
मैत्री और करुणा, परोपकार और परमार्थ, वीरता और क्षमा, प्रेम और सहिष्णुता—इन्हीं मूल्यों और आदर्शों के बीच सर्वत्र अहिंसा अंकुरित होती है। विश्व के सभी धर्म और सभी देशों के राष्ट्रीय संविधान इसी की संभावना को इंगित करते हैं। लेकिन यह शोचनीय सच है कि मानव समुदाय आज तक हिंसा से अहिंसा की ओर निर्णायक प्रस्थान करने में असमर्थ रहा है। वस्तुतः एक सामान्य मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन और सामुदायिक गतिविधियों में व्यक्तिगत और सामूहिक वर्चस्वता, स्वार्थ, लोभ, असुरक्षा, भय, अहंकार और क्रोध का बड़ा योगदान रहता आया है। फिर भी गांधीजी के व्यक्तित्व और विचार में अहिंसा-आस्था का प्रकाश कैसे बना रहा? उनकी आध्यात्मिक खोज को किसने संरक्षण दिया? वह एक ‘विलायत में पढ़े बैरिस्टर’ से ‘भारतीय महात्मा’ कैसे बने?
आस्था, संस्कृति और अस्मिता के आग्रहों ने हिंसा की गुंजाइश और अहिंसा की श्रेष्ठता—दोनों को बनाए रखा है। एक तरफ हिंसामय विश्व में अहिंसा की तलाश जारी है। दूसरी तरफ, अहिंसक जीवन और सभ्यता की रचना के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन से हिंसा को निर्मूल करने की चुनौती को भी पहचानने का दबाव है। इस संदर्भ में अहिंसा का सामाजिक आधार निर्मित करने का कौशल विकसित करना गांधी का युगांतरकारी योगदान है। इसलिए यह जानना-बताना ज़रूरी है कि गांधीजी में यह क्षमता कैसे फली-फूली?
वस्तुतः आज से १३० साल पहले, १८९१ में, एक २२ वर्षीय भारतीय युवक इंग्लैंड से सुशिक्षित होकर भारत लौटा और स्वदेश वापसी के पहले दिन ही संयोगवश उसकी मुलाक़ात एक २४ वर्षीय ‘शतावधानी’ युवक से हुई। पहली भेंट में ही दोनों में निकटता हो गई और अगले दस बरसों में यह विशिष्ट संबंध ब्रिटेन से वकालत की ऊँची पढ़ाई करके वयस्क जीवन में प्रवेश करने वाले युवक के आध्यात्मिकता के शिखर की ओर बढ़ने का कारण बना। इनमें से पहला युवक अगले पाँच दशकों में क्रमशः रंगभेद, उपनिवेशवाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकता के निवारण का मंत्रदाता सिद्ध हुआ। दूसरा युवक कुल ३४ बरस की आयु-अवधि के बावजूद एक महासिद्ध के रूप में अहिंसा, अनासक्ति और अपरिग्रह के लिए प्रसिद्ध जैन धर्म का आधुनिक मार्गदर्शक बना। उन्होंने दिगम्बर और श्वेताम्बर पंथ के गहन विमर्शों की सहज व्याख्या के ज़रिये ‘आत्मसिद्धि’ के मार्ग को प्रशस्त किया।
यहाँ हम गांधीजी (१८६९–१९४८) और श्रीमद राजचंद्र जी (१८६७–१९०१) की अद्वितीय आध्यात्मिक मैत्री की चर्चा कर रहे हैं। गांधीजी के जीवन-मार्ग निर्धारण में इस रिश्ते की ऐतिहासिक भूमिका के कई आयाम थे। एक, श्रीमद राजचंद्र ने ही पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता के कारण दुविधाग्रस्त हो चुके गांधीजी के भ्रमित मन में अपने ज्ञान-प्रकाश से ‘आत्मार्थी’ बनने का संकल्प पैदा किया। दूसरे, भारतीय चिंतन-परंपरा से परिचित होने के लिए ‘षड्दर्शन’ समेत कई ज़रूरी ग्रंथों के पाठ की प्रेरणा दी। तीसरे, १८९१ और १९०१ के बीच निरंतर शंका-समाधान के ज़रिये भारतीय आध्यात्मिक परंपरा—अर्थात वैदिक विमर्श, जैन धर्म-साधना और बौद्ध धर्म-दर्शन से बनी ‘आर्य-धर्म की सनातन धारा’—के प्रति विश्वास को मज़बूत किया। इसमें दक्षिण अफ्रीका में ‘आत्ममंथन’ से गुज़र रहे गांधीजी और भारत में ‘आत्मसिद्धि’ कर चुके श्रीमद राजचंद्र के बीच हुए प्रश्नोत्तरों की बहुत प्रासंगिकता थी।
चौथे, श्रीमद राजचंद्र की आध्यात्मिक ज्योति के आलोक में गांधीजी ने हिंदू धर्म के बहुचर्चित दोषों से ऊबकर एक बेहतर धर्म के रूप में ईसाई धर्म अपनाने के निर्णय को बदला। सर्वधर्म-समभाव की राह को पहचाना और सत्य-अहिंसा तथा प्रेमबल की त्रिवेणी के साक्षात् प्रतीक बने।
इसी ज्ञान-संबंध की बुनियाद पर गांधीजी १८९१ और १९०६ के कठिन वर्षों के बीच की १५ बरसों की अवधि में अनेक व्यक्तिगत और सार्वजनिक प्रयोगों में जुटे। श्रीमद राजचंद्र द्वारा मिले मार्गदर्शन से विकसित हुए अपने चिंतन में लियो तोलस्तोय की शिक्षाओं, जान रस्किन के सूत्रों और थोरो के सिद्धांतों का समावेश करते हुए सर्वोदय के अन्वेषी बने। अन्यायग्रस्त विश्व-व्यवस्था के बदलाव के लिए प्रयासरत स्त्री-पुरुषों के लिए रचनात्मक सुधार और सत्याग्रही प्रतिरोध के अहिंसक पथ का निर्माण किया।
















