
इतिहास का एक अजीब स्वभाव है—वह हर बार अपने सबसे खतरनाक वाक्य किसी नेता के मुँह से कहलवाता है और फिर चुपचाप पीछे हटकर देखता है कि मनुष्य अपनी ही बनाई हुई आग में कितनी देर तक खड़ा रह सकता है। इस समय भी वही दृश्य है। डोनाल्ड ट्रम्प के एक कथन ने हवा में बारूद की गंध घोल दी है—“एक सभ्यता को समाप्त कर देने” की बात। वाक्य छोटा है लेकिन उसके भीतर हजारों वर्षों की स्मृतियाँ काँप रही हैं।
सभ्यता—यह शब्द इतना हल्का नहीं कि उसे किसी राजनीतिक भाषण में यूँ ही उछाल दिया जाए। अमेरिका की सभ्यता, जिसे आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में हम जानते हैं, मुश्किल से ढाई सौ वर्षों की है—१७७६ से लेकर आज तक लेकिन अगर कोई इसे व्यापक पश्चिमी परंपरा में रखकर देखे तो वह यूनान, रोम, पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति से होकर गुज़रती है—फिर भी, उसकी निरंतरता आधुनिक ही है, उसका आत्मविश्वास नया है और उसका अहंकार भी।
इसके विपरीत ईरान—या कहिए फ़ारस—एक भूगोल नहीं, एक स्मृति है। उसकी सभ्यता का आरंभ आप आकेमेनिड साम्राज्य से गिन सकते हैं जो लगभग ५५० ईसा पूर्व में खड़ी होती है। फिर सस्सानियन साम्राज्य, इस्लामी युग, सूफ़ी परंपराएँ, फ़िरदौसी की “शाहनामा”, हाफ़िज़ की ग़ज़लें—यह सब मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक नदी बनाते हैं जो तीन हज़ार साल से बह रही है। अमेरिका जहाँ एक तेज़ी से खड़ी हुई इमारत है, वहीं ईरान एक प्राचीन शहर है—जिसकी हर ईंट के नीचे कोई पुरानी कहानी दब़ी है।
अब इस पर सोचिए—कोई कहे कि वह “सभ्यता को नष्ट कर देगा।” यह वाक्य युद्ध की भाषा भी नहीं है। युद्ध में आप सेना को हराते हैं, भूभाग पर कब्ज़ा करते हैं, सत्ता बदलते हैं। सभ्यता को नष्ट करना—यह तो मनुष्य की स्मृति, उसकी भाषा, उसके गीत, उसकी कब्रों और उसके देवताओं तक को मिटाने की घोषणा है। यह वही भाषा है जो इतिहास में हमने मंगोल आक्रमण या औपनिवेशिक विस्तार या बीसवीं सदी के जनसंहारों में सुनी थी।
और मज़े की बात देखिए—हर बार जो “नष्ट” करने निकला, वह खुद इतिहास में एक फुटनोट बन गया। सभ्यताएँ इतनी आसानी से नहीं मरतीं। वे टूटती हैं, झुकती हैं, अपनी भाषा बदलती हैं, अपने देवताओं के नाम बदल देती हैं—लेकिन किसी न किसी रूप में जीवित रहती हैं। फ़ारस यूनानी आक्रमणों से बचा, अरबों से गुज़रा, मंगोलों की धूल में लिपटा, फिर भी ईरान बना रहा। सभ्यता कोई इमारत नहीं जिसे बम से गिरा दिया जाए; वह एक आदत है, एक स्मृति है, एक जिद है।
फिर भी, यह कह देना कि “कुछ नहीं होगा” भी अपने आप में एक भोली सांत्वना है क्योंकि आधुनिक युद्ध, खासकर परमाणु युद्ध, सिर्फ सैनिकों को नहीं मारता—वह शहरों को मिटाता है, पीढ़ियों को बीमार करता है और इतिहास के पन्नों को अधजला छोड़ देता है।
हिरोशिमा पर परमाणु बमबारी और नागासाकी की छाया आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। वहाँ सभ्यता खत्म नहीं हुई लेकिन वह हमेशा के लिए बदल गई—उसकी त्वचा पर एक स्थायी जलन रह गई।
जब कोई नेता परमाणु हमले की धमकी देता है तो वह सिर्फ वर्तमान को नहीं, भविष्य को भी गिरवी रख देता है। यह एक तरह का नैतिक दिवालियापन है—जहाँ शक्ति का प्रदर्शन इतना ज़रूरी हो जाता है कि मनुष्य की जान, उसकी संस्कृति, उसका इतिहास सब “आनुषंगिक क्षति” में बदल जाते हैं और यह कहना कि “बातचीत भी हो सकती है”—यह उस जुए जैसा है जिसमें दांव पर पूरी मानवता रखी हो और खिलाड़ी मुस्कुराकर कहे कि शायद मैं पत्ते फेंक भी दूँ।
७ अप्रैल की रात—जिसे लेकर इतनी बेचैनी पैदा की जा रही है—वह शायद एक सामान्य रात ही निकले। दुनिया ने कई बार इस तरह की धमकियाँ सुनी हैं और कई बार वे सिर्फ कूटनीतिक दबाव बनाने का हथियार निकली हैं लेकिन समस्या यह है कि हर बार जब इस तरह की भाषा इस्तेमाल होती है तो युद्ध का तापमान थोड़ा और बढ़ जाता है। यह वैसा ही है जैसे सूखी घास के मैदान में कोई बार-बार माचिस जलाकर बुझाता रहे—एक बार चिंगारी सही जगह गिर गई तो फिर किसी के बस में नहीं रहेगा।
यहाँ नैतिकता की बात करना कुछ लोगों को भोला लग सकता है लेकिन सच यह है कि युद्ध भी एक तरह की नैतिकता पर टिके होते हैं—कम से कम यह मान्यता कि नागरिकों को बचाया जाए, कि सांस्कृतिक विरासत को नष्ट न किया जाए कि विनाश की कोई “सीमा” हो। जब यह सीमा टूटती है, तब युद्ध, युद्ध नहीं रह जाता—वह एक सामूहिक आत्महत्या का अभ्यास बन जाता है।
एक ज़रूरी सच—सभ्यताएँ बाहर से कम, अंदर से ज़्यादा टूटती हैं। जब कोई समाज अपने भीतर के विवेक, करुणा और संतुलन को खो देता है, तब वह किसी बाहरी हमले के बिना भी बिखरने लगता है। बाहरी बम सिर्फ उस प्रक्रिया को तेज़ कर देते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि कोई एक नेता क्या कह रहा है; सवाल यह है कि दुनिया उस भाषा को कितनी गंभीरता से लेती है और उसे कितना स्वीकार करती है।
ईरान की सुबह कैसी होगी, यह सिर्फ कुछ घंटों में तय नहीं होगा। वह सुबह हजारों वर्षों की परंपरा से बनती है, और उतनी ही जिद से बची रहती है लेकिन अगर दुनिया ने यह मान लिया कि “सभ्यता को नष्ट करने” जैसी बातें सिर्फ राजनीति का हिस्सा हैं तो फिर अगली बार यह वाक्य किसी और भूगोल के लिए बोला जाएगा—और धीरे-धीरे, हम सब उस वाक्य के दायरे में आ जाएँगे।
मनुष्य ने सभ्यताएँ बनाने में हजारों साल लगाए हैं। उन्हें मिटाने के लिए अब हमारे पास कुछ मिनट ही काफी हैं। यही आधुनिकता का सबसे डरावना संतुलन है—और हम सब, चाहे जितना भी व्यस्त होने का नाटक करें, उसी संतुलन पर खड़े हैं।
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