स्वामी विवेकानंद: एक भावुक क्रांतिकारी और गांधी के वैचारिक अग्रज

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Swami Vivekananda और Mahatma Gandhi

विश्व इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल अपने समय की सीमाओं में बंधे नहीं रहते, बल्कि आने वाली सदियों की चेतना को भी दिशा देते हैं। भगवान बुद्ध, ईसा मसीह, शंकराचार्य, रामकृष्ण, विवेकानंद और गांधी इसी विराट परंपरा के प्रतिनिधि हैं। Swami Vivekananda और Mahatma Gandhi इस कड़ी में ऐसे दो नाम हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष भेंट भले न हुई हो, पर वैचारिक उत्तराधिकार स्पष्ट दिखाई देता है।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में हुआ। युवावस्था में वे पश्चिमी तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और उदार मानवतावाद से गहराई से प्रभावित थे। वे किसी भी विचार को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। ईश्वर, आत्मा और सृष्टि को लेकर उनके प्रश्न वही थे जो किसी वैज्ञानिक या दार्शनिक के होते हैं। यही बौद्धिक बेचैनी उन्हें ब्रह्मसमाज से दक्षिणेश्वर ले गई, जहां उनका साक्षात्कार Ramakrishna Paramahamsa से हुआ।

रामकृष्ण और विवेकानंद का मिलन रहस्यवाद और बुद्धिवाद, पूर्व और पश्चिम का अद्भुत संगम था। रामकृष्ण ने नरेंद्र को शास्त्र नहीं दिए, बल्कि अनुभव की दृष्टि दी। इसी से विवेकानंद का वह विश्वास जन्मा, जिसने आगे चलकर कहा—धर्म का अर्थ केवल मोक्ष नहीं, बल्कि भूखे को भोजन, अशिक्षित को शिक्षा और निर्बल को आत्मबल देना है। यही विचार बाद में गांधी के जीवन-दर्शन में ‘दरिद्र नारायण’ और ‘सेवा ही धर्म है’ के रूप में प्रकट हुआ।

विवेकानंद ने जाति-प्रथा, रूढ़ियों और पुरोहितवाद पर तीखा प्रहार किया। वे मानते थे कि सच्चा धर्म वह है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। यही दृष्टि आगे चलकर गांधी के सत्याग्रह, छुआछूत-विरोध और सामाजिक समरसता के अभियानों में दिखाई देती है। गांधी ने राजनीति को नैतिक आधार दिया, तो उसका बीज विवेकानंद के मानवीय धर्मबोध में पहले से मौजूद था।

विदेश यात्राओं में विवेकानंद ने पश्चिम की वैज्ञानिक उन्नति और संगठन शक्ति को देखा, जबकि भारत की गरीबी और जड़ता ने उन्हें भीतर तक व्यथित किया। उनका स्वप्न था—एक ऐसा भारत जो अपनी आध्यात्मिक आत्मा को बचाए रखते हुए आधुनिक विज्ञान और प्रगतिशील मूल्यों को अपनाए। गांधी ने इसी स्वप्न को जनआंदोलन का रूप दिया।

स्वामी विवेकानन्द ने जहाँ भारतीय मानस को सुशुप्तावस्था से जगाया और आत्मविश्वास दिया, वहीं गांधीजी ने उस आत्मविश्वास को संगठित कर स्वतंत्रता की लड़ाई में बदल दिया। गांधीजी स्वयं विवेकानन्द के साहित्य से गहरे प्रभावित थे; उन्होंने स्वीकार किया था कि विवेकानन्द के विचारों को पढ़ने के बाद उनका देश-प्रेम हजार गुना बढ़ गया। आज भी, विवेकानन्द की ओजस्वी वाणी और गांधीजी का सत्य-अहिंसा का मार्ग भारत के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।

स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत की वैचारिक भूमि तैयार करने वाले महापुरुष थे और गांधी उस भूमि पर खड़े होकर स्वतंत्रता व सामाजिक न्याय की इमारत खड़ी करने वाले। विवेकानंद यदि चेतना के उद्घोषक थे, तो गांधी उस चेतना के कर्मयोगी। दोनों मिलकर भारत को एक मानवीय, नैतिक और धर्मनिरपेक्ष दिशा देते हैं—और इसी कारण भारतीय राष्ट्र उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।

स्वामीजी के जन्मदिन पर उन्हें शत शत नमन!


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