— परिचय दास —
।। एक ।।
वेनेजुएला पर अमेरिका का हमला विकट वास्तविकता बन चुका है, जो 3 जनवरी , 2026 को सैन्य संघर्ष के रूप में सामने आया। उस दिन संयुक्त राज्य अमेरिका ने वेनेजुएला के उत्तरी हिस्सों में, विशेष रूप से राजधानी काराकास और चार अन्य प्रमुख ठिकानों पर हवाई और अन्य सैन्य हमले किए। ये हमले व्यापक रूप से दर्ज किए गए विस्फोटों, फाइटर जेट आवाज़ों और जमीन पर सैन्य गतिशीलता के रूप में देखे गए।
अमेरिकी सरकार के अनुसार, यह ऑपरेशन लक्ष्य-आधारित सैन्य कार्रवाई थी जिसमें वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलीया फ्लोरेस को ‘काबू’ करने का लक्ष्य था। अमेरिकी नेतृत्व ने घोषणा की कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्हें आरोपों के साथ विदेश ले जाया जा रहा है। यह कार्रवाई अमेरिका के डेल्टा फोर्स जैसे विशेष बलों और वायु-हस्तक्षेप के संयोजन का नतीजा बताई जा रही है।
वेनेजुएला की सरकार ने इस हमले को “सैन्य आक्रमण” और “आक्रामकता” करार दिया है और इसे राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। उसके अनुसार, यह हमला न केवल राजधानी के सैन्य प्रतिष्ठानों पर हुआ बल्कि कई अन्य क्षेत्रों में भी दर्ज किया गया। इसके परिणामस्वरूप राज्य आपातकाल घोषित किया गया और नागरिकों से धैर्य और विरोध के लिए बुलाया गया।
यह वास्तविकता केवल एक स्वतंत्र देश पर सीधा सैन्य दबाव नहीं है बल्कि यह राजनीति, संसाधन-नियम और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन की एक गहरी कहानी का हिस्सा भी है। अमेरिका ने पिछले महीनों से वेनेजुएला के आसपास अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई थी—जहाज़ों और एयरक्राफ़्ट कैरियर सहित—और द्वन्द्व को ड्रग तस्करी, तेल संसाधन और नेतृत्व परिवर्तन जैसे मुद्दों से जोड़ा गया था।
इस हमले को सिर्फ़ “एक पारंपरिक युद्ध” की तरह नहीं समझा जाना चाहिए। यह एक तेज़, निर्देशित सैन्य ऑपरेशन है, जिसमें हवा, विशेष बल और लक्ष्य-केंद्रित रणनीति का उपयोग हुआ है। यह अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर सबसे प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाइयों में से एक माना जा रहा है—इस तरह की कार्रवाई 1989 में पनामा पर अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सबसे बड़ा कदम हो सकता है।
दुनिया भर की प्रतिक्रियाएँ विभाजित हैं। कुछ देशों ने इसे रणनीति के रूप में देखा है, जबकि अन्य ने इसे संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए निंदा की है। इस विवाद ने अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं: क्या किसी देश की भीतरी राजनीतिक परिस्थितियों में इस तरह का सैन्य हस्तक्षेप वैध हो सकता है; और क्या बल आधारित कार्रवाई से स्थायी समाधान संभव है?
वेनेजुएला पर अमेरिका का यह हमला सिर्फ खतरनाक घटना नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप की एक नई मिसाल है। यह दर्शाता है कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी सहयोगी धुर विरोधी देश की सीमाओं के भीतर सैन्य हस्तक्षेप तक के कदम उठाए जा रहे हैं और इसके प्रभाव न केवल उस देश की जनता पर हैं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, तेल संसाधन राजनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर भी पड़ रहे हैं।
।। दो ।।
रणनीतिक रूप से यह समझना आवश्यक है कि वेनेजुएला–अमेरिका टकराव को केवल “हमला” या “घटना” के रूप में देखना उसकी जटिलता को कम कर देना होगा। यह प्रकरण दरअसल लंबे समय से चल रही शक्ति-राजनीति, संसाधन-हितों, वैचारिक संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंतर्विरोधों का परिणाम है। इसलिए इसका निष्कर्ष किसी एक पक्ष की जीत या हार के रूप में नहीं बल्कि एक वैश्विक चेतावनी और रणनीतिक सबक के रूप में समझा जाना चाहिए।
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सैन्य बल अब अंतिम समाधान नहीं : चाहे वह प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई हो, सीमित ऑपरेशन हों या परोक्ष दबाव—इन सभी का तत्काल प्रभाव तो दिखाई देता है किंतु दीर्घकालिक स्थिरता उत्पन्न नहीं होती। वेनेजुएला के संदर्भ में भी यही स्पष्ट होता है कि दबाव की रणनीति ने सत्ता संरचना को निर्णायक रूप से बदला नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक संकट को गहरा किया। इससे यह सिद्ध होता है कि बल-आधारित हस्तक्षेप अक्सर समस्या को हल करने के बजाय उसे बहुस्तरीय बना देता है।
संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून : आंतरिक राजनीतिक संकट में बाहरी शक्ति की सक्रिय भूमिका वैश्विक व्यवस्था के लिए खतरनाक मिसाल बनती है। यदि लोकतंत्र, मानवाधिकार या सुरक्षा के नाम पर एक देश दूसरे देश की सीमाओं के भीतर हस्तक्षेप को वैध ठहराया जाता है तो यही तर्क भविष्य में किसी भी कमजोर राष्ट्र के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रकरण से यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब वह शक्तिशाली और कमजोर—दोनों पर समान रूप से लागू हो।
संसाधन-राजनीति : वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार इस पूरे टकराव की पृष्ठभूमि में लगातार उपस्थित रहते हैं। यह प्रकरण एक बार फिर दिखाता है कि प्राकृतिक संसाधन किसी देश के लिए वरदान होने के साथ-साथ अभिशाप भी बन सकते हैं।
संसाधन-समृद्ध लेकिन संस्थागत रूप से कमजोर राष्ट्र वैश्विक शक्ति-संघर्ष के केंद्र में आ जाते हैं। रणनीतिक रूप से यह संदेश स्पष्ट है कि आर्थिक विविधीकरण, संस्थागत पारदर्शिता और आंतरिक सुदृढ़ता के बिना संसाधन-समृद्धि सुरक्षा नहीं दे सकती।
वैचारिक संघर्ष : वेनेजुएला का संकट केवल शासन-प्रणाली का संकट नहीं बल्कि उस वैकल्पिक विकास-मॉडल का संकट भी है जो नवउदारवादी वैश्विक व्यवस्था से भिन्न रास्ता प्रस्तावित करता है। अमेरिका और उसके सहयोगी जिस भाषा में इस संकट को प्रस्तुत करते हैं, उसमें लोकतंत्र और मानवाधिकार प्रमुख शब्द हैं; जबकि विरोधी पक्ष इसे वैचारिक प्रभुत्व और राजनीतिक नियंत्रण की परियोजना के रूप में देखता है। इस टकराव से यह स्पष्ट होता है कि आज भी वैचारिक असहमति को रणनीतिक खतरे के रूप में देखा जाता है।
आर्थिक दबाव की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न : वेनेजुएला का अनुभव बताता है कि आर्थिक प्रतिबंध शासन को झुकाने के बजाय समाज को कमजोर करते हैं। इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है और सत्तारूढ़ समूह अपने समर्थकों को “बाहरी शत्रु” के विरुद्ध संगठित करने में सफल हो जाता है। रणनीतिक रूप से यह स्वीकार करना होगा कि प्रतिबंध एक कुंद औज़ार हैं—वे सत्ता परिवर्तन की गारंटी नहीं देते, लेकिन मानवीय संकट को अवश्य जन्म देते हैं।
भू-राजनीतिक बहुध्रुवीयता : वेनेजुएला प्रकरण यह दिखाता है कि अमेरिका अब एकमात्र निर्णायक शक्ति नहीं रहा। रूस, चीन और अन्य शक्तियों की उपस्थिति ने संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय आयाम दे दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में ऐसे संकट द्विपक्षीय नहीं रहेंगे बल्कि बहुपक्षीय टकराव का रूप लेंगे। रणनीतिक रूप से यह स्थिति विश्व को अधिक अस्थिर भी बना सकती है और अधिक संतुलित भी—यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शक्तियाँ प्रतिस्पर्धा को किस हद तक नियंत्रित कर पाती हैं।
मीडिया और नैरेटिव दृष्टि: इस प्रकरण में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि सूचना युद्ध सैन्य कार्रवाई जितना ही महत्वपूर्ण हो चुका है। घटनाओं की प्रस्तुति, शब्दावली का चयन और नैतिक फ्रेमिंग—ये सभी रणनीतिक हथियार बन चुके हैं। इससे यह सीख मिलती है कि भविष्य के संघर्ष केवल जमीन और आकाश में नहीं बल्कि चेतना और जनमत में भी लड़े जाएँगे।
मानवीय दृष्टि से रहित : किसी भी रणनीति की सफलता का अंतिम मापदंड यह होना चाहिए कि वह आम नागरिक के जीवन को कितना सुरक्षित और गरिमापूर्ण बनाती है। वेनेजुएला प्रकरण यह दिखाता है कि जब रणनीति मनुष्य से कट जाती है तो वह चाहे जितनी “सफल” घोषित कर दी जाए, अंततः नैतिक रूप से विफल ही रहती है। पलायन, भुखमरी, स्वास्थ्य संकट—ये सब किसी भी नीति का मौन मूल्यांकन होते हैं।
इस पूरे प्रकरण का रणनीतिक निष्कर्ष यह है कि संवाद, क्षेत्रीय सहयोग और बहुपक्षीय समाधान के बिना स्थायी शांति संभव नहीं। शक्ति का प्रयोग तात्कालिक दबाव तो बना सकता है लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल राजनीतिक समझ, आर्थिक पुनर्निर्माण और संप्रभुता के सम्मान से ही निकलता है। वेनेजुएला का संकट हमें यह याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे कठिन लेकिन सबसे आवश्यक रणनीति युद्ध नहीं—संयम है।
यह निष्कर्ष किसी एक देश के लिए नहीं बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए है। यदि इससे सही सबक नहीं लिया गया तो वेनेजुएला एक अपवाद नहीं बल्कि भविष्य का पूर्वाभ्यास सिद्ध होगा।
।। तीन ।।
वेनेजुएला पर हुआ यह हमला किसी विजय-घोषणा की तरह नहीं लिखा जा सकता। यह दरअसल एक ठहरे हुए मौन की तरह है—जहाँ धुएँ के बादल छँट चुके हैं पर हवा में अब भी बारूद की गंध है। बमों ने कुछ ठिकाने तो नष्ट किए पर भय, अविश्वास और असुरक्षा की जो रेखाएँ खींच दीं, वे किसी मानचित्र पर नहीं दिखतीं। सत्ता ने शक्ति का प्रदर्शन किया किंतु जनता ने केवल अपनी नाज़ुकता को और गहराते देखा।
इतिहास गवाह है कि हमले कभी अंतिम वाक्य नहीं होते; वे केवल एक कठोर विराम होते हैं, जिनके बाद पीड़ा बोलती है। वेनेजुएला की धरती पर गिरा प्रत्येक विस्फोट यह प्रश्न छोड़ गया है कि क्या शक्ति सचमुच समाधान दे सकती है या वह केवल नए घाव रचती है। लोकतंत्र, मानवाधिकार और सुरक्षा—इन शब्दों की चमक युद्ध के धुएँ में फीकी पड़ जाती है जब उनका मूल्य आम नागरिक अपने जीवन से चुकाता है।
यह हमला हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल सरकारों से नहीं बनते बल्कि लोगों की स्मृतियों, सपनों और दैनिक संघर्षों से बनते हैं। जब बाहरी शक्ति किसी देश के भीतर प्रवेश करती है तो वह केवल सीमाएँ नहीं लांघती—वह मनुष्यों की आत्मनिर्णय की आकांक्षा को भी रौंदती है। वेनेजुएला आज किसी एक देश की कथा नहीं बल्कि उस दुनिया का दर्पण है जहाँ संवाद की जगह दमन लेता जा रहा है।
यह हमला हमें चेतावनी की तरह देखना चाहिए—कि शक्ति के क्षणिक उन्माद के बाद इतिहास हमेशा यही पूछता है: क्या कोई और रास्ता संभव था? और जब यह प्रश्न पूछा जाता है तब अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।
…और यही “बहुत देर” इस प्रकरण की सबसे भयावह सच्चाई है। देर केवल कूटनीति की नहीं होती, देर मनुष्यता की भी होती है। जब बम गिर चुके होते हैं, जब बच्चे भय की भाषा सीख चुके होते हैं जब अस्पतालों में दवाइयों से अधिक सन्नाटा जमा हो जाता है—तब समाधान की बातें इतिहास की फाइलों में दर्ज तो हो जाती हैं पर जीवन की क्षति की भरपाई नहीं हो पाती।
रणनीतिक स्तर पर यह हमला एक संदेश की तरह भी पढ़ा गया—शक्ति अभी भी बोल सकती है, और जोर से बोल सकती है किंतु यह संदेश जितना बाहर की दुनिया के लिए था, उतना ही भीतर के डर को ढँकने के लिए भी। हर सैन्य कार्रवाई अपने साथ यह स्वीकारोक्ति लेकर आती है कि संवाद विफल हो चुका है। जब शब्द हार जाते हैं तब हथियार आगे बढ़ते हैं—और यही किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी पराजय होती है।
वेनेजुएला के संदर्भ में यह हमला केवल वर्तमान को नहीं, भविष्य को भी घायल करता है। जो पीढ़ी आज विस्फोटों के बीच बड़ी होगी, उसके लिए राजनीति किसी विमर्श का नहीं बल्कि भय का पर्याय बनेगी। लोकतंत्र तब एक अमूर्त शब्द रह जाएगा और सुरक्षा एक ऐसा वादा जो कभी पूरा नहीं होता। यह नुकसान किसी एक सरकार या किसी एक वर्ष तक सीमित नहीं रहता; यह दशकों तक सामाजिक चेतना में रिसता रहता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए भी यह क्षण आत्मपरीक्षा का है। क्या वैश्विक संस्थाएँ इतनी सक्षम हैं कि वे शक्ति को संयम में बाँध सकें? क्या अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमज़ोर देशों के लिए नैतिक पाठ है या वह शक्तिशाली राष्ट्रों पर भी समान रूप से लागू होता है? वेनेजुएला पर हुआ हमला इन प्रश्नों को फिर से हमारे सामने खड़ा करता है—और उनका उत्तर टालना भविष्य को और अस्थिर बनाना है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे शांत, सबसे अनसुनी आवाज़ आम नागरिक की है। वही नागरिक, जिसके नाम पर लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है; वही नागरिक, जिसके नाम पर सुरक्षा के तर्क गढ़े जाते हैं लेकिन जब धुआँ छँटता है, तो वही नागरिक मलबे के बीच खड़ा मिलता है—अपने घर, अपनी रोज़ी और अपने भरोसे को समेटते हुए। यह दृश्य किसी भी विजय-कथा को नैतिक रूप से असंभव बना देता है।
वेनेजुएला पर हुआ यह हमला हमें एक सरल लेकिन कठोर सत्य की ओर लौटाता है—कि शक्ति इतिहास तो बना सकती है पर भविष्य नहीं। भविष्य केवल संवाद, सम्मान और आत्मनिर्णय से बनता है। यदि इस प्रकरण से यही सीख नहीं ली गई तो यह हमला एक घटना नहीं रहेगा; यह एक परंपरा बन जाएगा और तब इतिहास केवल यह नहीं पूछेगा कि “क्या कोई और रास्ता संभव था?”—वह यह भी पूछेगा कि जब रास्ता स्पष्ट था तब उसे चुना क्यों नहीं गया।
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