‘गांधी: युद्धरत दुनिया के लिए उम्मीद’

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Mahatma Gandhi

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध-विराम घोषित हुआ है, मगर विराम और समाप्ति में बड़ा अंतर है। ऐसे समय में महात्मा गांधी की याद आना स्वाभाविक है। जागतिक शांति, अहिंसा और पारस्परिकता की बात गांधी ही करते थे। गांधीजी के लिए सारा विश्व एक परिवार या कुटुंब था, जिसके सदस्य विश्व के सारे राष्ट्र और उनके नागरिक थे। स्वतंत्रता और स्वराज्य-प्राप्ति हेतु अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा गया आंदोलन एक तरह से वैश्विक शांति के लिए भी था। यह एक अहिंसक, शस्त्र-विहीन और द्वेष-रहित अनोखा आंदोलन था, जिसके प्रतीक झाड़ू, चरखा और झंडा थे।

गांधी केवल युद्ध के खिलाफ ही नहीं थे, बल्कि उनकी पक्की धारणा थी कि आक्रमण और लड़ाई हर राष्ट्र के लिए अहितकारी है। राष्ट्रों का हित इतनी संकुचित कल्पना नहीं हो सकता। अपना हितरक्षण यदि दूसरे के हित में नहीं होगा, तो वह संघर्ष की जड़ बनेगा। विश्वशांति, अहिंसा और शस्त्रनाश का सामयिक कार्यक्रम ही प्रगति का मार्ग हो सकता है। शांति, अहिंसा और शस्त्रत्याग पर सहमति होगी, तभी राष्ट्रों का संघ आपसी रिश्तों को मजबूती प्रदान कर सकता है। शस्त्रों की होड़ और उनका भंडार हर सदस्य राष्ट्र को कमजोर बनाएगा और उसके विकास तथा आर्थिक-सामाजिक प्रगति में बाधा बनेगा। स्थायी शांति आपसी विश्वास पैदा करेगी। सहअस्तित्व भी गांधी का ही शब्दप्रयोग था। वह कहते थे कि मिटाने की भाषा और कृति का परिणाम केवल विनाश ही होता है। मरने-मारने, कब्जा करने, भूमि और धन हड़पने की आकांक्षा स्वस्थ आर्थिक संबंधों की स्थापना नहीं कर सकती। राष्ट्रों को यह समझने की जरूरत है कि अपने पड़ोसी तथा दूरस्थ राष्ट्रों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को धक्का पहुँचाने से वाणिज्य और व्यापार बढ़ते नहीं, घटते हैं। आर्थिक रिश्तों के लिए सौहार्द और दूसरे के अस्तित्व का आदर बेहद जरूरी है, अन्यथा सर्वनाश निश्चित है। विश्व में आज यही परिस्थिति है और भारत चुप्पी साधे बैठा है।

युद्ध के बारे में गांधी के विचार अपने समय से बहुत आगे थे। वे आने वाली पीढ़ियों और नव-राष्ट्र-निर्माण का सपना देखने वालों, दोनों के लिए मार्गदर्शक रहेंगे। गांधी कहते थे कि युद्ध या लड़ाई इसलिए नकारात्मक है क्योंकि वह राक्षसी महत्वाकांक्षा का परिणाम है। सकारात्मक विकास और प्रगति सामूहिक प्रयत्नों से ही संभव होगी। मेरे राष्ट्र का नागरिक केवल मेरे ही नहीं, बल्कि अन्य राष्ट्रों के विकास में भी मददगार होगा, तभी शत्रुता की भावना का अंत होगा। अगर हिंसा का ही राज होगा, तो सबका अस्तित्व मिट सकता है। फिर मनुष्य और प्राणी, दोनों ही नष्ट होंगे। पृथ्वी पर मानव का जीवन संकट में पड़ जाए, ऐसा विनाश गांधीजी नहीं चाहते थे।

जो युद्ध आज पश्चिम एशिया, अमेरिका और इस्राइल तक सीमित है, वह विश्वव्यापी न हो, यही हम चाहते हैं। गांधी-विचार ही शांति और मानवता को जीवित रख सकते हैं। हाल ही में मैंने एक किताब पढ़ी। उसका नाम The World Without War है। इसके लेखक संदीप वासलेकर जी हैं। उन्होंने मुझे यह किताब भेंट की थी। इस पुस्तक में युद्ध के बारे में गांधीजी के विचार उद्धृत किए गए हैं। गांधीजी के साथ ही उनसे प्रेरित मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला के वक्तव्यों का भी समावेश है। हाल के युद्ध की पृष्ठभूमि में गांधीजी के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। आज गांधीजी का देश युद्ध रोकने की पहल नहीं करता, न ही इस देश में रहने वाले, गांधी के अनुयायी कहलाने वाले, गांधी-विचार को मानने वाले और गांधी-विचार को कृति में लाने वाले लोग मुखर दिखाई देते हैं; वे भी मानो मौन धारण किए हुए हैं। ऐसा लगता है जैसे गांधी-विचार में कभी कोई सामर्थ्य था ही नहीं।
भारत की परराष्ट्र नीति आज भी उसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए। तभी तो पूज्य दलाई लामा जी और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना जी का हमारे देश में स्वागत संभव है। बुद्ध और गांधी के देश में ही यह हो सकता है कि जटिल से जटिल समस्या भी संवाद और शांति के मार्ग से सुलझाई जाए। लड़ाई अपवाद है; सामान्य नियम अहिंसा और अमन है, और रहेगा। युद्ध हमारे द्वार तक न आए, यही कोशिश रहनी चाहिए। आज का युद्ध हमारी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है। महंगाई बढ़ रही है, जीवनावश्यक वस्तुओं की उपलब्धता संकटग्रस्त है और कालाबाजारी भी जोरों पर दिखाई देती है। हमारा राष्ट्र ईंधन की कमी से जूझ रहा है। इन परिस्थितियों में, जो गांधी-विचारों के वाहक रहे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारतीय, तथा जमनालाल बजाज और इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित महनीय व्यक्तित्व हैं, उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका, इस्राइल के शांतिप्रिय नागरिकों का आह्वान करके युद्ध-समाप्ति के लिए कदम उठाने पर दुनिया को मजबूर करना चाहिए। जो आक्रामक और दोहरी नीति वाले राष्ट्र हैं, वे इस दौर में प्रभावशाली सिद्ध नहीं होंगे।

गांधी भारतीय थे, मगर वे विश्वमानव भी थे। विश्व में गांधी-विचार का सम्मान करने वाले आज भी एक हो सकते हैं। आज ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन जैसे देश अन्य देशों पर आक्रमण नहीं करना चाहते। गांधीजी के नाम से डाक-टिकट जारी करने वाले करीब 150 राष्ट्र हैं। सत्तर देशों में गांधी के स्मारक हैं। भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर की गांधी-विचार संस्थाएँ हैं और वे सक्रियता से काम भी कर रही हैं। ऐसी संस्थाओं से जुड़े आदरणीय व्यक्तित्वों से मैं मध्यस्थता की अपेक्षा रखता हूँ।
गांधीजी मानते थे कि मैत्री एक वैश्विक मूल्य है। अंतरराष्ट्रीय अराजकता का अंत आपसी सहकार्य, सहअस्तित्व और अहिंसा से किया जा सकता है। यदि सामूहिक सर्वनाश, जानलेवा स्पर्धा और सहअस्तित्व के अनादर का मार्ग अपनाया जाएगा, तो विनाश तय है। इसे टालना हो तो सबसे पहले अणुबम और शस्त्रों से दूरी बनानी होगी। सबके सुख, चैन और शांति के लिए गांधीजी ने युद्ध का रास्ता अपनाने वालों से यही अपील की थी। युद्ध से बंधुत्व नष्ट होगा।

रंगून में 9 मार्च 1929 को एक आमसभा में और Young India के 4 अप्रैल 1929 के अंक में गांधीजी ने कहा:
“My Mission is not merely freedom of India, though today it undoubtedly engrosses practically the whole of my life and the whole of my time. But through realisation of Freedom of India, I hope to realize and carry on the mission of brotherhood of man. My Patriotism is not an Exclusive thing. It is all embracing and I should reject that Patriotism which sought to mount upon the distress or the exploitation of other nationalities.”
दुनिया को ऐसा संदेश देने वाले गांधी को हम ही भूल रहे हैं। विश्व के सभी राष्ट्रों के संगठन की महत्ता और उसका पाठ सिखाने वाला हमारे राष्ट्र में पैदा हुआ था। युद्ध की समाप्ति जीत या हार में नहीं होती; उसकी चोट बहुत गहरी होती है। सब कुछ तितर-बितर हो जाता है। युद्ध में शामिल देशों के नागरिक विश्व के दूसरे देशों में शिक्षा और रोजगार हेतु स्थायिक होते हैं। नागरिकता के आयाम बदल चुके हैं। जहाँ पैदा हुए, पढ़े-बढ़े, उस मिट्टी से कोसों दूर काम-धंधे के कारण बसना पड़ता है। निरंतर स्थलांतर करने वाले तरुणों को राष्ट्रों की सीमाओं में बाँधकर नहीं रखा जा सकता। विश्वबंधुता अब सामान्य बात होती जा रही है।

ऐसे समय में उन्माद और गर्व की भाषा किसी महासत्ता को शोभा नहीं देती। यह महासत्ता के नागरिकों और जनता, दोनों का अपमान है। क्या उन्हें लड़ाई और शस्त्रस्पर्धा में रुचि है? यह सवाल उन्हीं से किया जाए, तो जवाब मिल जाएगा। गांधी का मार्ग यह साबित करता है कि एक देशप्रेमी और देशभक्त व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर का भी हो सकता है। इसी कारण गांधीजी एक ऐसा विश्व-संघ चाहते थे, जहाँ सदस्य राष्ट्रों के हितों की रक्षा वैश्विक भलाई का मार्ग प्रशस्त करे। यही सोच दांते और आइंस्टाइन की भी थी, मगर कांत और गांधी इससे आगे निकल गए। गांधीजी की अहिंसा, विश्व-संघ की इसी कल्पना का एक विस्तार थी। गांधी, मार्टिन ल्युथर किंग (जूनियर) और मंडेला ने यह सिद्ध किया कि अहिंसा के विचार से दूसरे पर दबाव डालने की प्रक्रिया को परास्त किया जा सकता है। विली ब्रांट और गोर्बाचेव की भी यही धारणा थी।

आज 140 करोड़ की आबादी वाला भारत पूरे विश्व को शांति और सुकून पाने में मददगार हो सकता है, क्योंकि गांधी-विचार की जड़ यही है। धोखा हमारी उदासी और अनास्था का है। यह गांधी-विचार की हार नहीं, बल्कि हमारे तथाकथित सुशिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य समाज की हार है। आज भारतवर्ष को बहुत आर्थिक नुकसान हुआ है। व्यापार और व्यावसायिक लेन-देन लगभग ठप्प हो गए हैं। विश्व के महाशक्तिशाली राष्ट्र का प्रमुख युद्ध से उत्साहित होता होगा, मगर उसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। तभी तो मार्टिन ल्युथर कहते हैं:

“War is the greatest plague that can affect humanity; it destroys religion. It destroys states. It destroys families. Any scourge is preferable to it.”
(Martin Luther – Table Talk)

ऐसे महानुभावों का सम्मान गांधी का राष्ट्र करेगा, यही आशा करता हूँ।
— सत्यरंजन धर्माधिकारी ,बॉम्बे उच्च न्यायालय के पूर्व स्थायी न्यायाधीश


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