पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी

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Journalist and Freedom Fighter Ganesh Shankar Vidyarthi

पत्रकारिता का धर्म – सत्ता नहीं, सत्य के साथ

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह विचारों, मूल्यों और जनजागरण की भी एक महान यात्रा थी। इस यात्रा में महात्मा गांधी और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे व्यक्तित्वों ने पत्रकारिता को एक मिशन का रूप दिया।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र ‘प्रताप’ के माध्यम से स्पष्ट लिखा कि संसार के अधिकांश समाचार पत्र पैसा कमाने और झूठ को सच तथा सच को झूठ बनाने के लिए चलाए जाते हैं। यह कथन केवल आलोचना नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गिरती नैतिकता पर गहरी चोट है।

दूसरी ओर, गांधीजी ने पत्रकारिता को अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति का साधन माना। उन्होंने स्पष्ट कहा “मेरे पत्र मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने के लिए हैं। मैं न गुस्से में लिखता हूँ, न द्वेष से, और न ही भावनाएँ भड़काने के लिए।”

गांधीजी की पत्रकारिता कितनी प्रभावी और अनुशासित थी, इसका उदाहरण महाबलेश्वर की घटना से मिलता है, जहाँ उन्होंने एक विस्तृत रिपोर्ट को संक्षिप्त कर दिया, लेकिन उसका सार और सत्य अक्षुण्ण रखा। यह दिखाता है कि सच्ची पत्रकारिता शब्दों की नहीं, सार की होती है।

उन्होंने पत्रकारों को चेतावनी देते हुए कहा—
“यदि आप पेट के लिए देश को बिगाड़ने के लिए अखबार चलाते हैं, तो कोई और काम कर लें।”

गांधीजी का मानना था कि पत्रकार को न सरकार के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, न विपक्ष में, बल्कि केवल सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए। यदि सत्य लिखने से सरकार के खिलाफ बात जाती है, तो यह चिंता पत्रकार की नहीं, बल्कि सरकार की होनी चाहिए।

दरअसल पत्रकारिता का काम सत्ता की चाटुकारिता नहीं है यह एक कैमरे जैसा धर्म है जिसमें वह सामने खड़े दृश्य को वैसा ही दिखाए जैसी वह है। एक प्रसंग है कि इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र के संस्थापक श्री रामनाथ गोयनका को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बार फोन किया कि आपका अमुक पत्रकार बहुत अच्छा कार्य कर रहा है। गोयनका ने इतनी सी बात पर उस पत्रकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

पत्रकार की पैनी कलम केवल स्याही से नहीं चलती, बल्कि आस्था और सत्य के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से चलती है। जब यह आस्था समाप्त हो जाती है, तो कलम नाचती है और पत्रकार कैबरे डांसर की तरह सत्ता के सामने नाचने लगते हैं।

आज के समय में जब सत्य धुंधला पड़ता जा रहा है, तब गांधीजी और गणेश शंकर विद्यार्थी के विचार हमें याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी है।

सत्य के साथ खड़े रहना ही पत्रकारिता का सबसे बड़ा धर्म है।


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