जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख़्त ने ‘गैलिलियो’ के जीवन पर टिप्पणी करते हुए एक कालजयी पंक्ति लिखी थी— “दुर्भाग्यशाली है वह देश, जिसे नायकों की ज़रूरत पड़ती है।” यह कथन प्रथम दृष्टया कठोर लग सकता है, लेकिन यदि इसे महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन के आईने में देखा जाए, तो यह एक गहरे सत्य का उद्घाटन करता है।
गांधी स्वयं नायक-पूजा (Hero Worship) के प्रबल विरोधी थे। वे नहीं चाहते थे कि समाज किसी एक महामानव के भरोसे अपनी बुद्धि और विवेक गिरवी रख दे। उनका स्वप्न एक ऐसे समाज का निर्माण था, जहाँ हर नागरिक इतना विवेकशील, आत्मनिर्भर और नैतिक हो कि उसे किसी ‘तारणहार’ की आवश्यकता ही न पड़े।
गांधी के लिए सत्य और अहिंसा किसी अवतार के विशेष गुण नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य के दैनिक जीवन का आधार थे। गांधी की महानता इसमें नहीं है कि उन्होंने अनुयायी (Followers) बनाए, बल्कि इसमें है कि उन्होंने साधारण जनों को निर्भय और विचारशील नागरिक बनाया। गांधीजी ऐसा समाज चाहते थे जो स्वयं सत्य के लिए खड़ा होना सीख जाए, वहाँ ‘हीरो’ नहीं, ‘चरित्र’ प्रधान हो।
सीमाओं से परे व्यक्तित्व का विस्तार
इतिहास गवाह है कि युग-परिवर्तनकारी व्यक्तित्व कभी भी वंशानुगत खाँचों या रूढ़ियों में बंधकर नहीं चले। अरस्तु का कथन है कि “पूर्ण, अपने अंशों के योग से बड़ा होता है,” और यह बात गांधी पर अक्षरशः लागू होती है। आप उनके जीवन के सैकड़ों प्रसंगों को जोड़ लें, फिर भी उनका विराट व्यक्तित्व किसी एक परिभाषा में नहीं समाता। वे उन दुर्लभ विश्व-चिंतकों में से थे, जो अपनी आलोचनाओं से डरते नहीं थे, बल्कि स्वयं को निरंतर परिष्कृत (Refine) करते थे। उन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का जरिया नहीं, बल्कि मानवता की सेवा और धर्म-साधना का माध्यम बनाया।
गांधी को समझने की भूल
सांप्रदायिकता गांधी को निगल तो नहीं सकीं पर उनकी हत्या के बाद उनके वास्तविक स्वरूप पर पर्दा डालने में सफल रही। हालांकि अब यह पर्दा धीरे धीरे खुलता जा रहा है और लोग गांधीजी के वृहद रूप को अब समझने भी लगे हैं। आजादी के बाद जो सरकारें बनी वे भी इस पर्दे के खोलने में ज्यादा गंभीर नहीं दिखीं। गांधी गैलीलियो की भांति अपने सच को बदलने को तैयार नहीं थे, उन्होंने सच बोलने की कीमत तीन गोलियां खाकर चुकाई।
गांधीजी की हत्या के बाद, दुनियाभर के लोग गांधीजी के वास्तविक स्वरूप को हमारी अपेक्षा अधिक समझ सके। भारत ने उन्हें समझने के प्रयासों में कई बड़ी भूलें की –
पहला उनकी राजकीयकरण कर उन्हें सरकारी दफ्तरों और दीवारों पर टंगी तस्वीर बना दिया और नोटों पर छाप दिया।
दूसरा उन्हें संत की उपाधि देकर उनकी राजनीतिक और सामाजिक प्रासंगिकता को धुंधला कर दिया गया।
तीसरा उन्हें मात्र आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताओं की पंक्ति में सीमित कर दिया गया।
सच तो यह है कि गांधी इन तीनों परिभाषाओं से बड़े थे। वे खादी के वेश में एक ऐसे धार्मिक व्यक्ति थे, जिनके लिए धर्म का अर्थ मंदिर की घंटी नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा थी, उनका धर्म ‘कर्मकांड’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय था। जब दलितों के मंदिर-प्रवेश का प्रश्न उठा, तो गांधी ने स्पष्ट कहा—यदि ईश्वर के घर में किसी के जाने पर रोक है, तो मैं ऐसे प्रतिबंध को तोड़ने के लिए प्राण भी दे दूँगा। यह गांधी की ‘असुविधाजनक नैतिकता’ थी, जो कड़वी जरूर थी, पर सत्य थी।
दिनकर ने ठीक लिखा है- दिग्विजय करने वाले योद्धा इस देश में भी बहुत हुए, किंतु भारत नाम में जो दिव्यता है उसके प्रतीक यहां अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर रहे हैं; चंद्रगुप्त नहीं अशोक रहे हैं,और आधुनिक काल में भी भारतवर्ष की जनता का निश्छल प्रेम अन्य कर्णधारों और समाज सुधारकों की अपेक्षा महात्मा गांधी को अधिक प्राप्त हुआ। अगले संसार के नेता वे होंगे जो धीर और सहनशील हैं. जो समझौते और सहअस्तित्व को कायरता नहीं, धर्म मानकर वरण करते हैं।
गांधी इसलिए महान नहीं हैं कि वे दोषरहित थे, वे इसलिए महान हैं क्योंकि वे सत्य और करुणा के प्रति अडिग थे। ब्रेख़्त का स्वप्न और गांधी का भारत वही है—जहाँ नागरिक को नायक की ज़रूरत न हो, बल्कि हर नागरिक में गांधी जैसा नैतिक साहस हो। वे किसी एक देश के नहीं, पूरी मानवता की धरोहर हैं।
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