देह की सरहदों पर जंग – मणिमाला

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Modi

सिर्फ राजनीति नहीं, चमक-धमक-बेहतर कमाई वाले किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए महिलाओं से पहली मांग/अपेक्षा हमबिस्तरी की ही की जाती है। कुछ लड़ जाती हैं । कुछ जीत जाती हैं और छा जाती हैं। कुछ हार जाती हैं और गुम हो जाती हैं। कुछ कम्प्रोमाइज्ड भी होती हैं। वे कहीं की भी नहीं रह जातीं, न हारती हैं न जीतती हैं। बस रह जाती हैं-कभी यहां, कभी वहां। बिखरी हुई।

मधु किश्वर ने जो कहा उसमें ज़्यादा सच है, इससे इन्कार नहीं। सोनी का मामला दिल्ली विधान सभा में भी गूंजा था। सीडी भी चली थी। कपिल मिश्र, जिन्होंने सीडी सार्वजनिक की थी भी भाजपा में हैं। लाड़ले हैं। आनंदी बेन के पति ने आडवाणी साहब को खत लिख कर गुजारिश की थी कि उनकी बीवी को मोदी के चंगुल से छुड़ाएं। उनका वैवाहिक जीवन दांव पर है। वह चिठ्ठी तब भी सार्वजनिक थी, अभी भी मीडिया में बेपर्द घूम रही है। पर मधु किश्वर को यह सब अब अभी दिखा। और उन्होंने अब जाकर बोला। यह लेन-देन में उंच-नीच का खाता-बही है, कुछ और नहीं। एक बहुत गंभीर मुद्दे को ऐसे वक्त पर इस तरह उठाया कि वह सिर्फ तूतू-मैंमैं का शिकार होकर रह गया। गंभीर चर्चा की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं रही। लेकिन कल, आज और कल पर एक नज़र डालें, आवाज़ें सुनें। दबोच दी गई स्त्री काबिलियतों की सिसकियां हर ओर सुनाई देती हैं।

सिनेमा में कास्टिंग काउच का नाम और नमूने जमाने से दर्ज़ होते रहे हैं। पत्रकारिता (अब मीडियागिरी) में भी रह रह कर ‘अकबर महान’ जैसों की गुंज सुनाई दे जाती है। वो क्या है? ज्यूडिशियरी। हां..हां ज्यूडिशियरी…न्यायपालिका। खुद चीफ साहब गोगोई की अपनी ही स्टाफ ने नहीं की थी शिकायत! अलग बात रही की जांच समिति में खुद ही शामिल हो खुद को बेदाग़ साबित कर लिया। मज़े से अपना पूरा समय भोगा। फिर सबसे घटिया फैसला देकर राज्य सभा में मनोनीत होकर बिना किसी कार्यवाही/चर्चा में दर्ज हुए ही कार्यकाल भी ख़त्म हो गया।

शिक्षा जगत के भी हिले हवाले कम नहीं हैं। कई पीएचडी अभ्यर्थियों को अपनी थीसिस खुद आग के हवाले करके गायब हो जाते देखा है।

राजनीति की तो बात ही क्या? महिलाएं कम या ना के बराबर यूं ही नहीं हैं। ज़्यादातर अपनी देह की सरहद पर ही लड़ कर मर खप जाती हैं। ख़त्म हो जाती हैं। सामाजिक राजनीति में भी ऐसे खूंखार कम नहीं बैठे हैं।


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1 COMMENT

  1. Brilliant analysis of the politics of present times. The entire project of capturing state power through the tools of management, casting of actors who will perform on the stage, providing sound and light, fake narratives of an imagined past and an assured future and temprature control devices……..
    A faint but real possibilities in a single step of resistence could be the spark to bring down this formidable looking but fragile edifice…
    Am i getting it right my friend?

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