—परिचय दास —
।। एक।।
मनुष्य होने की जगह
इतिहास समुद्रों को नापता है, मनुष्य की स्मृति उन्हें पार करती है। समुद्र के इस पार कोई घर छूट जाता है, उस पार कोई नया घर बसता है। बीच में पानी होता है, जहाज होता है, अनजानी धरती की आशंका होती है और एक छोटी-सी गठरी में बँधी हुई वह दुनिया होती है, जिसे मनुष्य अपने साथ ले जा सकता है। घर का पूरा संसार तो नहीं, लेकिन उसकी थोड़ी-सी मिट्टी, कुछ शब्द, कुछ स्वाद, कुछ प्रार्थनाएँ और अपनों के चेहरे मनुष्य की स्मृति में यात्रा करते रहते हैं।
भारत से समुद्र पार गए गिरमिटिया मजदूरों की स्मृति में यह यात्रा कुछ अधिक करुण है। गिरमिट, अर्थात् अनुबंध। अंग्रेजी के एग्रीमेंट से निकला यह शब्द सुनने में जितना कानूनी है, अपने ऐतिहासिक अर्थ में उतना ही मानवीय और विडंबनापूर्ण। कागज पर कुछ शर्तें लिखी जाती थीं, अंगूठे लगते थे, यात्राएँ तय होती थीं और मनुष्य अपने परिचित संसार से दूर श्रम की ऐसी परिस्थितियों में पहुँच जाते थे, जिनकी कठिनाइयों का अनुमान उनके लिए हमेशा संभव नहीं था। कागज पर एक अनुबंध था; जीवन में विस्थापन की लंबी कथा।
वे अपने देश से केवल दूर नहीं हुए थे, वे उस सहज परिचय से भी दूर हुए थे जिसमें किसी पेड़ को देखकर उसका नाम याद आ जाता है, किसी मौसम के आने पर कोई पुराना गीत मन में बजने लगता है और किसी अपरिचित के चेहरे में भी अपने गाँव का कोई आदमी दिखाई दे जाता है। पर मनुष्य स्मृति का ऐसा यात्री है कि उससे भूगोल बहुत कुछ छीन सकता है, सब कुछ नहीं। वह अपने भीतर एक देश बचाकर रखता है।
दक्षिण अफ्रीका की धरती पर भारतीय श्रमिकों ने श्रम किया, परिवार बनाए और पीढ़ियों को जन्म दिया। समय ने उनके बच्चों को उस देश का नागरिक बनाया, लेकिन पुरानी यात्राओं की स्मृति उनके पारिवारिक इतिहास में कहीं न कहीं बनी रही। एक पीढ़ी खेतों में काम करती है, दूसरी अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना देखती है, तीसरी उस भाषा में अपने अधिकारों की बात करती है जिसे सत्ता समझती है। इतिहास का यह रूप किसी विजय-घोषणा से अधिक गहरा है। यहाँ मनुष्य अपनी परिस्थितियों को एक ही बार में नहीं बदलता; वह धीरे-धीरे अपने बच्चों के लिए दुनिया बदलता है।
कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी कहानी किसी महान भवन में नहीं लिखी जाती। वह उस पिता की थकी हुई देह में लिखी जाती है जो दिन भर काम करके घर लौटता है; उस माँ की चिंता में, जो बच्चे की पढ़ाई के लिए अपनी जरूरत टाल देती है; उस लड़की की आँखों में, जो अपने लिए उस दुनिया में जगह चाहती है जहाँ उसके लिए पहले से बहुत-सी जगहें बंद कर दी गई हैं। ये छोटे दृश्य इतिहास की बड़ी पुस्तकों में अक्सर जगह नहीं पाते, लेकिन मनुष्य की वास्तविक यात्रा इन्हीं से बनती है।
न्याय का विचार भी शायद इसी घरेलू संसार से आरंभ होता है। एक बच्चा जब पूछता है कि उसके साथ दूसरे बच्चे जैसा व्यवहार क्यों नहीं किया गया, तब वह किसी कठिन दार्शनिक सिद्धांत की माँग नहीं कर रहा होता। वह केवल इतना चाहता है कि उसके होने को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार किया जाए जितनी सहजता से दूसरों के होने को स्वीकार किया जाता है। न्याय की समूची जटिलता के भीतर यह सरल आकांक्षा कहीं न कहीं जीवित रहती है।
लेकिन संसार सरल आकांक्षाओं को सरलता से स्वीकार नहीं करता। वह मनुष्यों के बीच भेद बनाता है, उन भेदों को परंपरा का नाम देता है, फिर उनके लिए नियम और तर्क तैयार करता है। कभी रंग किसी व्यक्ति की योग्यता से बड़ा बना दिया जाता है, कभी जन्म उसके अधिकारों का निर्णय करने लगता है, कभी किसी समुदाय की स्मृति को दूसरे समुदाय की सुविधा के लिए छोटा कर दिया जाता है। अन्याय की एक विशेषता यह है कि वह स्वयं को अन्याय कहकर सामने नहीं आता। वह व्यवस्था बनकर आता है, सामान्य व्यवहार बनकर आता है और कभी-कभी तो इतनी पुरानी आदत बन जाता है कि लोग उसके बिना समाज की कल्पना ही नहीं कर पाते।
ऐसे समय में कानून का महत्त्व समझ में आता है। कानून केवल धाराओं और उपधाराओं का विन्यास नहीं है। अपने श्रेष्ठ रूप में वह मनुष्य की उस इच्छा का सार्वजनिक रूप है, जिसके अनुसार किसी दूसरे मनुष्य की शक्ति, प्रतिष्ठा या जन्म उसे दूसरों से अधिक अधिकार नहीं दे सकता। लेकिन कानून का होना और न्याय का घटित होना अलग-अलग बातें हैं। किताब में समानता लिख देने से जीवन में समानता नहीं उतर आती। उसके लिए किसी को बोलना पड़ता है, किसी को सुनना पड़ता है, किसी को अपने पुराने विश्वासों पर प्रश्न करना पड़ता है और किसी को उस व्यक्ति के पक्ष में खड़ा होना पड़ता है जिसके साथ खड़ा होना सुविधाजनक नहीं है।
न्याय की राह पर चलने वाले मनुष्य का काम इसलिए केवल निर्णय तक पहुँचना नहीं होता। उसे यह भी समझना होता है कि निर्णय के पीछे किसकी आवाज है और किसकी आवाज अब तक दबाई जाती रही है। किसी अदालत में रखा गया एक मुकदमा कभी-कभी अपने कागजी विवरण से बहुत बड़ा होता है। उसमें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, किसी परिवार की प्रतीक्षा, किसी समुदाय का भय और किसी समाज की नैतिक परीक्षा एक साथ उपस्थित हो सकती है।
यहीं शांति का अर्थ भी बदलने लगता है। शांति क्या केवल इतना है कि सड़क पर गोली न चले, सीमाओं पर युद्ध न हो और शहरों में सामान्य जीवन चलता रहे? यदि कोई मनुष्य अपमान के भय से चुप है, यदि कोई समुदाय अपने अधिकारों की माँग करने से डरता है, यदि किसी स्त्री के विरुद्ध हिंसा को सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर छिपा दिया जाता है, तो उस शांति के भीतर बहुत-सी अशांतियाँ जमा हैं। ऊपर से स्थिर दिखाई देने वाला संसार भीतर से टूट रहा हो सकता है।
शांति का अर्थ शायद यह है कि मनुष्य को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए अकेला न छोड़ दिया जाए। उसे यह विश्वास हो कि उसकी बात सुनी जा सकती है, उसकी पीड़ा का नाम लिया जा सकता है और उसके साथ किए गए अन्याय का उत्तर माँगा जा सकता है। यह शांति युद्ध की अनुपस्थिति से आगे बढ़कर न्याय की उपस्थिति की माँग करती है।
मनुष्य की स्मृति में समुद्र और अदालत का संबंध कुछ विचित्र लग सकता है। एक ओर वह समुद्र है जिसने लोगों को उनके घरों से दूर पहुँचाया; दूसरी ओर वह अदालत है जहाँ मनुष्य अपने अधिकारों की भाषा खोजता है। लेकिन इन दोनों के बीच एक गहरा मानवीय प्रश्न है। मनुष्य जहाँ भी पहुँचे, क्या उसे मनुष्य होने की पूरी जगह मिलेगी? क्या उसका जन्मस्थान, उसका रंग, उसकी भाषा और उसके पूर्वजों का पेशा उसके वर्तमान जीवन की सीमा तय करते रहेंगे? या वह अपने श्रम, अपनी प्रतिभा, अपने विचार और अपने आचरण से अपना रास्ता बना सकेगा?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि से नहीं मिलता। कोई पुरस्कार भी इसका अंतिम उत्तर नहीं है। फिर भी कुछ जीवन इस प्रश्न को अधिक स्पष्ट कर देते हैं। वे हमें बताते हैं कि इतिहास की कठोर परिस्थितियाँ मनुष्य के लिए रास्ते बंद कर सकती हैं, लेकिन मनुष्य की संभावनाओं को हमेशा के लिए परिभाषित नहीं कर सकतीं। एक पीढ़ी जिस दरवाजे तक पहुँच भी नहीं पाती, अगली पीढ़ी कभी-कभी उसी दरवाजे पर दस्तक देती है। और कोई अगली पीढ़ी उस कमरे में प्रवेश करके उसके भीतर के नियमों को बदलने का प्रयास करती है।
यह किसी चमत्कार की कथा नहीं है। इसमें शिक्षा का श्रम है, अवसरों के लिए संघर्ष है, संस्थाओं की कठोरता है और लंबे समय तक अपने विश्वास पर टिके रहने का धैर्य है। इसे केवल प्रेरक कथा बनाकर पढ़ना भी पर्याप्त नहीं। इसके पीछे उन सामाजिक परिस्थितियों को देखना चाहिए जिन्होंने कुछ लोगों के लिए आगे बढ़ना कठिन बनाया और उन प्रयासों को भी, जिन्होंने उस कठिनाई को कम करने की कोशिश की।
गिरमिटिया इतिहास की स्मृति इसी कारण केवल अतीत की स्मृति नहीं है। वह वर्तमान से पूछती है कि हमने मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा के बारे में कितना सीखा है। क्या हमने अपने समाजों में ऐसे रास्ते बनाए हैं जहाँ किसी बच्चे की संभावना उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से पहले ही सीमित न कर दी जाए? क्या कानून कमजोर की रक्षा करने में उतना ही तत्पर है जितना शक्तिशाली के हितों की रक्षा करने में? क्या हम किसी दूसरे मनुष्य की पीड़ा को केवल इसलिए सुन पाते हैं कि वह हमारी अपनी भाषा में व्यक्त हुई है, या उसके शब्द अपरिचित होने पर भी उसका अर्थ समझने का प्रयास करते हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर हमेशा सुखद नहीं होंगे। सभ्यता का इतिहास उपलब्धियों का इतिहास है, लेकिन वह अपनी विफलताओं का इतिहास भी है। मनुष्य ने अधिकारों की घोषणाएँ लिखीं और उन्हीं के समय में अधिकारों का हनन भी किया। उसने स्वतंत्रता की प्रतिमाएँ बनाईं और अनेक लोगों को स्वतंत्रता से वंचित भी रखा। इसलिए किसी महान उपलब्धि का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि हम इतिहास की कठिनाइयों को भूल जाएँ। उसका अर्थ है कि हम उपलब्धि को उस अधूरे काम के संदर्भ में भी देखें, जिसके लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
नावी पिल्लै का नाम इसी संदर्भ में याद आता है। उनके जीवन की ओर देखते हुए हमारी दृष्टि एक व्यक्ति से आगे बढ़कर उस विचार तक जाती है कि न्याय किसी देश, किसी भाषा या किसी समुदाय की निजी संपत्ति नहीं है। मनुष्य की गरिमा का प्रश्न सीमाओं से बड़ा है। किसी दूर देश में किसी अनजान व्यक्ति के साथ अन्याय हुआ हो, तब भी वह अन्याय हमारी नैतिक दुनिया से बाहर नहीं हो जाता।
समुद्र पार गए पूर्वजों की स्मृति से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्याय के विचार तक की यह यात्रा अंततः एक ही प्रश्न पर आकर ठहरती है: मनुष्य को मनुष्य मानने में हमें इतनी कठिनाई क्यों होती है?
और शायद साहित्य का काम भी यही है कि वह इस प्रश्न को हमारे भीतर जीवित रखे। वह आँकड़ों के पीछे छूटे चेहरे दिखाए, उपलब्धियों के पीछे छूटे संघर्षों को याद दिलाए और उन लोगों की आवाजों के लिए जगह बनाए जिन्हें इतिहास ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा। साहित्य किसी अदालत का फैसला नहीं लिखता, लेकिन वह हमारी संवेदना को इतना सजग बना सकता है कि हम अन्याय को सामान्य मानकर उसके पास से गुजर न जाएँ।
समुद्र के उस पार गए किसी अनाम श्रमिक की संतान जब न्याय की अंतरराष्ट्रीय भाषा में बोलती है, तो इतिहास की सारी परतें एक साथ नहीं खुलतीं, लेकिन उनमें कहीं एक खिड़की अवश्य खुलती है। उस खिड़की से हमें कोई विजयी जुलूस नहीं दिखाई देता। दिखाई देती है मनुष्य की वह लंबी यात्रा, जिसमें वह अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीने योग्य दुनिया बनाने की कोशिश करता है।
शायद यही मनुष्य होने की सबसे बड़ी जगह है।
।। दो ।।
नवनीतम नावी पिल्लै का व्यक्तिगत
नवनीतम ‘नावी’ पिल्लै का जन्म 23 सितंबर , 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ। उनका बचपन रंगभेद की उस व्यवस्था के बीच बीता, जिसमें नस्ल के आधार पर मनुष्यों के अधिकार और अवसर निर्धारित किए जाते थे। उनके पिता बस चालक थे। साधारण आर्थिक परिस्थितियों वाले परिवार से निकलकर उन्होंने शिक्षा के माध्यम से अपना रास्ता बनाया।
उन्होंने कानून की पढ़ाई की और आगे चलकर अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय से विधि में शोध की उच्च उपाधि प्राप्त की। 1967 में उन्होंने नटाल प्रांत में अपनी स्वतंत्र कानूनी प्रैक्टिस शुरू की। वे अपने प्रांत में स्वतंत्र कानूनी कार्यालय स्थापित करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। रंगभेद के दौर में उन्होंने उन कार्यकर्ताओं और बंदियों का पक्ष लिया, जो नस्ली भेदभाव का विरोध कर रहे थे। उनके पेशेवर जीवन का आरंभ ही कानून को सामाजिक न्याय से जोड़ने के प्रयास के रूप में हुआ।
1995 में वे दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय की न्यायाधीश नियुक्त हुईं। 1999 में उन्हें रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश बनाया गया। बाद में उन्होंने इस न्यायाधिकरण की अध्यक्षता भी की। वहाँ उनके काम का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यौन हिंसा और बलात्कार को युद्ध तथा नरसंहार से जुड़े अपराधों के संदर्भ में न्यायिक रूप से स्थापित करने में योगदान था। इसके बाद वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की न्यायाधीश भी रहीं।
2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया। इस पद पर उनका दायित्व दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों की स्थिति पर ध्यान देना, उल्लंघनों के विरुद्ध आवाज उठाना और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेही को मजबूत करना था। 2021 से 2025 तक उन्होंने फिलिस्तीनी क्षेत्रों, पूर्वी यरुशलम और इजरायल से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जाँच आयोग की अध्यक्षता भी की।
9 अक्टूबर 2026 को नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उन्हें 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की। समिति ने अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और युद्ध-अपराधों, मानवता के विरुद्ध अपराधों तथा नरसंहार के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने के उनके प्रयासों को सम्मान का आधार बताया। पुरस्कार का औपचारिक समारोह 10 दिसंबर को ओस्लो में निर्धारित है।
नावी पिल्लै की जीवनी का महत्त्व उनकी पद-प्रतिष्ठा से आगे जाता है। वे उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं जिसने रंगभेद को केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि कानून और न्याय की कसौटी पर चुनौती देने योग्य व्यवस्था के रूप में देखा। उनकी यात्रा यह दिखाती है कि विधि का अध्ययन केवल संस्थागत सफलता का रास्ता नहीं, बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व का माध्यम भी हो सकता है।
उनके भारतीय तमिल मूल और दक्षिण अफ्रीका में भारतीय प्रवास के इतिहास के बीच संबंध अवश्य है। हालाँकि, उनके परिवार के पूर्वजों के गिरमिटिया मजदूर होने का दावा करने से पहले विशिष्ट पारिवारिक स्रोत की पुष्टि आवश्यक है। इतिहास की करुणा को तथ्य की शुद्धता से अलग नहीं किया जा सकता; दोनों साथ रहें, तभी स्मृति सचमुच अर्थवान होती है।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















