मनुष्यता के बीहड़ों में जयप्रकाश

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Parichay Das

— परिचय दास —

1\. अमेरिका में अंगूर तोड़ने वाला विद्यार्थी

जयप्रकाश नारायण की कहानी की शुरुआत किसी राजभवन, राजनीतिक मंच या प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से नहीं होती। सन् 1922 में वे अमेरिका पहुँचे तो उनके पास न कोई छात्रवृत्ति थी, न पर्याप्त धन। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें कैलिफोर्निया के अंगूर के बागों में काम करना पड़ा, फल डिब्बाबंद करने वाले कारखानों में श्रम करना पड़ा, रेस्तराँ में बर्तन धोने पड़े और गैराज में काम करना पड़ा। विश्वविद्यालय बदलने का एक कारण फीस का बढ़ना भी था। अंततः उन्होंने ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में एम.ए. किया।

इस प्रसंग में मुझे जयप्रकाश का कोई प्रेरणादायक चित्र नहीं, एक श्रमशील विद्यार्थी दिखाई देता है। वह व्यक्ति जो बाद में भारत के सबसे बड़े जनांदोलनों में से एक का नैतिक चेहरा बना, अपने जीवन के आरंभ में अपनी शिक्षा की कीमत अपने हाथों से चुकाता था।

अमेरिका ने उन्हें केवल विश्वविद्यालयों का ज्ञान नहीं दिया। वहाँ उन्होंने श्रम की दुनिया को निकट से देखा। आर्थिक असमानता उनके लिए किसी पुस्तक का सिद्धांत भर नहीं रही। श्रमिक का जीवन, उसकी थकान और अवसरों की असमानता उनके वैचारिक विकास का हिस्सा बने।

कभी-कभी जीवन किसी विचार को पहले शरीर से गुजरने देता है, फिर बुद्धि तक पहुँचाता है। जयप्रकाश के समाजवाद में इस अनुभव की छाप देखी जा सकती है।

2\. दीपावली की रात, जब जेल की दीवार छोटी पड़ गई

9 नवंबर 1942 की रात दीपावली थी। हजारीबाग केंद्रीय कारागार में बंद जयप्रकाश नारायण अपने पाँच साथियों के साथ जेल की दीवार लाँघकर निकल गए। बाहर निकलना ही उनकी कहानी का अंत नहीं था। वे लंबे समय तक छिपते हुए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भूमिगत गतिविधियाँ संचालित करते रहे और नेपाल की सीमा के निकट आजाद दस्ता के गठन में भूमिका निभाई। सितंबर 1943 में अमृतसर में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया।

इस घटना को प्रायः एक साहसिक पलायन की तरह सुनाया जाता है। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। जेल की दीवार पार करना एक क्षण का काम था; उसके बाद गिरफ्तारी के भय, पहचान छिपाने और लगातार बदलते ठिकानों के बीच अपने उद्देश्य को जीवित रखना कहीं अधिक कठिन था।

दीपावली की रात को हम प्रकाश और अँधेरे के प्रतीक में देखते हैं। उस रात जयप्रकाश के लिए अँधेरा केवल रात का अँधेरा नहीं था। वह औपनिवेशिक शासन का अँधेरा था, जिसमें स्वतंत्रता की आकांक्षा को भूमिगत होकर अपना रास्ता खोजना पड़ रहा था।

यहाँ कोई अलौकिक नायक नहीं है। एक मनुष्य है, जिसने जोखिम को समझते हुए भी अपने समय की पुकार से मुँह मोड़ना स्वीकार नहीं किया।

3\. चंबल में बंदूकें नीचे रखे जाने का क्षण

सन् 1972 में जयप्रकाश नारायण चंबल के बीहड़ों में उन बागियों के आत्मसमर्पण के प्रयास में लगे, जिन्हें पुलिस वर्षों से खोज रही थी। यह सामान्य मध्यस्थता नहीं थी। उन लोगों पर गंभीर अपराधों के आरोप थे, उनके सिर पर इनाम घोषित थे और सरकारी कार्रवाई का भय लगातार बना हुआ था। फिर भी जयप्रकाश ने उनके सामने आत्मसमर्पण और नए जीवन की संभावना रखी। 14 और 16 अप्रैल 1972 को सार्वजनिक समारोहों में बड़ी संख्या में बागियों ने हथियार डाल दिए।

इस कथा का एक विशेष प्रसंग मोहर सिंह से जुड़ा है। बिहार विधान परिषद की पत्रिका साक्ष्य पर आधारित एक प्रकाशित विवरण के अनुसार, जयप्रकाश ने बागियों को आश्वस्त किया कि उनके सामने आत्मसमर्पण करने वालों को फाँसी दिए जाने की स्थिति में वे स्वयं उपवास करेंगे। यह प्रसंग उनके हस्तक्षेप के पीछे मौजूद नैतिक उत्तरदायित्व को सामने लाता है।

कल्पना कीजिए उस दृश्य की: जिन हाथों ने वर्षों तक हथियार पकड़े थे, वे अब हथियार नीचे रख रहे थे। किसी बंदूक का मुँह नीचे होना अपने आप में प्रायश्चित्त नहीं है, न इससे अपराधों का हिसाब समाप्त हो जाता है। न्याय की प्रक्रिया फिर भी आवश्यक रहती है। लेकिन हिंसा के चक्र से बाहर आने की इच्छा को अवसर देना भी समाज का एक दायित्व है।

जयप्रकाश की विशेषता यह थी कि वे अपराध को निर्दोषता में बदलकर नहीं देखते थे। वे अपराध करने वाले मनुष्य के भीतर लौटने की संभावना तलाशते थे। इसीलिए उन्होंने बागियों के आत्मसमर्पण को उनका महिमामंडन बनाने से बचाने पर जोर दिया था। संबंधित पत्राचार में उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चात्ताप का वर्णन हो, अपराधियों का गौरवगान नहीं।

यह अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसी मनुष्य को बदलने का अवसर देना और उसके अपराध को उचित ठहराना दो अलग बातें हैं।

 4\. मुसहरी में अपनी असफलता स्वीकार करने वाला नेता

मुजफ्फरपुर जिले का मुसहरी क्षेत्र जयप्रकाश के जीवन का ऐसा अध्याय है, जिसे उनके चर्चित राजनीतिक प्रसंगों जितना ध्यान नहीं मिला। 1969-70 के दौरान वे वहाँ ग्रामीण समाज, भूमि संबंधों और वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी परिस्थितियों के बीच काम करने पहुँचे। वहाँ केवल भाषण देना या बाहर से समाधान सुझाना पर्याप्त नहीं था। सवाल था कि जमीन, सामाजिक वर्चस्व और ग्रामीण असमानता से जकड़े जीवन में वास्तविक परिवर्तन कैसे आए।

इस अनुभव से जुड़ी उनकी पुस्तक Face to Face का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि उसमें सामाजिक समस्याओं पर विचार मिलता है। प्रकाशित जीवन-वृत्त के अनुसार, उन्होंने वहाँ के अनुभवों में अपनी असफलता को भी असामान्य ईमानदारी से दर्ज किया। वे भूमि-संबंधों में जमी हुई शक्ति को बदल पाने में सफल नहीं हुए थे।

यह जयप्रकाश का कम चर्चित, लेकिन शायद सबसे शिक्षाप्रद रूप है।

सार्वजनिक जीवन में नेता प्रायः अपनी सफलताओं के लिए स्मारक बनवाते हैं। असफलताओं को या तो परिस्थितियों पर डाल दिया जाता है या जीवनी से बाहर कर दिया जाता है। जयप्रकाश के मुसहरी अनुभव का अर्थ यह है कि सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति अपनी सीमाओं का लेखा-जोखा भी दे सकता है।

मुझे लगता है, इस प्रसंग में जयप्रकाश की महानता उनके सफल होने में नहीं, अपनी असफलता से आँख न चुराने में है। समाज की जटिलता को स्वीकार करना भी बौद्धिक ईमानदारी है। हर समस्या किसी एक अच्छे आदमी की सदिच्छा से हल नहीं होती। कई बार व्यवस्था इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी होती है कि उसे बदलने के लिए दीर्घकालीन सामाजिक संघर्ष चाहिए।

मुसहरी हमें जयप्रकाश के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ उनके काम की सीमाओं को समझने का विवेक भी देता है।

5\. सत्ता का रास्ता सामने था, फिर भी उन्होंने पद नहीं चुना

जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता के बाद भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों तक पहुँच सकते थे। लेकिन उन्होंने स्वतंत्र भारत की सरकार में कोई पद नहीं संभाला। 1950 के दशक में उनका विश्वास संसदीय दलगत राजनीति की सीमाओं को लेकर गहरा होने लगा। 1954 में उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित करने की घोषणा की और आगे चलकर दलीय राजनीति से अलग हो गए। उनके जीवन पर उपलब्ध शोधपरक विवरण यह भी दर्ज करता है कि उन्होंने 1957 में प्रस्तावित पद्म भूषण स्वीकार नहीं किया।

यहाँ एक सूक्ष्म बात है। पद छोड़ देना अपने आप में महानता का प्रमाण नहीं होता। कोई व्यक्ति पद इसलिए भी छोड़ सकता है कि उसे कोई दूसरा, अधिक प्रभावशाली रास्ता दिखाई दे रहा हो। जयप्रकाश के मामले में महत्त्व इस बात का है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक ऊर्जा को सत्ता के गलियारों से हटाकर सामाजिक परिवर्तन, ग्राम-स्वराज और जनभागीदारी की ओर मोड़ने का प्रयास किया

वे राजनीति से उदासीन नहीं हुए। उन्होंने राजनीति की सीमा को चुनौती दी। उनका प्रश्न था कि क्या लोकतंत्र केवल इस बात का नाम है कि कुछ वर्षों के अंतराल पर जनता अपने शासक चुन ले, या जनता को अपने जीवन और स्थानीय संस्थाओं पर निरंतर अधिकार भी मिलना चाहिए?

उनके इस आग्रह में आज के लिए एक असुविधाजनक प्रश्न छिपा है। हम नेताओं की लोकप्रियता को अक्सर उनके पदों से मापते हैं। जयप्रकाश का जीवन हमें ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचने को बाध्य करता है, जिसने पद के बिना भी सार्वजनिक जीवन में असाधारण प्रभाव पैदा किया।

 6\. प्रभावती की अनुपस्थिति और एक बूढ़े होते मनुष्य का अकेलापन

जयप्रकाश के जीवन को केवल राजनीतिक घटनाओं के क्रम में पढ़ना उनके निजी संसार को अदृश्य कर देता है। उनकी पत्नी प्रभावती देवी का निधन 15 अप्रैल 1973 को हुआ। दोनों का वैवाहिक जीवन लंबे समय तक अलग-अलग स्थानों पर बीता था, क्योंकि प्रभावती गांधी के आश्रम और रचनात्मक कार्यों से जुड़ी रही थीं, जबकि जयप्रकाश की राजनीतिक और वैचारिक यात्रा उन्हें अलग दिशाओं में ले जाती रही। उपलब्ध जीवन-वृत्त उनके संबंध को निजी और सार्वजनिक साझेदारी, दोनों रूपों में देखता है।

प्रभावती के निधन के अगले वर्ष बिहार का छात्र आंदोलन जयप्रकाश को अपने नेतृत्व के लिए पुकार रहा था। तब वे सत्तर वर्ष से अधिक उम्र के थे और उनका स्वास्थ्य भी पहले जैसा नहीं था। उस आंदोलन का नेतृत्व करना केवल सार्वजनिक जीवन में लौटना नहीं था; वह एक निजी शोक के बाद फिर से सार्वजनिक उत्तरदायित्व ग्रहण करना भी था।

इस प्रसंग को किसी भावुक निष्कर्ष में बदलना उचित नहीं होगा। हम यह दावा नहीं कर सकते कि उनके आंदोलन में आने का एकमात्र कारण पत्नी की मृत्यु से उत्पन्न अकेलापन था। इतिहास इतने सरल कारणों से नहीं चलता। लेकिन यह अवश्य समझ सकते हैं कि जिस समय वे सार्वजनिक जीवन में एक नई भूमिका ग्रहण कर रहे थे, उस समय उनका निजी संसार भी गहरे परिवर्तन से गुजर चुका था।

बड़े जननेता भी निजी दुःख से मुक्त कोई अलग प्रजाति नहीं होते। वे भी अनुपस्थिति को अपने भीतर लेकर चलते हैं। अंतर इतना है कि कभी-कभी उन्हें अपने दुःख के साथ ही सार्वजनिक जीवन की पुकार का उत्तर देना पड़ता है।

इन प्रसंगों को एक साथ रखकर देखने पर जयप्रकाश नारायण की एक अलग तस्वीर उभरती है। अमेरिका में श्रम करने वाला विद्यार्थी, दीपावली की रात जेल से निकलने वाला स्वतंत्रता सेनानी, चंबल में हथियार रखवाने वाला मध्यस्थ, मुसहरी में अपनी सीमाएँ स्वीकार करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता और पदों से दूर रहकर लोकतंत्र के अर्थ पर प्रश्न उठाने वाला नागरिक।

इनमें से कोई एक प्रसंग उन्हें पूरी तरह नहीं समझाता। लेकिन इन सबके बीच एक सूत्र दिखाई देता है: जयप्रकाश बार-बार उस जगह गए, जहाँ मनुष्य और व्यवस्था के बीच कोई कठिन गाँठ पड़ी हुई थी। कभी वह गाँठ औपनिवेशिक शासन थी, कभी सामाजिक विषमता, कभी हिंसा, कभी दलगत राजनीति और कभी लोकतंत्र के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण की समस्या।

उनकी स्मृति का मूल्य किसी एक राजनीतिक दल की प्रशंसा या आलोचना में नहीं है। मूल्य इस बात में है कि हम उनके जीवन से मनुष्य की जटिलता, सार्वजनिक नैतिकता और परिवर्तन की कठिन प्रक्रिया को कितना समझते हैं।

किसी जन्मदिन पर हम प्रायः महान व्यक्ति की प्रतिमा के सामने खड़े होते हैं। इन संस्मरणों के सहारे शायद हम प्रतिमा से थोड़ा हटकर उस मनुष्य के पास जा सकते हैं, जो कभी अंगूर के बाग में काम कर रहा था, कभी जेल की दीवार पार कर रहा था, कभी बीहड़ में अपराधियों से बात कर रहा था और कभी अपनी असफलता को लिख रहा था।

लोकनायक होने से पहले जयप्रकाश एक ऐसे मनुष्य थे, जो अपने समय की कठिनाइयों से मुँह मोड़कर नहीं निकलते थे। शायद इसी वजह से उनका जीवन आज भी केवल याद किए जाने की वस्तु नहीं, समझे जाने की चुनौती है।

7\. इकतीस दिन का उपवास: जेल में भी अन्याय के विरुद्ध

जयप्रकाश के जीवन का एक प्रसंग राजस्थान के देवली नजरबंदी शिविर से जुड़ा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बंदी बनाया था। उपलब्ध सरकारी जीवन-वृत्त के अनुसार, वहाँ की खराब परिस्थितियों के विरोध में उन्होंने इकतीस दिन का उपवास किया।

इस घटना में उनकी राजनीतिक विचारधारा से अधिक उनका स्वभाव दिखाई देता है। वे जिस व्यवस्था को अन्यायपूर्ण मानते थे, उसके भीतर रहते हुए भी उसके नियमों को अंतिम सत्य मानकर स्वीकार नहीं करते थे। जेल में बंद मनुष्य के पास साधन सीमित होते हैं। वह अपनी आवाज से वंचित किया जा सकता है, उसकी गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है, उसके संपर्कों को नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे में उपवास शरीर को ही प्रतिरोध का माध्यम बना देता है।

लेकिन इस प्रसंग को केवल त्याग की गौरवगाथा की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उपवास का अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने शरीर को जोखिम में डालकर अपनी असहमति की गंभीरता व्यक्त कर रहा है। यह प्रतिरोध की ऐसी भाषा है, जिसमें बोलने वाला अपने कथन की कीमत स्वयं चुकाता है।

जयप्रकाश के व्यक्तित्व में यह आग्रह बार-बार दिखाई देता है। वे केवल दूसरों से साहस की अपेक्षा नहीं करते थे; कई बार अपने जीवन को भी अपने विश्वास की कसौटी पर रखते थे।

 8\. प्रभावती देवी: एक विवाह, दो स्वतंत्र जीवन

जयप्रकाश के जीवन की सबसे कम समझी गई कथाओं में उनकी पत्नी प्रभावती देवी का स्थान है। दोनों का विवाह 1920 में हुआ। जयप्रकाश 1922 में अमेरिका चले गए। प्रभावती गांधी के साबरमती आश्रम में रहने लगीं और वहाँ उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। यह निर्णय जयप्रकाश की पूर्व सहमति से नहीं हुआ था और आरंभ में इससे उन्हें मानसिक कष्ट पहुँचा। बाद में उन्होंने इस निर्णय को स्वीकार किया। दोनों का वैवाहिक जीवन लगभग तिरपन वर्षों तक चला, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा भौगोलिक दूरी में बीता।

इस संबंध को समझने के लिए उस समय के सामाजिक परिवेश और दोनों व्यक्तियों की स्वतंत्रता को ध्यान में रखना चाहिए। प्रभावती केवल किसी प्रसिद्ध पुरुष की पत्नी नहीं थीं। उनका अपना सार्वजनिक जीवन था, अपनी आस्थाएँ थीं और गांधीवादी रचनात्मक कार्यों में अपनी भूमिका थी। दूसरी ओर, जयप्रकाश का जीवन समाजवादी राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन और फिर सर्वोदय की ओर बढ़ रहा था।

उनके विवाह की कहानी किसी सामान्य घरेलू संस्मरण की तरह नहीं है। यहाँ दो लोग हैं, जिनके जीवन के रास्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहे, फिर भी उनका संबंध बना रहा।

हम अक्सर इतिहास के पुरुषों के जीवन में स्त्रियों को उनके त्याग की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। प्रभावती के प्रसंग में यह भूल विशेष रूप से अनुचित होगी। उनके अपने निर्णय थे, और उन निर्णयों के परिणाम दोनों के जीवन में उपस्थित रहे। जयप्रकाश की जीवनी को अधिक मानवीय बनाने के लिए प्रभावती को केवल उनके अकेलेपन की पृष्ठभूमि बनाकर देखना पर्याप्त नहीं है। वह स्वयं एक स्वतंत्र ऐतिहासिक व्यक्तित्व थीं।

15 अप्रैल 1973 को प्रभावती का निधन हुआ। अगले वर्ष बिहार के छात्र आंदोलन ने जयप्रकाश को नेतृत्व के लिए पुकारा। इस कालक्रम को देखते हुए उनके जीवन का निजी और सार्वजनिक पक्ष एक-दूसरे के निकट आ जाता है। हालांकि यह कहना कि उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व केवल निजी शोक के कारण स्वीकार किया, इतिहास को एक सरल मनोवैज्ञानिक सूत्र में बाँध देना होगा। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनके जीवन का अंतिम बड़ा राजनीतिक अध्याय पत्नी की मृत्यु के कुछ ही समय बाद शुरू हुआ।

कभी-कभी इतिहास की बड़ी घटनाओं के पीछे कोई एक कारण नहीं होता। अनेक धाराएँ एक साथ बहती हैं। निजी रिक्तता, सार्वजनिक पुकार, पुराना अनुभव और समय की माँग मिलकर किसी निर्णय को जन्म देते हैं।

 9\. मुसहरी में नक्सलियों से संवाद: पाँच वर्ष का प्रस्ताव

जयप्रकाश नारायण के जीवन का मुसहरी प्रसंग इसलिए उल्लेखनीय है कि वहाँ वे किसी लोकप्रिय आंदोलन के नायक बनकर नहीं, एक कठिन सामाजिक समस्या से जूझते हुए व्यक्ति के रूप में दिखाई देते हैं।

मुजफ्फरपुर के मुसहरी क्षेत्र में भूमि-संबंधों और उग्र वामपंथी गतिविधियों के बीच तनाव था। कुछ सर्वोदय कार्यकर्ताओं को धमकियाँ मिलीं तो जयप्रकाश वहाँ पहुँचे। उन्होंने नक्सलियों से संवाद किया और उनसे अहिंसक परिवर्तन की संभावना को समय देने का आग्रह किया। पत्रकार रुचिरा गुप्ता के संस्मरणात्मक लेख के अनुसार, उन्होंने उनसे कहा कि यदि वे पाँच वर्षों में अहिंसक कार्रवाई की श्रेष्ठता का विश्वास नहीं दिला पाए, तो उन्हें दूसरों को उनके रास्ते से रोकने का नैतिक अधिकार नहीं होगा।

इस प्रसंग की सुंदरता किसी नाटकीय विजय में नहीं, संवाद की उस शर्त में है जिसे जयप्रकाश ने अपने ऊपर भी लागू किया। वे यह नहीं कह रहे थे कि उनके पास हर प्रश्न का उत्तर पहले से मौजूद है। वे कह रहे थे कि उन्हें अपनी बात को व्यवहार में सिद्ध करने के लिए समय चाहिए।

यह दृष्टि किसी भी वैचारिक संघर्ष में दुर्लभ है। प्रायः हर पक्ष स्वयं को पूर्ण सत्य का प्रतिनिधि मानता है और दूसरे पक्ष से तत्काल आत्मसमर्पण की अपेक्षा करता है। जयप्रकाश ने यहाँ संवाद को एक परीक्षा की तरह रखा, जिसमें केवल दूसरे व्यक्ति की नहीं, अपनी पद्धति की भी परीक्षा होनी थी।

इसका अर्थ यह नहीं कि हिंसा और अहिंसा समान नैतिक स्थिति में खड़ी हो जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि अहिंसा का दावा करने वाले को भी अपने व्यवहार, परिणामों और विश्वसनीयता का हिसाब देना चाहिए।

मुसहरी की कहानी हमें बताती है कि जयप्रकाश केवल संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाले नेता नहीं थे। वे उस गाँव में जाकर रह सकते थे, जहाँ परिवर्तन की उनकी कल्पना को सबसे कठिन चुनौती मिल रही थी। उन्होंने वहाँ Face to Face में अपने अनुभवों और सीमाओं पर लिखा।

किसी विचारक की परीक्षा उसके अनुकूल वातावरण में नहीं होती। उसकी परीक्षा उस जगह होती है, जहाँ जीवन उसके सिद्धांतों से सहमत होने से इनकार कर देता है।

10\. नागालैंड की शांति: जहाँ आंदोलन की जगह बातचीत थी

जयप्रकाश नारायण की सार्वजनिक भूमिका का एक कम चर्चित पक्ष नागालैंड के शांति-प्रयासों से जुड़ा है। 1964 में वे नागालैंड पीस मिशन में शामिल हुए। इस मिशन में रेवरेंड माइकल स्कॉट और असम के मुख्यमंत्री बी. पी. चालिहा भी थे। इस प्रयास से संघर्षरत पक्षों के बीच युद्धविराम की दिशा में प्रगति हुई।

जयप्रकाश की छवि अक्सर बिहार आंदोलन और आपातकाल के विरोध से जुड़कर सामने आती है। लेकिन नागालैंड का प्रसंग बताता है कि वे हर संघर्ष का उत्तर जनसभा और विरोध-प्रदर्शन में नहीं खोजते थे। कहीं उन्हें वार्ता की मेज पर बैठना था, कहीं परस्पर अविश्वास के बीच भरोसे का रास्ता बनाना था।

शांति-प्रक्रिया का काम बाहर से देखने पर धीमा और नीरस लग सकता है। इसमें तत्काल तालियाँ नहीं मिलतीं। कोई विशाल जुलूस नहीं निकलता। कोई एक क्षण ऐसा नहीं आता, जिसमें सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँ। बातचीत में सुनना पड़ता है, दूसरे पक्ष के भय को समझना पड़ता है और ऐसी भाषा खोजनी पड़ती है जिसमें विरोधी पक्ष एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार कर सकें।

जयप्रकाश के जीवन में यह पक्ष इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को एक ही रंग में देखने से रोकता है। वे कभी प्रतिरोध के प्रतीक थे, कभी सामाजिक पुनर्निर्माण के समर्थक और कभी शांति के लिए मध्यस्थ।

उनकी दृष्टि में संघर्ष का अंत हमेशा किसी पक्ष की पूर्ण पराजय में नहीं होना चाहिए। कभी-कभी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि लोग एक-दूसरे को मारने के बजाय फिर से बातचीत करने लगें।

11\. इंदिरा गांधी को जेल से लिखा पत्र: क्रोध के भीतर चिंता

आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार कर लिया गया। 21 जुलाई 1975 को उन्होंने इंदिरा गांधी को जेल से एक पत्र लिखा। यह पत्र आज इसलिए विशेष महत्त्व रखता है कि इसमें राजनीतिक विरोध के साथ एक गहरी निजी और राष्ट्रीय चिंता भी उपस्थित है। पत्र का मूल हस्तलेख प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अभिलेखागार में सुरक्षित बताया गया है।

पत्र में जयप्रकाश ने लोकतंत्र पर हो रहे प्रहारों का विरोध किया। उन्होंने प्रेस पर प्रतिबंधों, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों और असहमति को दबाने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाए। साथ ही उन्होंने इंदिरा गांधी से अपील की कि वे उन लोकतांत्रिक आधारों को नष्ट न करें जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन ने स्थापित किया था।

इस पत्र का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि राजनीतिक कठोरता के बीच जयप्रकाश ने अपने निजी अकेलेपन का भी उल्लेख किया। प्रभावती की मृत्यु के बाद वे स्वयं को अत्यंत अकेला अनुभव कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि उनका जीवन-कार्य पूरा हो चुका है और उनके पास अब जीने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।

यह पंक्ति पढ़ते हुए राजनीति की परिचित तस्वीर बदल जाती है। सार्वजनिक मंच पर जिस व्यक्ति की आवाज हजारों लोगों को प्रेरित करती थी, वही व्यक्ति जेल की एकांत स्थिति में अपने निजी शोक से भी गुजर रहा था। वह सरकार से असहमत था, लेकिन पत्र में केवल राजनीतिक आरोप नहीं थे। उसमें एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी की चिंता थी, जिसने जिस लोकतंत्र के लिए जीवन लगाया, उसी लोकतंत्र को अपने सामने संकट में देखा।

पत्र का एक और महत्त्वपूर्ण विचार यह था कि किसी व्यक्ति को स्वयं को राष्ट्र के बराबर नहीं मान लेना चाहिए। राष्ट्र किसी प्रधानमंत्री, दल या शासन से बड़ा होता है। यह बात आज भी लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी है।

जयप्रकाश का विरोध व्यक्तिगत प्रतिशोध तक सीमित नहीं था। वे इंदिरा गांधी की सत्ता का विरोध कर रहे थे, लेकिन अपने पत्र में राष्ट्र की संस्थाओं और लोकतांत्रिक परंपरा की रक्षा की बात कर रहे थे। इसीलिए उस पत्र को केवल दो राजनीतिक व्यक्तियों के बीच विवाद के रूप में पढ़ना उसके अर्थ को सीमित कर देगा।

यह एक ऐसे व्यक्ति की आवाज थी, जो अपनी राजनीतिक असहमति को राष्ट्रीय चिंता में बदलना चाहता था।

 12\. पद्म भूषण को स्वीकार न करना

जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्र भारत की सरकार में कोई पद नहीं संभाला। उनके जीवन-वृत्त में यह भी दर्ज है कि 1957 में उन्होंने पद्म भूषण स्वीकार नहीं किया। उपलब्ध जीवनी के अनुसार, वे सार्वजनिक सेवा में लगे व्यक्ति द्वारा सरकारी सम्मान स्वीकार करने को उचित नहीं मानते थे।

इस घटना को केवल पुरस्कार ठुकराने की बहादुरी के रूप में देखना बहुत आसान होगा। अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि जयप्रकाश अपने सार्वजनिक जीवन और राज्य-सत्ता के बीच एक दूरी बनाए रखना चाहते थे। वे यह नहीं चाहते थे कि उनके सामाजिक कार्य का मूल्यांकन केवल सरकारी सम्मान से हो।

हालाँकि सम्मान स्वीकार करना अपने आप में गलत नहीं होता और न उसे अस्वीकार कर देना अपने आप में श्रेष्ठता का प्रमाण है। प्रसंग का अर्थ व्यक्ति की घोषित मान्यता और उसके सार्वजनिक आचरण के संबंध में है। जयप्रकाश के लिए सामाजिक परिवर्तन की प्रतिबद्धता ऐसी चीज थी, जिसका मूल्य किसी अलंकरण से तय नहीं होना चाहिए था।

आज पुरस्कारों और पदों के इर्द-गिर्द जो सार्वजनिक प्रतिष्ठा बनती है, उसके बीच यह प्रसंग हमें एक असुविधाजनक प्रश्न देता है: क्या हम किसी व्यक्ति के काम का मूल्य उसके परिणामों से आँकते हैं या उसके नाम के आगे लगे विशेषणों से?

जयप्रकाश की जीवन-यात्रा इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं देती, लेकिन प्रश्न पूछने की आदत जरूर डालती है।

13\. मृत्यु की झूठी खबर और एक असाधारण विडंबना

जयप्रकाश नारायण के जीवन के अंतिम वर्षों का एक विचित्र प्रसंग भी दर्ज है। मार्च 1979 में संसद तक उनकी मृत्यु की गलत खबर पहुँच गई और सदन ने शोक व्यक्त करना शुरू कर दिया, लेकिन बाद में पता चला कि खबर गलत थी। उनके जीवन पर उपलब्ध अभिलेखीय विवरण इस घटना को दर्ज करता है।

इस प्रसंग को केवल हास्यास्पद भूल कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं। इसमें इतिहास की एक विडंबना भी दिखाई देती है। जयप्रकाश उस समय गंभीर रूप से अस्वस्थ थे। आपातकाल के दौरान हिरासत में उनकी किडनी खराब हुई थी और बाद के जीवन में उन्हें नियमित डायलिसिस की आवश्यकता पड़ी। 1977 के चुनाव में वे स्वयं सक्रिय प्रचार करने की स्थिति में नहीं थे, फिर भी उनके नैतिक प्रभाव ने विपक्षी दलों को एकजुट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राजनीति में उनकी शक्ति किसी पद से नहीं आती थी। इसलिए उनके जीवन के अंतिम वर्षों में, जब शरीर कमजोर हो रहा था और वे सार्वजनिक मंचों पर पहले की तरह उपस्थित नहीं हो सकते थे, उनका प्रभाव फिर भी बना रहा।

एक व्यक्ति का शरीर धीरे-धीरे थक सकता है, लेकिन उसके विचारों का सार्वजनिक जीवन में बना रहना अलग बात है। जयप्रकाश के जीवन में यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

उनकी मृत्यु 8 अक्टूबर 1979 को हुई, अपने सतहत्तरवें जन्मदिन से तीन दिन पहले।

इतिहास की दृष्टि से यह एक तारीख है। लेकिन उनके जीवन को पढ़ने वाले के लिए यह उस लंबे संघर्ष का अंत है, जिसमें एक व्यक्ति ने सत्ता, विचार, समाज और अपने ही विश्वासों के साथ निरंतर संवाद किया।

जयप्रकाश को याद करने का दूसरा तरीका~

इन प्रसंगों को एक साथ रखकर देखें तो जयप्रकाश नारायण की छवि एक ही राजनीतिक पहचान में समा नहीं पाती। वे कभी जेल की खराब परिस्थितियों के विरुद्ध उपवास करने वाले बंदी हैं, कभी प्रभावती देवी के साथ एक जटिल निजी जीवन जीने वाले पति, कभी मुसहरी में अपने विचारों को सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, कभी नागालैंड में शांति का रास्ता खोजने वाले मध्यस्थ और कभी इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर लोकतंत्र के भविष्य की चिंता करने वाले नागरिक।

उनके जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता शायद यह है कि वे अपने विश्वासों को स्थिर प्रतिमाओं में बदलकर नहीं बैठे रहे। उन्होंने समाजवाद से सर्वोदय की ओर यात्रा की, दलगत राजनीति से दूरी बनाई और फिर छात्र आंदोलन की पुकार पर सार्वजनिक जीवन में लौटे। उनकी यात्रा में विरोधाभास भी हैं, सीमाएँ भी हैं और ऐसे प्रश्न भी, जिन पर आज बहस की जा सकती है। लेकिन उन्हें समझने का अर्थ इन प्रश्नों को मिटा देना नहीं, उनके साथ ईमानदारी से रहना है।

जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन मनाने का एक तरीका उनके नाम के साथ जुड़े विशेषणों को दोहराना है। दूसरा तरीका उनके जीवन के उन क्षणों में उतरना है, जहाँ उन्होंने कोई आसान रास्ता नहीं चुना। अमेरिका में पढ़ाई के लिए श्रम करना, जेल में अन्याय के विरुद्ध खड़े होना, हिंसा से जुड़े लोगों के लिए वापसी की संभावना खोजना, अपनी असफलता को स्वीकार करना और लोकतंत्र के संकट के समय सत्ता से प्रश्न करना, ये सभी उनके जीवन के अलग-अलग दृश्य हैं।

इन दृश्यों में कोई एक पूर्ण नायक नहीं मिलता। एक मनुष्य मिलता है, जो अपने समय की कठिनाइयों से जूझता है और बार-बार अपने विश्वासों को जीवन की कसौटी पर रखता है।

किसी व्यक्ति की स्मृति का सबसे बड़ा सम्मान शायद यही है कि हम उसे इतना जीवित रखें कि वह हमारे समय से भी प्रश्न कर सके। जयप्रकाश नारायण की स्मृति आज भी इसी अर्थ में जीवित है। वे हमें केवल यह नहीं बताते कि अतीत में क्या हुआ था। वे यह पूछने के लिए विवश करते हैं कि आज हम अपने लोकतंत्र, अपनी असहमति, अपनी सामाजिक संवेदना और अपने सार्वजनिक उत्तरदायित्व के साथ क्या कर रहे हैं।


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