— हरीश खन्ना —
हंसराज ‘वायरलेस’—यह नाम सुनकर शायद आपके मन में कौतूहल हो कि ‘वायरलेस’ क्या है? दरअसल, यह उनका उपनाम था, जिसके कारण वे अपने समय में पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में विख्यात हुए। आज मैं यह कहानी इसलिए साझा कर रहा हूँ क्योंकि वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी और आविष्कारक थे, जिन्हें स्वतंत्र भारत की स्मृतियों ने धीरे-धीरे धुंधला कर दिया।
उनके सुपुत्र अशोक शर्मा जी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और वर्तमान में कनाडा में रहते हैं। वे एक अत्यंत नेक और सज्जन इंसान हैं। हंसराज वायरलेस जी के बड़े सुपुत्र सतीश शर्मा जी चंडीगढ़ में रहते हैं उनको भी मैं जानता हूं। वह भी गृह मंत्रालय से सेवानिवृत अधिकारी हैं।अशोक शर्मा जी से फोन पर हुई बातचीत के दौरान ही मुझे ज्ञात हुआ कि पंजाब के प्रसिद्ध क्रांतिकारी हंसराज ‘वायरलेस’ उनके पिता थे।
हंसराज जी का जन्म 1910 के आसपास अविभाजित भारत के झंग इलाके (अब पाकिस्तान) में हुआ था। छात्र जीवन से ही उनकी विज्ञान में गहरी रुचि थी। उनकी प्रतिभा को देख लोग उन्हें एक आविष्कारक और वैज्ञानिक के रूप में देखते थे। देश की पुकार पर उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उस दौर में, जब रिमोट कंट्रोल जैसी कोई तकनीक नहीं थी, उन्होंने बिना तार के ध्वनि (Sound) और रेडियो तकनीक पर आधारित एक बैटरी चालित रिमोट सिस्टम तैयार कर लिया था।
उनके क्रांतिकारी बनने का किस्सा बेहद रोमांचक है। कहा जाता है कि वे हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल के भाई धर्मपाल जी के संपर्क में आए, जो भगत सिंह के साथी और सक्रिय क्रांतिकारी थे। उन्होंने हंसराज वायरलेस से संपर्क किया।वह भी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य बन गए ।उन दिनों क्रांतिकारियों ने दिल्ली के तिलक ब्रिज के पास तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन की ट्रेन को उड़ाने की योजना बनाई थी। इस कार्य के लिए उन्हें एक ऐसी वायरलेस तकनीक की आवश्यकता थी जिससे दूर से विस्फोट किया जा सके। उन्होंने हंसराज वायरलेस जी से कहा कि इस काम को वह पूरा करें। उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया।
हालांकि, समय के सटीक सामंजस्य (Timing Adjustment) में मामूली कमी रह गई। ट्रेन के कुछ डिब्बे तो उड़ गए, लेकिन वह बोगी सुरक्षित बच गई जिसमें लॉर्ड इर्विन बैठे थे। वह ट्रेन की डाइनिंग कार में उस समय थे । सन् 2016 में दिल्ली के 106 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी मिर्ज़ा नसीम चंगेजी ने अपने साक्षात्कार मे इस बात की पुष्टि की थी कि इस साहसी अभियान का तकनीकी नेतृत्व हंसराज ‘वायरलेस’ ने ही किया था। वह भी उनके साथ उस समय थे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस घटना की रिपोर्ट उस समय बड़ी प्रमुखता के साथ छापी।

इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछा दिया। उन को पकड़ने के लिए दस हज़ार का इनाम भी रखा गया, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी राशि थी। वे भागकर बड़ी चतुराई से सिंध चले गए, लेकिन अंततः पकड़े गए और उन्हें दस साल की जेल भी हुई । सिंध की प्रांतीय असेंबली में एक लम्बी बहस तत्कालीन स्पीकर, मुख्यमंत्री और सदस्यों के बीच में हुई कि उनको राजनीतिक बन्दी माना जाए अथवा क्रिमिनल । साथ ही उन्हें सिंध से पंजाब में शिफ्ट करने पर विवाद हुआ । वहाँ भी बहस में उन्हें हंसराज वायरलेस’ नाम से ही संबोधित किया गया। यह सब घटनाएं वहां की असेंबली की कार्यवाही के रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं।
हंसराज जी अपनी तकनीक से लोगों को अचंभित कर देते थे। हाथ ऊपर उठा कर मुट्ठी खोलने पर बिजली का बल्ब जला देते थे; हाथ नीचे करने और मुट्ठी बन्द करने पर बल्ब का बुझ जाना । उनके हाथ के इशारे या आवाज देने पर बल्ब जलता या बुझ जाता था। उन्होंने जूता पॉलिश करने वाली एक स्वचालित मशीन भी बनाई थी, जिसकी खासियत यह थी कि पॉलिश होने के बाद पैर तब तक मशीन से बाहर नहीं निकलता था जब तक उसमें पैसे न डाले जाएं। अपनी आजीविका चलाने के लिए उन्होंने शो भी किए।
आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके कार्यों को देखा । नेहरू जी ने अपने मंत्रिमंडल के तत्कालीन सदस्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पत्र लिखकर यह राय दी थी कि वे देखें कि हंसराज जी की प्रतिभा और उनके आविष्कारों का उपयोग देशहित में कैसे किया जा सकता है। इस पत्र का उल्लेख ‘नेहरू एडिटेड वर्क्स’ में भी मिलता है। 1972 में स्वतंत्रता की सिल्वर जुबली के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘ताम्रपत्र’ से सम्मानित किया और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी दी गई।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से उनके घनिष्ठ संबंध थे। उन्हें राजनीति में आने और चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उन्होंने अपनी आजीविका चलाने के लिए विज्ञान के चमत्कारों के शो किए और बाद में अपना जीवन समाज सेवा में लगा दिया। वे गरीब और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई और पेंटिंग सिखाते थे।
22 जून, 1986 को बठिंडा में अपनी बेटी के घर पर इस महान विभूति का निधन हो गया। उनके निधन पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने शोक संदेश भेजकर उनके योगदान को याद किया। यह विडंबना ही है कि उस समय इंटरनेट और सोशल मीडिया के अभाव के कारण इतिहास के पन्नों में इतना बड़ा व्यक्तित्व कहीं ओझल हो गया।
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