— परिचय दास —
।। एक ।।
“कर्पूरी ठाकुर” नाम सुनते ही उनकी स्मृति किसी व्यक्ति से अधिक एक गंध की तरह फैलती है। कर्पूर की गंध—तेज़, क्षणिक पर स्मृति में टिक जाने वाली। यह शब्द एक ऐसा अर्थ रचता है जो भारतीय राजनीति और सामाजिक इतिहास में विरल है—एक ऐसा मनुष्य जो नाम से ही अपने समय का आभास बन जाता है। कर्पूर जैसा स्वच्छ, स्वयं जलकर उजाला देने वाला।
कर्पूरी ठाकुर को समझना किसी जीवनी को पढ़ना नहीं है बल्कि उस अर्थ को पढ़ना है जो जनता ने राजनीति में धीरे-धीरे खो दिया। वे राजनीति में विचार नहीं लाए बल्कि जीवन लाए। उनका व्यक्तित्व किसी घोषणापत्र की तरह नहीं था बल्कि किसी लोकगीत की तरह था—जिसे पढ़ा नहीं जाता, जिया जाता है। उनके नाम का ‘कर्पूरी’ अंश उनकी राजनीति की प्रकृति बताता है—न टिकाऊ वैभव, न स्थायी चमक बल्कि वह प्रकाश जो अंधेरे में रास्ता दिखाकर स्वयं विलीन हो जाता है।
कर्पूर भारतीय संस्कृति में पूजा में जलाया जाता है। वह देवता के सामने जलता है, धुआँ भी नहीं देता, राख भी नहीं छोड़ता। कर्पूरी ठाकुर भी सत्ता के सामने जले पर सत्ता की राख उनके पीछे नहीं लगी। आज की राजनीति में जहाँ उत्तराधिकार सबसे बड़ा मूल्य बन गया है, वहाँ कर्पूरी ठाकुर एक असुविधाजनक स्मृति हैं। वे याद दिलाते हैं कि राजनीति सेवा हो सकती है, व्यापार नहीं।
उनका जीवन गरीबी का सौंदर्यशास्त्र रचता है। गरीबी यहाँ अभाव नहीं बल्कि चयन है। सत्ता में रहकर भी साधारण रहना, सुविधा होते हुए भी उसे ठुकराना—यह किसी नैतिक उपदेश का परिणाम नहीं बल्कि एक गहरे आत्मबोध का संकेत है। कर्पूरी ठाकुर का पहनावा, उनकी भाषा, उनका उच्चारण—सबमें एक असंपन्नता थी पर वह ही उनकी संपन्नता थी। वे भाषण नहीं देते थे, वे बोलते थे—और यही अंतर उन्हें विशिष्ट बनाता है।
कर्पूरी ठाकुर का अर्थ केवल सामाजिक न्याय नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय की वह शैली है जिसमें करुणा है, प्रतिशोध नहीं। उन्होंने पिछड़ों की बात की पर किसी के विरुद्ध नहीं बल्कि किसी के लिए। आज जब सामाजिक न्याय अक्सर एक आक्रामक नारे में बदल जाता है, कर्पूरी ठाकुर का स्मरण एक शीतल स्पर्श की तरह है। वे आरक्षण के पक्षधर थे पर उन्होंने उसे राजनीति का हथियार नहीं बनाया। उनके लिए आरक्षण कोई पुरस्कार नहीं बल्कि ऐतिहासिक असंतुलन को ठीक करने का साधन था।
उनकी राजनीति में भाषा बहुत महत्त्वपूर्ण है। वे सत्ता की भाषा नहीं बोलते थे, वे जनता की बोली में राजनीति को ढालते थे। उनकी हिंदी में आडंबर नहीं था, उसमें गाँव की मिट्टी थी। वह मिट्टी जो पैरों से लगती है, माथे से नहीं। कर्पूरी ठाकुर की भाषा में कोई शिल्प नहीं खोजा जा सकता पर वही उनकी सबसे बड़ी शिल्पगत उपलब्धि है। उन्होंने भाषा को सजाया नहीं, उसे रहने दिया।
कर्पूरी ठाकुर का अर्थ उस मौन में भी छिपा है जो उन्होंने कई अवसरों पर चुना। वे विवादप्रिय नहीं थे। वे जानते थे कि हर उत्तर शब्दों में नहीं होता। आज की राजनीति जहाँ हर क्षण प्रतिक्रिया माँगती है, वहाँ कर्पूरी ठाकुर की चुप्पी एक वैकल्पिक नैतिकता प्रस्तुत करती है। उनकी चुप्पी कमजोरी नहीं, आत्मविश्वास थी।
वे सत्ता में आए, गए, फिर आए—पर सत्ता उनके भीतर नहीं आई। यह वाक्य सुनने में सरल है पर व्यवहार में लगभग असंभव। सत्ता मनुष्य को बदल देती है; कर्पूरी ठाकुर इस नियम के अपवाद हैं। उनकी सत्ता एक गुजरती हुई ऋतु की तरह थी—आती थी, अपना काम करती थी, चली जाती थी। उनके चेहरे पर सत्ता की स्थायी रेखाएँ नहीं पड़ीं।
कर्पूरी ठाकुर की राजनीति में कोई चमकदार क्षण नहीं है जिसे कैमरे में कैद किया जा सके। उनकी उपलब्धियाँ छोटे-छोटे निर्णयों में बिखरी हैं। यही कारण है कि वे दृश्य राजनीति के युग में धुँधले पड़ते जा रहे हैं पर विचारों की राजनीति में वे और स्पष्ट होते जा रहे हैं। उनका अर्थ समय के साथ घट नहीं रहा बल्कि गहरा हो रहा है।
उनका जीवन एक प्रश्न है—क्या राजनीति में ईमानदारी संभव है? कर्पूरी ठाकुर उत्तर नहीं देते, वे उदाहरण हैं। उनका उदाहरण किसी आदर्शलोक का नहीं बल्कि इसी धरती का है। वे किसी असाधारण प्रतिभा के धनी नहीं थे; उनकी असाधारणता उनकी साधारणता में थी। वे बताते हैं कि राजनीति में महान होने के लिए चतुर होना आवश्यक नहीं, सच्चा होना पर्याप्त है।
कर्पूरी ठाकुर की आलोचना भी आवश्यक है। वे कोई पूर्ण पुरुष नहीं थे। उनकी सीमाएँ थीं—प्रशासनिक कठोरता का अभाव, निर्णयों में कभी-कभी संकोच पर उनकी सीमाएँ भी मानवीय थीं और यही उन्हें विश्वसनीय बनाती हैं। वे देवता नहीं थे, इसलिए अनुकरणीय हैं।
आज जब राजनीति स्मृति से तेज़ चलती है, कर्पूरी ठाकुर स्मृति की राजनीति का नाम हैं। वे हमें रुककर सोचने को बाध्य करते हैं। उनका अर्थ किसी मूर्ति में नहीं बल्कि उस खाली स्थान में है जो आज की राजनीति में उनकी अनुपस्थिति से बना है। वह खालीपन शोर नहीं करता पर लगातार खटकता है।
कर्पूरी ठाकुर एक नाम नहीं, एक नैतिक विराम हैं। वे बताते हैं कि राजनीति केवल जीतने की कला नहीं बल्कि हार को भी गरिमा से स्वीकार करने का अभ्यास है। उन्होंने हार को कभी अपमान नहीं माना और जीत को कभी अधिकार नहीं।
उनके नाम का अर्थ अंततः एक काव्यात्मक सत्य में बदल जाता है—कर्पूर जलता है, उजाला देता है और कुछ माँगता नहीं। कर्पूरी ठाकुर भी वैसे ही जले। आज जब राजनीति धुआँ देती है, राख छोड़ती है और उजाले का दावा करती है—कर्पूरी ठाकुर का स्मरण एक अलग तरह की रोशनी देता है। वह आँखें नहीं चौंधियाता बल्कि रास्ता दिखाता है।
।। दो ।।
कहते हैं—और यह “कहते हैं” यहाँ अफ़वाह नहीं, लोकस्मृति का भरोसेमंद स्वर है—कि जब विजयदेव नारायण साही जेपी जयंती पर व्याख्यान देने पटना आए, तब सभागार में एक ऐसा श्रोता भी बैठा था, जिसकी कुर्सी से अधिक उसकी जिज्ञासा ऊँची थी। वह श्रोता कोई साधारण विद्यार्थी नहीं था, न कोई युवा कार्यकर्ता। वह बिहार का पूर्व मुख्यमंत्री था—कर्पूरी ठाकुर।
व्याख्यान शुरू हुआ। शब्द बहने लगे। साही बोल रहे थे—समाज, लोकतंत्र, नैतिकता और समय की बेचैनी पर। सभागार में बहुत लोग थे जो सुन रहे थे पर बहुत कम थे जो ग्रहण कर रहे थे और उन्हीं कम लोगों में कर्पूरी ठाकुर थे। वे सामने रखे काग़ज़ पर झुके हुए थे। उनकी उँगलियाँ धीमी थीं पर स्थिर। वे लिख रहे थे—कोई भाषण नहीं, कोई टिप्पणी नहीं—सिर्फ़ पॉइंट्स। जैसे कोई विद्यार्थी गुरु की बात पकड़कर रख लेना चाहता हो, कहीं छूट न जाए।
यह दृश्य अपने आप में एक व्याख्या है। एक ऐसा आदमी, जो सत्ता की ऊँचाई देख चुका है, जो निर्णयों के केंद्र में रह चुका है, वह अब ज्ञान की पंक्ति में बैठा है। न कोई औपचारिकता, न कोई विशेष आसन। उनके भीतर यह अहंकार नहीं था कि “मैं जानता हूँ।” उनके भीतर यह बेचैनी थी कि “मुझे और समझना है।”
कर्पूरी ठाकुर के लिए राजनीति कभी पूर्ण ज्ञान की स्थिति नहीं रही। वे जानते थे कि सत्ता अनुभव देती है, पर बोध नहीं। बोध के लिए सुनना पड़ता है। इसलिए वे साही को ऐसे सुन रहे थे, जैसे कोई किसान मौसम की बात सुनता है—इस भरोसे के साथ कि इससे अगली फसल तय होगी। वे शब्दों को नहीं, संकेतों को पकड़ रहे थे।
विजयदेव नारायण साही का व्याख्यान वैसे भी सहज नहीं होता था। वह श्रोताओं से श्रम माँगता था। साही विचार देते नहीं थे, वे सोचने की ज़िम्मेदारी सौंपते थे। कर्पूरी ठाकुर इस श्रम से भागने वाले नहीं थे। उन्होंने सत्ता में रहते हुए भी कभी यह नहीं माना कि सोचने का काम केवल बुद्धिजीवियों का है। उनके लिए राजनीति और विचार दो अलग दिशाएँ नहीं थीं।
कहते हैं, व्याख्यान के दौरान कई बार वे सिर उठाकर देखते थे—जैसे यह परख रहे हों कि जो कहा जा रहा है, वह जनता तक कैसे पहुँचेगा। फिर वे झुक जाते थे और लिखते थे। यह लिखना किसी उद्धरण को सुरक्षित करने के लिए नहीं था, बल्कि भविष्य की राजनीति को तैयार करने का अभ्यास था।
इस वृत्तांत में जो सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह यह नहीं कि कर्पूरी ठाकुर नोट्स ले रहे थे। महत्त्वपूर्ण यह है कि वे सीख रहे थे। राजनीति में सीखने की ललक सबसे पहले मरती है। पद आते ही आदमी मान लेता है कि अब उसे सिखाने की ज़रूरत नहीं। कर्पूरी ठाकुर इस भ्रम से मुक्त थे। वे जानते थे कि लोकतंत्र स्थिर ज्ञान नहीं, चलती हुई समझ है।
जेपी जयंती का वह दिन इसीलिए स्मरणीय है कि वहाँ कोई भाषण नहीं हुआ—वहाँ एक मौन संवाद हुआ। साही जी बोल रहे थे और कर्पूरी ठाकुर जी अपने भीतर जवाब खोज रहे थे। यह दृश्य उस राजनीति का प्रतीक है, जिसमें सत्ता विचार से डरती नहीं बल्कि उससे ऊर्जा लेती है।
आज जब राजनीति में सुनना कमजोरी समझा जाता है, यह वृत्तांत एक ठोस प्रतिवाद की तरह खड़ा है। एक मुख्यमंत्री रह चुका व्यक्ति, काग़ज़ पर झुका हुआ, किसी विचारक की बात नोट करता हुआ—यह लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीरों में से एक है।
कर्पूरी ठाकुर उस दिन वहाँ नेता नहीं थे। वे विद्यार्थी थे और शायद इसी कारण वे नेता हो सके।
।। तीन ।।
कर्पूरी ठाकुर का राजनीति में योगदान किसी एक योजना, एक नारे या एक कार्यकाल में सीमित नहीं है। उनका योगदान दरअसल भारतीय लोकतंत्र की उस धारा में है, जो सत्ता को ऊपर से नहीं, नीचे से देखने की जिद रखती है। वे उन राजनेताओं में थे जिनके लिए राजनीति कोई प्रदर्शन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का विस्तार थी। कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति को गरीब, पिछड़े और हाशिए पर खड़े मनुष्य के जीवन से जोड़कर देखा—और यही उनका सबसे बड़ा योगदान है।
उनका प्रवेश राजनीति में किसी वंश, वैभव या आकस्मिक अवसर के कारण नहीं हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन की कोख से निकले नेता थे। गांधीवादी अनुशासन, समाजवादी स्वप्न और लोकजीवन की सादगी—इन तीनों ने मिलकर कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक चेतना को आकार दिया। वे आंदोलन से सत्ता तक आए, सत्ता से आंदोलन तक नहीं। इसलिए उनकी राजनीति में नैतिकता कोई ऊपर से थोपी गई चीज़ नहीं थी बल्कि स्वाभाविक व्यवहार थी।
कर्पूरी ठाकुर का सबसे ऐतिहासिक योगदान सामाजिक न्याय की राजनीति को वैचारिक जमीन देना है। उन्होंने पिछड़े वर्गों को केवल मतदाता नहीं बल्कि राजनीतिक नागरिक के रूप में स्थापित किया। उनसे पहले भी पिछड़ों की चर्चा थी लेकिन वह या तो दया के भाव से होती थी या अस्थायी समझौतों के रूप में। कर्पूरी ठाकुर ने पहली बार इसे संरचनात्मक प्रश्न बनाया—कि सत्ता, प्रशासन और संसाधनों में हिस्सेदारी का सवाल लोकतंत्र का केंद्रीय प्रश्न है।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को लागू करने का साहस किया। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं था; यह सामाजिक साहस का उदाहरण था। उस समय यह कदम राजनीतिक आत्महत्या जैसा माना गया। विरोध हुआ, आलोचना हुई, उन्हें सत्ता से हटाया गया—पर उन्होंने पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना। उनका योगदान यहाँ यह है कि उन्होंने सिद्ध किया कि सामाजिक न्याय कोई चुनावी सुविधा नहीं बल्कि नैतिक दायित्व है।
कर्पूरी ठाकुर की राजनीति की विशेषता यह थी कि उन्होंने आरक्षण को उग्र संघर्ष का औजार नहीं बनने दिया। उनके यहाँ सामाजिक न्याय में कटुता नहीं, संतुलन था। वे जानते थे कि बराबरी का संघर्ष समाज को तोड़कर नहीं, जोड़कर आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने अगड़ों को शत्रु नहीं बनाया बल्कि व्यवस्था की असमानताओं को प्रश्नांकित किया। यह दृष्टि आज भी दुर्लभ है।
राजनीतिक भाषा में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति की भाषा को अभिजात वर्ग से निकालकर आम जनता की बोली में उतारा। उनकी हिंदी में न तो अलंकार थे, न वाक्य-विन्यास का प्रदर्शन। वह सीधी, सादी और लोकजीवन से उपजी हुई थी। इससे राजनीति पहली बार उन लोगों तक पहुँची जो भाषा के कारण राजनीति से बाहर कर दिए गए थे। भाषा के इस लोकतंत्रीकरण को भी उनके योगदान के रूप में देखा जाना चाहिए।
कर्पूरी ठाकुर ने सत्ता के चरित्र को बदलने की कोशिश की। वे मुख्यमंत्री थे, फिर भी उनमें शासक का अहंकार नहीं था। उन्होंने सत्ता को सेवा की तरह जिया। उनके जीवन में सुरक्षा घेरा, शाही ठाठ, विशेषाधिकार—इन सबका अभाव था। यह केवल व्यक्तिगत सादगी नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था। उन्होंने यह दिखाया कि सत्ता में रहकर भी आम आदमी बना रहना संभव है।
प्रशासनिक दृष्टि से उन्हें अक्सर कम आँका गया, पर उनका प्रशासन लोकहित से संचालित था। वे निर्णय लेते समय यह देखते थे कि उसका प्रभाव सबसे कमजोर व्यक्ति पर क्या पड़ेगा। यह दृष्टिकोण आधुनिक विकास मॉडल के विपरीत था, जहाँ आँकड़े प्राथमिक होते हैं और मनुष्य गौण। कर्पूरी ठाकुर ने मनुष्य को केंद्र में रखा, आँकड़ों को नहीं।
उनका एक बड़ा योगदान यह भी है कि उन्होंने राजनीति में नैतिक हार की अवधारणा को स्वीकार किया। वे सत्ता से चिपके नहीं रहे। हार को उन्होंने अपमान नहीं माना। यह आज की राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो चुका मूल्य है। कर्पूरी ठाकुर ने यह दिखाया कि सत्ता छोड़ना भी लोकतांत्रिक आचरण का हिस्सा है।
कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति को पेशा नहीं बनने दिया। न उन्होंने अपने परिवार को राजनीति में स्थापित किया, न अपने नाम को ब्रांड में बदला। यह योगदान अदृश्य है, पर अत्यंत गहरा है। आज जब राजनीति उत्तराधिकार और वर्चस्व का खेल बनती जा रही है, कर्पूरी ठाकुर एक मौन प्रतिरोध की तरह खड़े दिखाई देते हैं।
उनका योगदान इस बात में भी है कि उन्होंने समाजवाद को नारे से निकालकर व्यवहार में उतारा। उनका समाजवाद किताबों से नहीं, जीवन से आया था। वे जानते थे कि समाजवाद का अर्थ केवल आर्थिक बराबरी नहीं, बल्कि सम्मान की बराबरी है। इसलिए उनकी राजनीति में गरीब को सहायता से पहले सम्मान मिला।
कर्पूरी ठाकुर ने राजनीति में धैर्य का महत्व स्थापित किया। वे तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक मूल्यों से समझौता नहीं करते थे। यह योगदान उस राजनीति के लिए अत्यंत आवश्यक है जो हर पाँच साल में खुद को बदल लेती है पर समाज को नहीं बदल पाती।
आज कर्पूरी ठाकुर को याद करना केवल अतीत का स्मरण नहीं है। यह वर्तमान की आलोचना भी है। उनका योगदान हमें यह प्रश्न देता है—क्या राजनीति बिना दिखावे के, बिना वैभव के, बिना छल के संभव है? कर्पूरी ठाकुर इसका उत्तर किसी भाषण में नहीं, अपने पूरे जीवन में देते हैं।
उनका एक बड़ा योगदान यह भी है कि उन्होंने राजनीति को गरीब आदमी की आँखों से देखने की परंपरा शुरू की। वे राजनीति में एक व्यक्ति नहीं, एक नैतिक मानक हैं। जब भी राजनीति उस मानक से नीचे गिरती है, कर्पूरी ठाकुर की चुप छवि और अधिक मुखर हो जाती है।
।। चार ।।
कर्पूरी ठाकुर पर लिखे गए इस पूरे आलेख का उपसंहार किसी निष्कर्ष की तरह नहीं बल्कि एक ठहराव की तरह होना चाहिए—एक ऐसा ठहराव, जहाँ पाठक यह महसूस करे कि कर्पूरी ठाकुर समाप्त नहीं होते बल्कि यहीं से और स्पष्ट होने लगते हैं क्योंकि कर्पूरी ठाकुर किसी विचार की परिणति नहीं बल्कि एक सतत प्रश्न हैं जो राजनीति, समाज और नैतिकता—तीनों से एक साथ पूछा जाता है।
कर्पूरी ठाकुर को पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि वे राजनीति में एक अपवाद नहीं बल्कि एक संभावना थे। एक ऐसी संभावना, जिसे भारतीय लोकतंत्र ने छुआ तो सही, पर थाम नहीं पाया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सत्ता में रहकर भी मनुष्य अपने वर्ग, अपनी जमीन और अपनी सादगी से अलग नहीं होता—यदि वह सचमुच अलग होना न चाहे। वे इस अर्थ में गरीब आदमी थे कि उन्होंने कभी अपने लिए ‘विशेष’ होने की आकांक्षा नहीं पाली।
कर्पूरी ठाकुर का जो रूप उभरता है, वह किसी स्मारक के योग्य नहीं बल्कि किसी जीवित विवेक की तरह है। स्मारक स्थिर होते हैं; कर्पूरी ठाकुर गतिशील थे—विचार में भी, आचरण में भी। वे सामाजिक न्याय के ऐसे पक्षधर थे, जिनके यहाँ न्याय बदले की भाषा नहीं बोलता। उन्होंने बराबरी की बात की, पर बराबरी को शोर नहीं बनने दिया। यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति भी है और आज के समय में सबसे बड़ी असुविधा भी।
कर्पूरी ठाकुर का महत्त्व इस बात में नहीं है कि वे कितनी बार मुख्यमंत्री बने बल्कि इस बात में है कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे कितनी बार स्वयं को आम आदमी बनाए रख सके। यह अपने आप में एक कठिन साधना है। सत्ता सामान्यतः आदमी को ऊपर खींचती है; कर्पूरी ठाकुर ने सत्ता को नीचे उतरने पर विवश किया। उन्होंने राजनीति को जनता के पास आने का अभ्यास सिखाया, न कि जनता को राजनीति के पास बुलाने का।
कर्पूरी ठाकुर की राजनीति किसी एक समुदाय, एक वर्ग या एक समय की राजनीति नहीं थी। वह एक दृष्टि थी—नीचे से देखने की दृष्टि। गरीब आदमी, पिछड़ा वर्ग, वंचित समाज—ये उनके लिए मात्र श्रेणियाँ नहीं थीं बल्कि जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव थे। इसलिए उनकी राजनीति में कल्पना कम, अनुभूति अधिक है। वे जो कहते थे, वही जीते थे; और जो जीते थे, वही कहते थे।
आज की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर इसलिए असहज लगते हैं क्योंकि वे किसी उपयोगी प्रतीक में नहीं बदलते। उन्हें न तो आसानी से नारे में बदला जा सकता है, न किसी दल विशेष की स्थायी संपत्ति बनाया जा सकता है। वे हर सत्ता से यह सवाल पूछते हैं—क्या तुमने गरीब आदमी को केवल गिना है, या सचमुच देखा भी है? यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था।
कर्पूरी ठाकुर की सबसे बड़ी विरासत कोई योजना, कानून या प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक नैतिक मुद्रा है। वह मुद्रा जिसमें सत्ता झुकती है, अकड़ती नहीं। जिसमें नेता सीखता है, सिखाने का दंभ नहीं पालता। जिसमें राजनीति एक पेशा नहीं, एक दायित्व बनती है।
कर्पूरी ठाकुर के जीवन से यह समझ में आता है कि राजनीति में महान होने के लिए असाधारण होना आवश्यक नहीं। साधारण बने रहना कहीं अधिक कठिन है। उन्होंने इस कठिन साधारणता को चुना। न उन्होंने अपने नाम को ब्रांड बनाया, न अपने परिवार को सत्ता का उत्तराधिकारी। यह त्याग किसी सन्यास का परिणाम नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति गहरे सम्मान का संकेत है।
आज जब राजनीति लगातार दृश्य, प्रदर्शन और तात्कालिक प्रभाव की ओर भाग रही है, कर्पूरी ठाकुर का स्मरण एक धीमी गति का आग्रह करता है। वे कहते हैं—रुको, सुनो, समझो। शायद इसी कारण उन्हें आज बार-बार याद किया जा रहा है क्योंकि जब कोई समाज अपने रास्ते को लेकर उलझन में होता है तो वह ऐसे ही व्यक्तित्वों की ओर लौटता है, जो दिशासूचक होते हैं, मंज़िल नहीं।
कर्पूरी ठाकुर को किसी निष्कर्ष में बाँधना उनके साथ अन्याय होगा। वे किसी अंतिम वाक्य में समा जाने वाले नेता नहीं हैं। वे उस रिक्त स्थान में रहते हैं जो आज की राजनीति में लगातार बढ़ता जा रहा है—ईमानदारी का रिक्त स्थान, सादगी का रिक्त स्थान, गरीब आदमी के पक्ष में खड़े होने का रिक्त स्थान।
कर्पूरी ठाकुर को याद करना दरअसल स्वयं से यह पूछना है कि राजनीति को हम किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। सुविधा की ओर या संवेदना की ओर। वर्चस्व की ओर या बराबरी की ओर। शोर की ओर या विवेक की ओर। कर्पूरी ठाकुर बीते हुए नेता नहीं हैं। वे एक चलती हुई कसौटी हैं। हर समय, हर सत्ता और हर पीढ़ी के लिए और शायद यही किसी भी राजनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
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