आज समाजवादियों को क्या करना चाहिए? – आनंद कुमार

0
Samajwadi samagam

Prof Anand Kumar

र दौर का अपना कर्तव्य-पथ होता है। इसके निर्माण में मूल्यों, सिद्धांतों, नीतियों, कार्यक्रमों और सपनों की भूमिका होती है। इससे व्यक्ति का युग-धर्म निर्धारित होता है। यह तात्कालिक सफलता और असफलता से परे होता है, क्योंकि हर कार्य का तत्काल प्रभाव और अनुकूल परिणाम नहीं होता। कुछ बीज जल्दी अंकुरित होते हैं और शीघ्र फूल-फल दे देते हैं।

बड़े सपने साकार होने में अधिक समय लेते हैं, जैसे स्वराज का महास्वप्न। इसे सच बनाने में १८५७ से १९४७ के बीच की पीढ़ियों को धैर्य के साथ संघर्ष करना पड़ा। कष्ट उठाने पड़े, रणनीतियाँ बदलनी पड़ीं, औज़ार बनाने पड़े, साधन और वाहन विकसित करने पड़े।

आज भारत जैसे देश में समाजवादी सपनों को साकार करने के लिए आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों की बढ़ती अनुकूलता के बावजूद सतत सक्रियता और धैर्य की अधिक आवश्यकता है, क्योंकि राजनीतिक संदर्भ प्रतिकूल है।

२) संसदवाद का मायाजाल

समाजवादी १९७७ के बाद से ‘संसदवाद’ (चुनाव में विजय) के मायाजाल में उलझ गए हैं। चुनाव हारने पर समाज में साख का संकट और चुनाव जीतने के लिए समाजवादी सपनों से संबंध-विच्छेद। ‘भूखी जनता चुप न रहेगी, धन और धरती बँट के रहेगी’ का नारा मत लगाइए। ‘देशी भाषा में पढ़ने दो, हमको आगे बढ़ने दो’ की ललकार की बजाय अपने बच्चों के अंग्रेज़ी माध्यम के शिशु-मंदिरों में दाख़िले का रास्ता पकड़िए।

गाँव और गरीब-हितकारी दाम-नीति की लड़ाई से पीछे हटकर ‘कारपोरेट घरानों के लोगों’ को चुनाव प्रबंधन में सलाहकार बनाइए। बिना जाति-नीति, भाषा-नीति और दाम-नीति की प्रतिबद्धता के समाजवादी न घर के रहते हैं, न घाट के। विनायक बनाने में ढेरों वानर बनते चले गए।

३) समाजवादी राह

गाँधी के लिए भारत में स्वराज को ग्राम-स्वराज के रूप में पंचायत-राज के ज़रिये साकार करना था। हमने इसे संसदीय आँख-मिचौली के माध्यम से ‘किस्सा कुर्सी का’ बना लिया। लोहिया ने सप्तक्रांति का लक्ष्य दिया और जेल, वोट और फावड़े के रास्ते पर चलना सिखाया। जेपी की संपूर्ण क्रांति की राह तय करने के लिए युवाओं की आदर्शवादिता और जनता के न्याय-बोध का समन्वय चाहिए—दोनों ही दुर्लभ हैं।

वैसे भी औसत व्यक्ति का मन रचनात्मक कार्य की सात्विकता में नहीं लगता। जेल का रास्ता कठिन है और चुनाव जीतना अमरत्व का राजसी सुख देता है। ‘जब तक सूरज-चाँद रहेगा, नेता जी का नाम रहेगा’ के नारे से किसे परहेज़ होगा? इससे नाराज़ होने के लिए बुद्ध की अनासक्ति, गाँधी के एकादश व्रत, आंबेडकर की ज़िद, जेपी का आत्मविश्वास और लोहिया का कर्तव्य-बोध चाहिए।

इस नश्वर दुनिया में समाजवादी नीतियाँ बहुत धैर्य और संकल्प माँगती हैं, जबकि संसदवाद सबसे कम झंझट की राह है। वोट-बैंक बनाने में जुटे रहिए—इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनेंगे और कम से कम सात पीढ़ियों का कल्याण होगा! व्यक्तिवाद और परिवारवाद के दोषों को भूल जाइए—‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई…’।

४) मौजूदा राजनीति में लोक-शक्ति और वोट-शक्ति

राज-शक्ति की दौड़ की राजनीति में वोट-बल का महत्व है और चुनाव के लिए आर्थिक व सामाजिक आधार चाहिए। इसमें जातियों और धर्मों के समीकरण बनाने की मजबूरी है। ‘जाति तोड़ो’ को स्थगित कर चुनाव के लिए ‘जाति जोड़ो’ की विवशता है। हर जाति का अपना भौगोलिक दायरा होता है, जिससे राष्ट्रीय की बजाय प्रदेश-आधारित रणनीति का आकर्षण बढ़ जाता है।
धर्मों का राजनीतिक इस्तेमाल बहुधर्मी राष्ट्रीयता के आदर्श से दूर ले जाकर बहुसंख्यक धर्म के वर्चस्ववाद और अल्पसंख्यक समुदायों में अलगाववादी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। चुनावी ख़र्च संभालने के लिए अरबपतियों से याराना बढ़ाना पड़ता है और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों का रक्षक बनना पड़ता है। चले थे समाजवादी अर्थव्यवस्था बनाने और बन गए पूँजीवादी ताक़तों के पहरेदार—‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ के साझेदार। फिर कंचन और कामिनी का अपना आकर्षण तथा संतति और संपत्ति का दबाव भी होता है।

५) पाँच मोर्चों पर एक साथ काम

फिर भी समाजवादी राष्ट्र-निर्माण का कोई विकल्प नहीं है। आज तानाशाही से बचने का यही टिकाऊ उपाय है।

भारत में समाजवाद की स्थापना के लिए पाँच मोर्चों पर एक साथ काम करने की चुनौती है—
१) स्वराज-निर्माण
२) बहुधर्मी राष्ट्रीयता की पुष्टि
३) सहभागी लोकतंत्र की रचना
४) आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समता व समृद्धि के युग में प्रवेश
५) धर्मनिरपेक्ष दलों में चुनाव विभाग की स्थापना

इसमें अंतिम व्यक्ति के जीवन को स्वराज-संपन्न बनाना नींव का पत्थर है। इसके लिए हर भारतीय स्त्री-पुरुष को आजीविका का संवैधानिक अधिकार दिलाने की लड़ाई आज एक समाजवादी का पहला मोर्चा है। गरीब को ईश्वर भी रोटी जैसा दिखता है और रोटी में ही ईश्वर का वास होता है।

स्वराज-यात्रा में अब तक कौन हाशिए पर हैं? बाल-श्रमिक (५ करोड़), दिव्यांग (७ करोड़), वृद्ध स्त्री-पुरुष (७ करोड़), विमुक्त जातियाँ और जनजातियाँ (१० करोड़) तथा स्त्री-निर्भर परिवारों के सदस्य (१५ करोड़)। ‘वंचित भारत’ के ये हिस्से स्वराज-यात्रा के हाशिए पर हैं—यह हमारे लिए गंभीर सरोकार का विषय होना चाहिए। इनके स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और नागरिक अधिकारों की समस्याओं के समाधान से जुड़ना ही समाजवादी होने की सार्थकता है।

भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की महिमा है। राष्ट्रीय आंदोलन की ऊर्जा से यह बहुभाषी, बहुजातीय और विकेंद्रीकृत संघ के रूप में विकसित हुई है। किंतु धार्मिक एकरूपता के समर्थकों की उग्रता ने पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में धार्मिक कट्टरवाद के दुखद परिणामों की अनदेखी करते हुए ‘हिंदुत्व’ की बुनियाद पर राष्ट्रीयता को पुनर्गठित करने का प्रयास किया है। नफ़रत और भय से जुड़े इस प्रयास के पक्ष में खुला मतदान गैर-हिंदू भारतीय नागरिकों को आशंकित कर रहा है।

राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत और भारतीय संविधान की प्रस्तावना की उपेक्षा अलगाववादी शक्तियों को बल देगी। इस राष्ट्रीय बिखराव को रोकने की जिम्मेदारी निभाकर भारतीय राष्ट्रीयता का समाजवादी विमर्श इसे मानवतावादी आधार दे सकता है। इसलिए मोहल्ला और गाँव स्तर पर एक-दूसरे के त्योहारों में सहभागिता से लेकर ज़िला स्तर पर खेल-कूद, संगीत, साहित्य और प्रदूषण-निवारण के आयोजन हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

सहभागी लोकतंत्र भारत में लोकतंत्र-संवर्धन की अगली सीढ़ी है। बिना इस दिशा में कदम बढ़ाए हम लोकतंत्र को केवल चुनावी चक्रव्यूह में सीमित करने के दोषी होंगे। चुनाव पहले ही करोड़पति राजनीतिज्ञों का बंधक बनते जा रहे हैं। दलों में परिवारवाद और चुनावों में अपराधियों की बढ़ती हिस्सेदारी ने स्थिति और गंभीर कर दी है। हम साँप-छछूँदर की दुविधा में फँसे हैं।
लोक समिति, सिटिज़न फ़ॉर डेमोक्रेसी और यूथ फ़ॉर डेमोक्रेसी जैसे मंचों के ज़रिये सक्रिय हस्तक्षेप और सुधार के लिए अभियान चलाना समाजवाद का तक़ाज़ा बन चुका है। बिना चुनाव-सुधार और दल-सुधार के संसदीय लोकतंत्र के लोक-हित-रक्षक बने रहने की संभावना नहीं बचेगी।

सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का समतामूलक पुनर्निर्माण समाजवादी परिवार से नई कार्य-सूची की माँग करता है। जाति-नीति को केवल ‘आरक्षण के रूप में विशेष अवसर’ तक सीमित न रखकर अतिपिछड़ों की वास्तविक सुनवाई करनी होगी। जाति-जनगणना, रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का प्रकाशन, महिलाओं की हिस्सेदारी और निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँगों को टालना समाजवादी परिवार को प्रभुत्वशाली जातियों का पक्षधर सिद्ध करेगा।

इसी तरह आर्थिक सुधारों में विरासत कर, शहरी संपत्ति पर नियंत्रण, विदेशी कमाई पर कर, खर्च की सीमा, कृषि-कर तथा खेती के लिए निःशुल्क जल और विद्युत व्यवस्था लागू करने का समय आ गया है। संपत्ति-संचय की विकृत स्थिति—जहाँ १० प्रतिशत के पास ७७ प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति है और ८० करोड़ लोगों को निःशुल्क अन्न देना पड़ रहा है—की अनदेखी आत्मघाती है। समाजवादी होने का दावा करने वालों को इस अभूतपूर्व विषमता के विरुद्ध सविनय अवज्ञा का नैतिक अधिकार है।

अंतिम मोर्चा

चुनाव-व्यवस्था में कारगर भागीदारी का है। चुनावी दोषों के बावजूद हार-जीत का महत्व बना रहता है। चुनाव का व्यवसायीकरण हो चुका है और पेशेवर प्रबंधन अनिवार्य हो गया है। मतदाता-सूची की निगरानी से लेकर मतदान और मतगणना एजेंटों की नियुक्ति तक पूरे चुनावी कर्मकांड को कामचलाऊ ढंग से नहीं चलाया जा सकता। हर धर्मनिरपेक्ष दल को अपने संगठन में चुनाव विभाग स्थापित करना चाहिए और समाजवादी कार्यकर्ताओं को चुनाव-प्रबंधन में विशेष दक्षता अर्जित करनी होगी।
संक्षेप में, समाजवादी कार्यकर्ताओं को नई राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए विचार-प्रचार, संगठन-निर्माण, कार्यकर्ता-प्रशिक्षण, जनमत-निर्माण तथा रचना और संघर्ष के पारंपरिक कार्यों के साथ कम से कम पाँच मोर्चों को एक साथ संभालना होगा। यही समाजवाद का नया तक़ाज़ा है।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment