब बनीं सावित्री
ज्ञान की स्पष्ट आवाज़,
भूमि पुस्तिका,
वृक्ष की डाल प्रथम कलम बनी,
जब वह पढ़ना सीख गईं,
जब वह लिखना सीख गईं
शनैः-शनैः
आने वाले युगों के नियम बदल गए,
कहकर— “ज्ञान पर है सबका अधिकार”,
नारी चुप्पी तोड़, बनाती वह इतिहास,
बेटियों को आजादी देती,
स्वप्न दिखाती,
अच्छे-बुरे की पहचान कराती
उड़ने को आकाश दिखाती,
कुप्रथा मुक्त जागरूक करती।
प्रथम भारतीय महिला शिक्षिका
सावित्रीबाई फुले
की गौरव गाथा
एक विचार, आंदोलन,
नए युग की शुरुआत थी,
अशिक्षा के अंधकार में,
साजिशों के समाज में,
अपशब्द, हर अपमान को सहती,
ज्ञान की निरंतर बजती वह सुंदर साज थी,
नारी शिक्षा की पल-पल ज्योत जगाती,
पग-पग में विश्वास,
मन में साहस, अडिग संकल्प,
कीचड़ न छू पाया
जिसके पावन तन को,
पत्थर न चोटिल कर पाए
जिसके अंतर्मन को,
वैचारिक पवित्रता अडिगता
जिस मानव की शान है
लक्ष्य प्राप्ति उसकी ही पहचान है।
अनाथों, विधवाओं और
दुखियों की लाचारी को,
अपना समझ
जीवन सेवा में अर्पित करने वाली,
स्वयं शूलों पर चल कर
नारी जग को
फूलों की राह दिखाने वाली,
कलम जो आज हम उठा पाते हैं,
महापुरुषों के त्याग समर्पण का तोहफ़ा है,
जो युगों-युगों तक आगे हमें पहुँचानी है।
नमन उस समर्पित नारी को,
जो क्रांति बनकर आई
मानवता और विद्या की लौ जलाई।
डॉ. अनन्या स्वराज,
वरिष्ठ सहायक प्राध्यापिका (समाजशास्त्र विभाग)
मगध विश्विद्यालय, बोध गया।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
















