— परिचय दास —
स्वामी विवेकानंद को किसी एक विचारधारा के खांचे में रख देना उनके साथ अन्याय करना है। वे न तो किसी पाश्चात्य सिद्धांत के प्रवक्ता थे, न किसी राजनीतिक वाद के अनुयायी । फिर भी, जब उनके शब्दों को ध्यान से सुना जाए, उनके वाक्यों की आंतरिक धड़कन को महसूस किया जाए तो यह साफ़ दिखाई देता है कि उनका चिंतन समाज के उस तल से उठता है जहाँ भूख, अपमान और असमानता मनुष्य की पहली पहचान बन चुकी थी। यही वह बिंदु है जहाँ विवेकानंद का चिंतन उस चेतना से स्पर्श करता है जो बाद के समय में सामाजिकता का आधार बनता है।
स्वामी विवेकानंद के यहाँ समाज कोई अमूर्त संरचना नहीं है। वह कोई आँकड़ा नहीं, कोई वर्ग-सारणी नहीं बल्कि जीवित मनुष्यों का समूह है—ऐसे मनुष्य जिनके शरीर पर श्रम की रेखाएँ हैं, जिनकी आँखों में अभाव की धूल जमी है और जिनकी आत्मा को सदियों से धर्म, व्यवस्था और सत्ता ने अनदेखा किया है।
जब स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जब तक करोड़ों लोग भूखे हैं, तब तक धर्म की बात बेमानी है तो यह केवल नैतिक वाक्य नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है। यह वाक्य उस पूरे ढाँचे को प्रश्नांकित करता है जिसमें आध्यात्मिकता ऊपर और भूख नीचे रख दी गई थी।
रामकृष्ण मठ, नागपुर से प्रकाशित विवेकानंद रचनावली में संकलित कुछ लेखों, भाषणों और पत्रों को एक साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि स्वामी विवेकानंद का मूल आग्रह दृष्टि-परिवर्तन का है। वे समाज को ऊपर से नहीं, नीचे से देखने की माँग करते हैं।
उनका भारत मंदिरों से नहीं, झोपड़ियों से आरंभ होता है। वे कहते हैं कि पहले गरीब को रोटी दो, शिक्षा दो, शक्ति दो—दर्शन बाद में अपने आप आ जाएगा। इस ‘पहले’ में ही उनकी पूरी वैचारिक संरचना छिपी हुई है।
स्वामी विवेकानंद के लिए दरिद्र कोई दया का पात्र नहीं बल्कि देवत्व का रूप है। ‘दरिद्रनारायण’ कोई भावुक उपमा नहीं बल्कि एक तीखा वैचारिक हस्तक्षेप है। यह शब्द उस धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होता है जिसमें ईश्वर मंदिरों में कैद था और गरीब बाहर भूखा।
दरिद्रनारायण की अवधारणा के माध्यम से स्वामी विवेकानंद ईश्वर को सत्ता और संपत्ति के केंद्र से हटाकर श्रम और अभाव के बीच स्थापित कर देते हैं। यह स्थानांतरण अपने आप में एक गहरी समाजोन्मुख क्रांति है।
उनके कई पत्रों में, विशेषकर युवकों को लिखे गए पत्रों में, एक असाधारण स्पष्टता दिखाई देती है। वे कहते हैं कि भारत का उद्धार पुस्तकों से नहीं, कर्म से होगा; ध्यान से नहीं, संगठन से होगा; प्रवचनों से नहीं, सेवा से होगा। यह सेवा किसी व्यक्तिगत पुण्य के लिए नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन के लिए है। स्वामी विवेकानंद यहाँ सेवा को आध्यात्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व में रूपांतरित कर देते हैं।
उनकी दृष्टि में शिक्षा एक सामाजिक हथियार है। वे उस शिक्षा के विरोधी हैं जो केवल अभिजात वर्ग को सुसंस्कृत बनाती है और बहुसंख्यक को अंधेरे में छोड़ देती है। वे ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो आत्मविश्वास जगाए, श्रम को सम्मान दे और मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा करे। यह शिक्षा किसी सत्ता-संरचना की अनुगामी नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता की जननी है। इसीलिए विवेकानंद बार-बार कहते हैं कि चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है—पर यह चरित्र उपदेशों से नहीं, अवसरों से बनता है।
स्वामी विवेकानंद संपत्ति के प्रश्न को भी नैतिकता के धरातल पर ले आते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अत्यधिक धन-संचय अधर्म है। समाज का धन समाज के लिए होना चाहिए, किसी एक व्यक्ति या वर्ग की विलासिता के लिए नहीं। हालाँकि वे संपत्ति के हिंसक उच्छेदन की बात नहीं करते लेकिन संपत्ति के नैतिक पुनर्वितरण की माँग उनके विचारों में स्पष्ट है। यह पुनर्वितरण करुणा से नहीं, न्याय से जुड़ा हुआ है।
उनका समाज किसी वर्ग-संघर्ष की घोषणा नहीं करता।लेकिन वर्ग-अन्याय को पूरी स्पष्टता से पहचानता है। वे श्रमिक को केवल उत्पादन की इकाई नहीं मानते बल्कि संस्कृति का वाहक मानते हैं। किसान, मजदूर, दस्तकार—ये उनके लिए भारत की आत्मा हैं। वे जिस भारत की कल्पना करते हैं, उसमें नेतृत्व वही करेगा जिसने मिट्टी को छुआ है, पसीना बहाया है और जीवन को उसकी कठोरता में देखा है।
स्वामी विवेकानंद की भाषा में एक अनोखी तीव्रता है। वह करुणा से उपजी हुई तीव्रता है, क्रोध से नहीं। वे किसी वर्ग के विरुद्ध नफ़रत नहीं करते लेकिन अन्याय के प्रति मौन भी नहीं हैं। उनका गुस्सा व्यवस्था पर है, मनुष्य पर नहीं। यही कारण है कि उनका चिंतन विध्वंसक नहीं, रूपांतरकारी है।
स्वामी विवेकानंद किसी पाश्चात्य वैचारिक लेबल से असहज थे। उनके लिए विचार कोई आयातित वस्तु नहीं बल्कि अनुभव से उपजा सत्य था। वे कहते हैं कि भारत को अपने समाधान स्वयं खोजने होंगे। इसी कारण उनका समाजोन्मुख चिंतन उपनिषदों, बुद्ध, कबीर और रामकृष्ण की परंपरा से निकलता है, न कि किसी यूरोपीय ग्रंथ से।
जब हम उनके विचारों को समकालीन शब्दावली में समझने का प्रयास करते हैं, तो यह कहना अनुचित नहीं कि स्वामी विवेकानंद एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ अवसर समान हों, श्रम सम्मानित हो, और मनुष्य मनुष्य का शोषण न करे। यह समाज का नैतिक आधार है—भले ही उसका नाम कुछ और हो।
स्वामी विवेकानंद के यहाँ व्यक्ति और समाज के बीच कोई विरोध नहीं है। वे व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं लेकिन उस स्वतंत्रता को सामाजिक उत्तरदायित्व से काटकर नहीं देखते। उनके लिए सच्चा व्यक्ति वही है जो समाज के दुख को अपना दुख माने और सच्चा समाज वही है जो प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण विकास का अवसर दे।
उनका चिंतन आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह किसी सत्ता-योजना से नहीं, मनुष्य की पीड़ा से शुरू होता है। वे किसी क्रांति की घोषणा नहीं करते, बल्कि चेतना की तैयारी करते हैं। उनकी समाजोन्मुखता कोई घोषणा-पत्र नहीं बल्कि एक नैतिक आग्रह है—कि जब तक अंतिम व्यक्ति उठ नहीं जाता, तब तक किसी का उठना अधूरा है।
इस तरह स्वामी विवेकानंद का समाजोन्मुख चिंतन न तो नारेबाज़ी है, न दार्शनिक अमूर्तता। वह जीवन की ठोस ज़मीन पर खड़ा हुआ, करुणा से संचालित और न्याय की ओर उन्मुख एक ऐसी दृष्टि है जो बिना नाम लिए भी समाज की आत्मा को छूती है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है—कि वह विचार नहीं, विवेक बनकर सामने आती है।
स्वामी विवेकानंद समाधान को किसी दूरस्थ आदर्शलोक में नहीं रखते। उनका चिंतन किसी भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करता, वह वर्तमान की पीड़ा से सीधे संवाद करता है। उनके लिए समाज का प्रश्न पहले नैतिक है, बाद में बौद्धिक। इसीलिए उनके शब्दों में तर्क से अधिक ताप है और सिद्धांत से अधिक स्पर्श। वे व्यवस्था की आलोचना करते हुए भी मनुष्य को केंद्र से हटाते नहीं। उनका विश्वास है कि यदि मनुष्य की दृष्टि बदलेगी तो व्यवस्था अपने आप बदलने लगेगी।
उनके लेखन में बार-बार एक वाक्यात्मक आग्रह उभरता है—शक्ति दो। यह शक्ति केवल राजनीतिक नहीं है, यह आत्मिक, बौद्धिक और सामाजिक है। वे जिस शक्ति की बात करते हैं, वह भयमुक्ति से शुरू होती है। भूखा मनुष्य केवल भोजन से नहीं, भय से भी पीड़ित होता है—भविष्य का भय, अपमान का भय, विस्थापन का भय। स्वामी विवेकानंद इस भय को सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। उनके अनुसार जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति भयमुक्त नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता केवल एक वर्ग की सुविधा बनी रहेगी।
इसी संदर्भ में उनका राष्ट्रबोध भी समझना आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र कोई भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि नैतिक संरचना है। राष्ट्र तब बनता है जब समाज अपने सबसे कमजोर सदस्य के साथ खड़ा होता है। वे उस राष्ट्रवाद के विरोधी हैं जो भूख को छिपाकर गौरव का शोर मचाता है। उनके लिए राष्ट्र की परीक्षा युद्धभूमि में नहीं, रसोई में होती है—कि क्या हर थाली में अन्न है।
स्वामी विवेकानंद के लेखन में स्त्री का प्रश्न सामाजिक न्याय से अलग नहीं है। वे स्त्री को करुणा का विषय नहीं, शक्ति का स्रोत मानते हैं। जिस समाज में आधी आबादी को निर्बल बना दिया गया हो, वहाँ समानता की कोई भी कल्पना अधूरी है। उनकी दृष्टि में स्त्री की मुक्ति केवल शिक्षा से नहीं, सम्मान और स्वायत्तता से जुड़ी है। यह भी समाजोन्मुख चिंतन का ही विस्तार है—कि शक्ति का संकेन्द्रण चाहे किसी भी रूप में हो, वह अन्याय पैदा करता है।
उनकी आलोचना का स्वर कभी-कभी कठोर लगता है पर वह कठोरता प्रेम से उपजी है। वे भारत से नाराज़ नहीं हैं, वे भारत के प्रति उत्तरदायी हैं। वे उस संस्कृति पर गर्व करते हैं जिसने करुणा को धर्म बनाया लेकिन उसी संस्कृति से सवाल भी करते हैं जब वह करुणा को कर्म में बदलने से डरती है। यही द्वंद्व उनके लेखन को जीवित बनाता है—आस्था और असंतोष का साथ-साथ चलना।
स्वामी विवेकानंद किसी वर्ग को गिराने की बात नहीं करते लेकिन वे किसी वर्ग को ईश्वरीय विशेषाधिकार भी नहीं देते। उनके लिए ब्राह्मणत्व जन्म से नहीं, चरित्र से तय होता है। श्रम का अपमान उन्हें सबसे बड़ा पाप लगता है। वे चाहते हैं कि समाज का नेतृत्व वही करे जिसने समाज का बोझ उठाया हो। यह विचार अपने आप में उस सामाजिक संरचना को हिलाता है जिसमें सत्ता और श्रम अलग-अलग दिशाओं में खड़े रहते हैं।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्वामी विवेकानंद का समाजोन्मुख चिंतन निराशा से नहीं, आशा से संचालित है। वे मनुष्य पर भरोसा करते हैं। उन्हें विश्वास है कि जैसे ही मनुष्य अपने भीतर के देवत्व को पहचानेगा, वह दूसरे मनुष्य के देवत्व को भी स्वीकार करेगा। यही विश्वास उन्हें करुणा की ओर ले जाता है, और करुणा को संगठन में बदलने की प्रेरणा देता है।
उनका चिंतन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह किसी तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए नहीं लिखा गया। उसमें कोई घोषणात्मक जल्दबाज़ी नहीं है। वह धीरे-धीरे मन को बदलने की कोशिश करता है। यही कारण है कि वह आज भी पढ़ा जाता है, और हर नए समय में नए अर्थ खोलता है। विवेकानंद का आग्रह मूलतः यह है कि मनुष्य को मनुष्य की तरह देखा जाए।
जब हम स्वामी विवेकानंद को इस दृष्टि से पढ़ते हैं तो स्पष्ट होता है कि वे विचारधाराओं के नहीं, जीवन के पक्षधर हैं। वे उस जीवन के पक्ष में खड़े हैं जो भूखा है, अशिक्षित है लेकिन फिर भी संभावनाओं से भरा है। उनका लेखन उसी संभावना की रक्षा करता है। वह हमें यह याद दिलाता है कि कोई भी समाज तब तक सभ्य नहीं कहलाता, जब तक उसकी नींव में करुणा, न्याय और समान अवसर न हों।
स्वामी विवेकानंद का समाजोन्मुख चिंतन किसी एक आलेख में बंद नहीं होता। वह उनके पूरे व्यक्तित्व, उनकी यात्राओं, उनके भाषणों और उनके मौन तक में फैला हुआ है। उसे पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि यह चिंतन हमें किसी निष्कर्ष तक नहीं बल्कि एक उत्तरदायित्व तक ले जाता है—कि समाज को बदलने का अर्थ पहले दृष्टि को बदलना है और शायद यही वह बिंदु है जहाँ स्वामी विवेकानंद बिना किसी नाम के भी सबसे अधिक समकालीन हो जाते हैं।
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