सनातन : पुराने से चिरंतन तक

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Sanatan: From old to eternal

Parichay Das

— परिचय दास —

‘सनातन’ शब्द से हमारा परिचय इतना पुराना है कि कभी-कभी हम उसके अर्थ को जानने की आवश्यकता ही नहीं समझते। जैसे घर के किसी बहुत पुराने सदस्य का नाम हम जानते हैं, पर यह नहीं जानते कि उसका अर्थ क्या है, वह कहाँ से आया और कितनी पीढ़ियों से हमारे साथ चल रहा है। ‘सनातन’ भी भारतीय स्मृति का ऐसा ही पुराना शब्द है। वह हमारे ग्रंथों में है, हमारी प्रार्थनाओं में है, हमारी बहसों में है और आज की सार्वजनिक भाषा में भी है। लेकिन उसके अर्थ की यात्रा सीधी रेखा में नहीं हुई। वह समय के साथ चलता रहा है, अपने अर्थ बदलता रहा है और कभी-कभी अपने पुराने अर्थों में लौटकर उन्हें नए ढंग से समझाता रहा है।

सबसे पहले एक सरल-सी बात। पुराना और सनातन एक नहीं हैं।

पुराना वह है जो समय की दृष्टि से पहले का है। कोई भवन पुराना हो सकता है, कोई गीत पुराना हो सकता है, कोई रीति पुरानी हो सकती है, कोई विचार पुराना हो सकता है। उसकी उम्र उसके पुराने होने का प्रमाण है। लेकिन केवल उम्र यह प्रमाण नहीं देती कि वह आज भी सही है। मनुष्य ने बहुत-सी पुरानी धारणाओं को छोड़ा है, बहुत-सी प्रथाओं को बदला है और बहुत-सी बातों को नए ज्ञान की रोशनी में फिर से देखा है।

लेकिन इसका उलटा भी उतना ही सच है। पुराना होने के कारण किसी बात को तुरंत खारिज कर देना भी विवेक नहीं है। पुराने में अनुभव जमा होता है। हजारों वर्षों के मनुष्य ने प्रकृति को देखा, जीवन को जिया, मृत्यु का सामना किया, प्रेम किया, युद्ध किए, करुणा सीखी, दुख सहे और अपने अनुभवों को कथा, गीत, दर्शन और आचार में बचाकर रखा। इसीलिए पुराना सत्य का प्रमाण भले न हो, अनुभव का साक्ष्य अवश्य है।

परंपरा इसी अनुभव को आगे ले जाने का नाम है।

परंपरा कोई बंद संदूक नहीं है, जिसमें पुरखों की वस्तुएँ रखी हों और जिसे हर पीढ़ी केवल खोलकर देखती रहे। परंपरा तो एक ऐसी नदी है जिसमें पुराने जल के साथ नए जल का मिलना लगातार चलता रहता है। उसमें कुछ बचता है, कुछ छूटता है, कुछ बदलता है और कुछ बिल्कुल नए रूप में सामने आता है। परंपरा का अर्थ केवल दोहराना नहीं, बल्कि प्राप्त को समझना और उसमें से सार्थक को आगे ले जाना भी है।

यहीं ‘सनातन’ शब्द हमारे सामने आता है।

संस्कृत में ‘सनातन’ के अर्थ नित्य, चिरस्थायी, शाश्वत, सतत और प्राचीन आदि हैं। इसमें प्राचीनता का भाव है, लेकिन केवल प्राचीनता नहीं है। ‘सनातन’ का असली विस्तार उस चीज में है जो समय की धारा में बहते हुए भी अपना कोई मूल अर्थ बचाए रखती है।

इसलिए पुराना और सनातन के बीच एक महीन-सा अंतर है। पुराना समय में पीछे है; सनातन समय में पीछे होते हुए भी वर्तमान में जीवित है।

भारतीय परंपरा में ‘सनातन’ कोई आधुनिक बनाया हुआ शब्द नहीं है। संस्कृत के प्राचीन साहित्य में इसका प्रयोग मिलता है। वैदिक संसार में भी इससे संबंधित प्रयोग स्थायित्व, प्राचीनता और दीर्घकालिक व्यवस्था के अर्थ-क्षेत्र में मिलते हैं। ऋग्वैदिक चिंतन में ‘ऋत’ की धारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विश्व में एक व्यवस्था है, एक क्रम है, एक सत्य है; मनुष्य का जीवन भी उस व्यापक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। आगे चलकर धर्म की अवधारणा में इस व्यवस्था, धारण करने वाले तत्त्व और जीवन के उचित आचरण के अनेक अर्थ जुड़ते गए।

यहाँ सावधानी भी जरूरी है। आज जिस व्यापक धार्मिक पहचान के लिए ‘सनातन धर्म’ कहा जाता है, उसे वैदिक संहिताओं में उसी आधुनिक अर्थ में उपस्थित मान लेना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा। ‘सनातन’ प्राचीन शब्द है, लेकिन ‘सनातन धर्म’ का आधुनिक व्यापक पहचान-सूचक रूप एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया से विकसित हुआ। शब्द पुराना है, पर उसके सामाजिक अर्थों की यात्रा लंबी और बदलती हुई है।

और शायद यही सनातन की सबसे सुंदर बात है कि वह स्वयं परिवर्तन से होकर हमारे सामने आता है।

वैदिक संसार से उपनिषदों तक आइए। यहाँ प्रश्न बदलता हुआ दिखाई देता है। यज्ञ और बाह्य अनुष्ठान की दुनिया के साथ-साथ प्रश्न भीतर उतरता है—मैं कौन हूँ? आत्मा क्या है? ब्रह्म क्या है? जीवन का अंतिम सत्य क्या है? एक ही सांस्कृतिक संसार के भीतर प्रश्न का केंद्र बदलता है। परंपरा टूटी नहीं, उसकी व्याख्या बदली।

फिर महाकाव्य आते हैं। रामायण और महाभारत में धर्म केवल किसी पुस्तक में रखी हुई व्यवस्था नहीं रह जाता। वह मनुष्य के सामने खड़ा होकर उससे निर्णय माँगता है। महाभारत का धर्म-संकट बताता है कि जीवन में ऐसे अवसर भी आते हैं जहाँ दो अच्छे विकल्पों के बीच भी कठिनाई होती है। धर्म का प्रश्न तब नियम से आगे बढ़कर विवेक का प्रश्न बन जाता है।

यही भारतीय परंपरा की गतिकी है। जो बिल्कुल स्थिर होता, वह इतनी दूर तक यात्रा नहीं कर सकता था।

और फिर एक दिन बुद्ध की आवाज सुनाई देती है—‘एस धम्मो सनन्तनो।’

धम्मपद की प्रसिद्ध गाथा में बुद्ध कहते हैं कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर से ही वैर शांत होता है। यही सनातन धम्म है।

यहाँ ‘सनन्तनो’ पालि रूप है, जिसका संस्कृत संबंध ‘सनातन’ से है। बुद्ध ने किसी पूजा-पद्धति को सनातन नहीं कहा। उन्होंने किसी संस्था को सनातन नहीं कहा। उन्होंने एक नैतिक सत्य को सनातन कहा—वैर का उत्तर वैर नहीं है।

यह छोटा-सा वाक्य ‘सनातन’ के अर्थ पर जैसे एक नई खिड़की खोल देता है।

वैर का स्वभाव देखिए। एक मनुष्य दूसरे से वैर करता है। दूसरा प्रत्युत्तर देता है। फिर पहला और कठोर होता है। प्रतिशोध अपने भीतर अगले प्रतिशोध का बीज लिए रहता है। हिंसा समाप्त होने के बजाय आगे बढ़ती जाती है। बुद्ध कहते हैं, इस चक्र को वैर से नहीं, अवैर से रोका जा सकता है।

यह बात ढाई हजार वर्ष पहले कही गई थी। लेकिन इसकी मानवीय सच्चाई आज भी समाप्त नहीं हुई। शायद यही वह जगह है जहाँ ‘पुराना’ ‘सनातन’ की ओर बढ़ता है। कोई बात पुरानी इसलिए नहीं हो जाती कि वह हजारों वर्ष पहले कही गई थी; वह तब सनातन अर्थ ग्रहण करती है जब हजारों वर्ष बाद भी मनुष्य उसमें अपना सत्य पहचान लेता है।

इसलिए बुद्ध का ‘सनन्तनो’ हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह ‘सनातन’ को किसी एक धार्मिक सीमा में बंद नहीं रहने देता। वह उसे नैतिक अनुभव की सार्वकालिकता से जोड़ देता है।

और बुद्ध की दूसरी शिक्षा भी यहाँ याद आती है। कालाम सुत्त में वे केवल इस कारण किसी बात को स्वीकार करने से सावधान करते हैं कि वह परंपरा से चली आ रही है, सुनी-सुनाई है या किसी गुरु ने कही है। इसका अर्थ परंपरा का अपमान नहीं है। इसका अर्थ यह है कि परंपरा को विवेक से होकर गुजरना चाहिए।

कितनी सुंदर बात है—परंपरा का सम्मान भी और उसकी परीक्षा भी।

हमसे पहले वालों ने क्या कहा, यह जानना आवश्यक है। उन्होंने क्यों कहा, यह समझना उससे अधिक आवश्यक है। और क्या वह बात आज भी मनुष्य के लिए सार्थक है, यह देखना सबसे आवश्यक है।

इसलिए पुराने को ‘मान देना’ और पुराने को ‘मान लेना’ एक बात नहीं है।

पुराने को मान देना चाहिए, क्योंकि उसमें अनुभव है। लेकिन उसे मान लेना केवल इसलिए आवश्यक नहीं कि वह पुराना है। यही वह जगह है जहाँ विवेक परंपरा का शत्रु नहीं, उसका सहचर बन जाता है।

भारतीय चिंतन की बड़ी शक्ति शायद यही रही है कि उसने अपने भीतर मतभेदों को जगह दी। वैदिक विचार के साथ उपनिषदों की गहराई आई। बौद्ध और जैन परंपराओं ने प्रश्न उठाए। शैव और वैष्णव धाराओं ने अपने-अपने रास्ते बनाए। भक्ति ने संस्कृत के साथ लोकभाषाओं में ईश्वर और मनुष्य के संबंध को व्यक्त किया। कबीर ने प्रश्न किया, रैदास ने अपनी सामाजिक अनुभूति को आवाज दी, तुलसी ने रामकथा को लोकभाषा में विस्तृत किया, मीरा ने अपने प्रेम को अपनी भाषा दी।

परंपरा चलती रही, लेकिन एक ही रूप में नहीं।

यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को एक सीधी सड़क की तरह देखना ठीक नहीं है। यह कई पगडंडियों, नदियों, घाटों और यात्राओं से बनी हुई सांस्कृतिक भूमि है। कहीं संवाद है, कहीं विवाद है, कहीं असहमति है, कहीं स्वीकार है। फिर भी किसी गहरे स्तर पर स्मृतियों का एक संबंध बना रहता है।

इसी संबंध को हम सनातनता कह सकते हैं।

सनातनता का अर्थ यह नहीं कि सब कुछ वैसा ही रहे जैसा कभी था। यदि ऐसा होता तो भारतीय संस्कृति का अधिकांश इतिहास ही सनातनता के विरुद्ध प्रमाण बन जाता। यहाँ तो रूप निरंतर बदले हैं।

भाषाएँ बदलीं। पूजा-पद्धतियाँ बदलीं। साहित्य के रूप बदले। दार्शनिक प्रश्नों की भाषा बदली। लोक ने शास्त्र को अपने ढंग से ग्रहण किया और शास्त्र ने लोक को प्रभावित किया। संस्कृत के साथ अनेक भारतीय भाषाओं ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक स्मृतियाँ विकसित कीं।

बदला बहुत कुछ, लेकिन सब कुछ समाप्त नहीं हुआ।

यही अंतर है परिवर्तन और विच्छेद में।

सनातनता परिवर्तन का विरोध नहीं करती; वह सांस्कृतिक विच्छेद का प्रतिरोध करती है। वह कहती है कि नया बनो, लेकिन अपनी स्मृति से पूरी तरह कटकर नहीं। अतीत को ढोओ मत, उससे संवाद करो।

एक वृक्ष इसका सुंदर उदाहरण है। उसकी जड़ें पुरानी होती हैं। तना परंपरा है। शाखाएँ वर्तमान हैं। पत्तियाँ हर मौसम में नई आती हैं। यदि वृक्ष कहे कि नई पत्तियाँ नहीं आएँगी क्योंकि हमारे पूर्वजों के समय ऐसी पत्तियाँ थीं, तो वृक्ष सूख जाएगा। और यदि वह कहे कि जड़ों की कोई जरूरत नहीं, तो भी उसका जीवन समाप्त हो जाएगा।

सनातनता शायद इसी वृक्ष का नाम है।

जड़ें पुरानी हैं, जीवन नया है।

इसलिए सनातन को समझने के लिए केवल अतीत की ओर देखना पर्याप्त नहीं। हमें वर्तमान की ओर भी देखना होगा। सनातन तभी जीवित है जब वह नए प्रश्नों का सामना कर सके।

आज मनुष्य के सामने हिंसा के नए रूप हैं, तकनीक की नई चुनौतियाँ हैं, प्रकृति के संकट हैं, अकेलापन है, असमानता है, युद्ध है, उपभोक्तावाद है। यदि करुणा, सत्य, अहिंसा, मैत्री, न्याय और मनुष्य की गरिमा जैसे मूल्य इन नए प्रश्नों के बीच अपना अर्थ खोज लेते हैं, तो वे परंपरा से निकलकर फिर सनातन हो सकते हैं।

यहीं ‘सनातन’ का अर्थ धार्मिक नारे से बहुत बड़ा हो जाता है।

वह मनुष्य की उस दीर्घ स्मृति का नाम बन जाता है जिसमें वह बार-बार पूछता है—क्या बचाया जाए? क्या बदला जाए? क्या छोड़ा जाए? और क्या ऐसा है जिसे बदलते समय के बीच भी बचाए रखना चाहिए?

सनातन की असली परीक्षा इसी प्रश्न में है।

पुराना हमें अतीत देता है।

परंपरा उस अतीत को आगे लाती है।

विवेक उसे परखता है।

रचनात्मकता उसे नया रूप देती है।

और जो इस पूरी यात्रा से गुजरकर भी अपना मानवीय और सांस्कृतिक अर्थ बचाए रखता है, वही सनातन के निकट पहुँचता है।

इसलिए ‘सनातन’ को जड़ता का पर्याय बनाना उसके साथ अन्याय है। और हर पुरानी बात को सनातन मान लेना भी उसके अर्थ को छोटा कर देता है।

सनातन का अर्थ शायद यह नहीं कि कुछ कभी बदला नहीं।

सनातन का अर्थ यह है कि बदलते हुए भी कुछ मूलतः बचा रहा।

बुद्ध का ‘एस धम्मो सनन्तनो’ इसी रहस्य को बहुत सरल शब्दों में खोल देता है। वैर का उत्तर वैर नहीं है। यह कोई एक युग का नियम नहीं। मनुष्य जहाँ भी है, जिस समय में भी है, वहाँ यह बात उसके अनुभव में फिर सत्य हो सकती है।

इसीलिए सनातन केवल अतीत नहीं है। वह अतीत से वर्तमान तक आती हुई और वर्तमान से भविष्य की ओर जाती हुई एक सांस्कृतिक चेतना है।

पुराना पीछे है।

परंपरा बीच में है।

वर्तमान सामने है।

और सनातन वह सेतु है जो इन तीनों को जोड़ता है।

सनातन स्मृति भी है और विवेक भी।
परंपरा भी है और परिवर्तन भी।
जड़ भी है और नई शाखा भी।
अतीत की आवाज भी है और भविष्य के लिए बचा हुआ अर्थ भी।

शायद इसलिए सनातन को सबसे सुंदर ढंग से इस तरह कहा जा सकता है—

पुराना समय से आता है,
परंपरा स्मृति से चलती है,
विवेक उसे परखता है,
रचनात्मकता उसे नया रूप देती है,
और जो बदलते समय में भी अपनी सार्थकता बचाए रखता है—वही सनातन है।

यही उसकी गतिकी है। यही उसकी सांस्कृतिकता है। और यही उसकी जीवित परंपरा।


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