
कल रात घर में बैठे हुए खिड़की दरवाजे बंद करने के बावजूद पोटाश के धुएं और कान फाडू आतिशी बम फटने के कारण दम घुटने, आंखों में चरमराहट के साथ जब थूकना पड़ा तो काला स्याह बलगम देखकर अपना दिल्ली शहर भी बेगाना लगने लगा।
आतिशबाजी पर कई साल की कानूनी बंदिश के बाद कोर्ट की मेहरबानी से कथित ‘ग्रीन पटाखे’ चलाने की इजाजत के साथ दिल्ली के नवदौलतयों ने पिछले सालों की भी कसर निकालते हुए जमकर पटाखे चलाएं। पॉल्यूशन सूचकांक की तो बात ही नहीं करिए, मापने वाली मशीन ही बेदम हो चुकी थी। हर तरफ शोर गुल था, आते-जाते मोटर साइकिल सवार, गाड़ी चलाते लोग जगह जगह रूक कर पटाखे की आग के शिकार ना हो हो जाए रुकने पर मजबूर हो रहे थे। सुबह जले हुए पटाखों के कागज और कचरे से सड़क अटी-पटी थी।
एक मंजर यह था और आज से 50-60 साल पहले की भी दिवाली थी। महीनों पहले दिवाली की तैयारी शुरू हो जाती थी। मिट्टी के छोटे बड़े दीये को पानी में रखकर सुखाया जाता था, खील बताशे, चीनी की बनी हटड्डी, खिलौने, देवी देवताओं के शीशे में जड़े चित्र घर पर लाएं जाते थे। रंगीन पारदर्शी पन्नियों में कंदील जिसमें दो पतली दंढिया लगाकर उस पर जलता हुआ दीपक रखा जाता था। घर में सुबह से ही पूरी सब्जी, मिठाई के पकवान की सुगंध आने लगती थी। दीवाली की रात से अगली रात तक घर के बच्चे दिवाली की मामूली मिठाई और खील बताशे प्लेट में रखकर पड़ोसी के घर आते जाते एक दूसरे को देते रहते थे। दिवाली की रात मिट्टी के कड़वे तेल में जलते हुए दीये अपने घर, दुकान, मंदिर वगैरह में रखकर प्राकृतिक सुगंध में रोशनी का लुफ्त उठाते थे। बच्चों को तो खासतौर से उस दिन का इंतजार इसलिए भी रहता था कि घर के बड़े बूढ़े उनको रूपए पैसे दिया करते थे।
उन दिनों की दिवाली की एक खास बात यह भी थी कि घर परिवार के साथ-साथ पड़ोसियों के साथ दिवाली सम्मिलित उत्सव के रूप में मनाई जाती थी। गुरबत और रईस के फर्क का कोई नंगा नाच देखने को नहीं मिलता था। आज मैं देखता हूं कि नए-नए बने रईस और उनकी नकल में कम माली हैसियत वाले भी दिवाली के दिन अपने घरों की रोशनी चीन द्वारा निर्मित बिजली की लड़ियां और पटाखे जो की सुनने में आता है कि 50000 से ₹100000 तक के खरीद कर घर के बाहर कुर्सियां बिछाकर देर रात तक पटाखें जलाकर अपनी मालदारी का प्रदर् एक नया चलन और देखने को मिला, अन्य मसलों की तरह पटाखों के साथ धार्मिकता की परत भी लपेट दी जा रही है। मेरी एक संभ्रांत, पढ़ी-लिखी महिला जानकार से पटाखों के सवाल पर मनमुटाव हो गया। उनका कहना था कि पटाखों पर किसी भी प्रकार की बंदिश हिंदू धर्म पर बंदिश है। गैर हिंदू मजहबी लोगों से हिंदुओं की खुशी देखी नहीं जाती, उनके दबाव में पटाखों पर रोक लगा दी जाती है।
21 अक्टूबर 2025 को रात्रि के 2:30 बजे एयर विजुअल के अनुसार एक्यूआई की स्थिति इस प्रकार थी।
दिल्ली -1029
गुड़गांव -1376
नोएडा -693 थी।
दिवाली के दूसरे दिन भी पटाखे की आवाज सुनाई दे रही है। दिल्ली वालों की सेहत पर इसका क्या असर पड़ रहा है, उसकी बनस्पित शान शौकत तथा धार्मिक उन्माद अभी तो जोर मार रहा है।
















