
1) श्री चंद्रशेखर (१७ अप्रैल १९२७८ जुलाई २००७) भारत के समाजवादियों की अगली कतार के आकर्षक नेता थे. उनकी उपलब्धियों में भारत का प्रधानमंत्री बनना (१० नवंबर १९९० से लेकर २१ जून १९९१ तक), जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को सुशोभित करना (१९७७-१९८८), १९६७ में कांग्रेस संसदीय दल का महामन्त्री चुना जाना, २५ जून १९७५ से १९ महीने तक का बंदी जीवन और १९६२ से १९९४ तक सांसद रहना उल्लेखनीय माना जाता है. हमारे जैसे लोगों की दृष्टि में उनके द्वारा ६ जनवरी १९८३ से २५ जून १९८३ तक की कन्याकुमारी से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक की ६ महीने में ४२६० किलोमीटर की भारत यात्रा और कुशीनगर (महात्मा बुद्ध की महानिर्वाण भूमि) से फैज़ाबाद (आचार्य नरेन्द्रदेव की जन्मभूमि), जयप्रकाश नगर से पटना और सारनाथ से मनोहर ग्राम (भारत का भौगोलिक केंद्र) की पदयात्राओं का इन सभी उपलब्धियों से ज्यादा बुनियादी और दीर्घकालीन महत्व है. उन्होंने इन यात्राओं को आत्मशिक्षण और जनसम्पर्क का माध्यम बनाया और इसे सिविलनाफरमानी के कठिन मार्ग के सहज विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उन्होंने १९८३ से १९८८ के दौरान अपने राजनीतिक सहकर्मी के रूप में काम करने का अवसर दिया। मुझे जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रशिक्षण समिति का संयोजक बनाया और श्री सुरेंद्र मोहन, डा. बापू कालदाते, श्री रामविलास पासवान, श्री सुधींद्र भदौरिया और श्री यशवंत सिन्हा सदस्य थे.
यह सच है कि भारतीय लोकतंत्र की रचना में समाजवादी आदर्शों का बुनियादी योगदान है। हमारी स्वराज की परिभाषा में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकता और मानवीय बंधुत्व मूल तत्व थे। भारतीय संस्कृति में न्याय, नैतिकता, समता और करुणा की धारा बुद्ध और महावीर से लेकर नानक और गांधी तक की सिखावन और साधना से प्रवाहित होती रही है। ऐसी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की समाजवादी शाखा ने स्वतंत्रता, समता और संपन्नता के लिए समर्पित समाजसेवकों को संगठित करने का १९३४ से बीड़ा उठाया। किसानों, मज़दूरों, महिलाओं, विद्यार्थियों और देसी रियासतों को जाग्रित किया। १९४२ में ‘अंग्रेजों! भारत छोड़ो!’ आंदोलन की अगुवाई की। समाजवादियों को उम्मीद थी कि अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्ति के बाद जमींदारों और राजाओं-नवाबों की ताकत के खिलाफ जनआन्दोलन का दौर चलेगा। लेकिन इसके विपरीत कम से कम जोखिम की राजनीति की ओर देश मुड़ गया। अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो की दो सौ साल से चली आ रही चालाकी के खिलाफ जनजागृति के जवाब में ‘बांटो और हटो’ की रणनीति अपनाई। इसमें उन्हें सांप्रदायिक ताकतों का साथ मिला। राजाओं और नवाबों की मदद मिली। पाकिस्तान, द्रवीडिस्थान, खलिस्तान, नागालैंड, हिन्दी-हिन्दू-हिंदुस्तान जैसे अलगाववादी अभियानों को हवा दी गई।
भारत की एकता को बचाए रखने की शर्तें बहुत कठिन हो चुकी थीं बहुभाषी सर्वधर्म समभाव भारत की कल्पना सिर्फ गांधी और उनके अनुयायियों के बीच बची थी। फिर अंग्रेजों ने ५५० देसी रियासतों को भी अपनी मनमानी के लिए उकसाया। साम-दाम-दंड-भेद की हर कुटिलता का इस्तेमाल किया। 14 अगस्त 1947 को भारत का अंग-भंग करके पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुल इलाकों की नकली एकता को मान्यता दे दी और पाकिस्तान का निर्माण कर दिया। इससे 10 लाख लोगों की जान गई और 1 करोड़ लोग बेघरबार हो गए. सारा देश साम्प्रदायिकता की आग से झुलसने लगा.
2) १९४६ और १९४७ के बीच ‘संविधान सभा एक अर्धमृत नवजात शिशु की तरह उत्पन्न हुई. लेकिन भारत-विभाजन से पैदा चुनौतिओं का सामना करने की सचाई ने संविधान निर्माण को राष्ट्रीय राजनीति नया प्रस्थान बिन्दु बना दिया। आरंभ में समाजवादियों ने ‘संविधान सभा’ को महत्वहीन माना। मार्क्स और गांधी से लेकर जिन्ना, सावरकर, मानवेंद्र नाथ राय और स्वामी सहजानंद तक के अनुयायियों ने भी इससे अपने को अलग रक्खा।
लेकिन १५ अगस्त १९४७ के बाद के बदले हालात में इसका नया महत्व समझा गया. डा. आम्बेडकर श्री जगजीवन राम, राजकुमारी अमृतकौर, डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल के प्रयासों से कांग्रेस की मदद से संविधान सभा के दुबारा सदस्य बने और संविधान के लेखकों में ऐतिहासिक जगह बनायी। समाजवादियों ने भी इससे जुड़ना चाहा। जयप्रकाश जी ने नेहरू जी को पत्र लिखकर नामों की एक सूची भी दी. लेकिन गुंजाईश नहीं बनी. फिर भी समाजवादियों ने एक पूरक दस्तावेज बनाकर अपना दृष्टिकोण देश और संविधान सभा के सामने रखा. डा. आम्बेडकर ने समाजवादियों की आलोचना का उत्तर भी दिया। लेकिन यह सच नहीं बदला कि १) भारत के बंटवारे का विरोध करने में असमर्थता, २) संविधान रचना में हिस्सा न लेने और ३) २६ नवम्बर १९४९ से लागू संविधान के अंतर्गत हुए दो आम चुनावों के पहले हुई टूट-फूट के कारण समाजवादी आंदोलन स्वाधीनोत्तर भारत की संसदीय राजनीति में १९५२ और १९५७ के चुनावों के बाद हाशिये पर चला गया. कम्युनिस्ट पार्टी स भी कम सीटें मिलीं।
3) कांग्रेसियों में सत्ता के आकर्षण, आंदोलन की थकावट, भारत विभाजन और गांधी जी की हत्या के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में समाजवादी कार्यकर्ताओं के लिए काम करना कठिन हो गया। गोवा की मुक्ति, नेपाल में राणाशाही के खिलाफ क्रांति, पंढरपुर में दलित मंदिर प्रवेश, संविधान सभा में हिस्सेदारी जैसे सवालों पर कांग्रेस ने समाजवादी शाखा से जुड़े कार्यकर्ताओं की पहल को नापसन्द किया। इसके फलस्वरूप कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने १९४८ में कांग्रेस छोड़ी और विपक्षी दल की भूमिका अपनाते हुए सत्ता की बजाए संघर्ष की राह चुनी। इसका नेतृत्व आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, डा. लोहिया, अशोक मेहता, फरीदुलहक अंसारी, श्रीधर महादेव जोशी, बालेश्वर दयालु, अरुणा आसफ अली, दिनेश दासगुप्ता आदि ने किया।
लेकिन १९५२ में हुए पहले आमचुनाव में १० प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद लोकसभा में बहुत कम सीटें मिली। इससे चिंतित समाजवादी नेतृत्व ने अपने आधार का विस्तार करने के लिए कांग्रेस से असंतुष्ट स्वतंत्रता सेनानियों के एक अन्य संगठन किसान मजदूर प्रजा पार्टी के साथ मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई।
4) प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेतृत्व मंडल ने अनेकों आदर्शवादी युवक नेताओं को आकर्षित किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तेजस्वी विद्यार्थी नेता श्री चंद्रशेखर भी आचार्य नरेन्द्र देव के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर प्रजा समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। उन्होंने इलाहाबाद से एम. ए. करने के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर राजनीति शास्त्र में शोध करने का निर्णय किया था लेकिन आचार्य नरेन्द्र देव की प्रेरणा से बलिया में प्रसोपा के जिला मंत्री का पद संभाला।
१९५३ में उनको उत्तर प्रदेश प्रसोपा का संयुक्त मंत्री बनाया गया और उनका कार्यक्षेत्र पूरा उत्तर प्रदेश हो गया । उनके साथ प्रसोपा में शामिल होने वाले युवाओं में नारायण दत्त तिवारी, रामधन, रामायण राय, गौरीशंकर राय, हरि किशोर सिंह, आनन्देश्वर, संतबख्श सिंह, आनंद देव गिरी, ओमप्रकाश श्रीवास्तव, देवेंद्र नाथ द्विवेदी आदि ने भी प्रौढ़ावस्था में प्रादेशिक और राष्ट्रीय राजनीति में उल्लेखनीय कार्य किया।
5) श्री चंद्रशेखर ने १९५२ से १९६२ के बीच अपनी युवावस्था के दस साल अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संगठन विस्तार में लगाए। प्रसोपा ने भी उनके महत्व को समझते हुए १९६२ में राज्यसभा सांसद बनाया। श्री चंद्रशेखर ने ३६ बरस की आयु में वृद्धि समाजवादी सांसद के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया।
लेकिन यह दशक भारत में समाजवादी संगठन और आंदोलन के लिए विघटन और बिखराव का था। १९५२ के आमचुनाव में मिली अप्रत्याशित पराजय से पैदा हताशा दूर करने के लिए १९५३ में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई थी। लेकिन एक साल बीतते बीतते १९५४ से प्रसोपा में बिखराव शुरू हो गया। इसके संस्थापक महानायक जयप्रकाश नारायण ने दलीय राजनीति मेंबर अनैतिकता और राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा से क्षुब्ध होकर तीन सप्ताह का उपवास किया और उसके बाद दलीय राजनीति से संन्यास लेकर आचार्य विनोबा भावे के नेतृत्व में शुरू भूदान आंदोलन के लिए अपना जीवन दान कर दिया।
१९५४ में ही केरल में श्री पट्टमथानु पिल्लै के नेतृत्व में बनी प्रसोपा-कांग्रेस सरकार ने एक जुलूस पर गोली चलाई और प्रसोपा के महामंत्री डा. राममनोहर लोहिया ने इस दमनकारी कार्यवाही की निंदा करते हुए सरकार के इस्तीफे की मांग की। प्रसोपा नेतृत्व इस प्रश्न पर विभाजित हो गया और डा. लोहिया प्रसोपा से निष्कासित कर दिए गए। इसकी प्रतिक्रिया में डा लोहिया के समर्थकों ने अलग होकर समाजवादी पार्टी नाम से एक नयी पार्टी बनाकर १९५७ के आमचुनाव में उम्मीदवार उतारे। १९ फरवरी १९५६ को इरोड में समाजवादी आंदोलन के मार्गदर्शक आचार्य नरेन्द्र देव का देहांत हो गया। इससे समाजवादी परिवार की एकजुटता की अंतिम उम्मीद भी ख़तम हो गयी. इन हालात में १९५७ के आम चुनाव में निराशा और बिखराव को बढ़ावा मिला।
१९५९-६० में एक अन्य वरिष्ठ समाजवादी नेता श्री अशोक मेहता ने भारत के संदर्भ में विपक्षी दलों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए ‘पिछड़ी आर्थिकी की मजबूरियों’ के लिए राष्ट्रीय हित के लिए दलों से ऊपर उठकर सहयोग की जरूरत पर बल दिया। इसी बीच कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में समाजवादी नीतियों के प्रति अपना रुझान घोषित किया और सहमना संगठनों से सहयोग का आवाहन किया। इससे प्रभावित होकर श्री अशोक मेहता ने अपने अनुयायियों के साथ प्रसोपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने का निर्णय किया। कांग्रेस ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष मनोनीत कर दिया। श्री गेंदा सिंह से लेकर श्री नारायण दत्त तिवारी तक को यथायोग्य भूमिकाएं मिलीं।
6) १९६२ में हुए आमचुनाव में समाजवादी दलों को और नुकसान हुआ। डा. लोहिया सीधे श्री जवाहर लाल नेहरू से टकराए। इससे उनकी गैर कांग्रेसी विकल्प के लिए प्रतिबद्धता प्रमाणित हो गई। समाजवादी धारा में डा. लोहिया की पहल पर कार्यक्रम आधारित गैर-कांग्रेसी संयुक्त मोर्चे की संभावना पर विचार किया जाने लगा। इससे वामपंथी और समाजवादी दलों में निकटता बढ़ी। समाजवादी पार्टी और प्रजा समाजवादी पार्टी की एका से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) अस्तित्व में आयी। कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नै संयुक्त मोर्चा बना लिया। श्री राजनारायण १९६६ में राज्यसभा के सदस्य बनकर दिल्ली आ गए जिससे गैरकांग्रेसवाद को मजबूती मिली।
इस बीच भारत पर अक्तूबर १९६२ में चीनी हमला हुआ। १९६३ में संपन्न उपचुनावों में आचार्य कृपलानी, डा. लोहिया और मीनू मसानी जैसे कांग्रेस विरोधी राष्ट्रीय नेता संसद में पहुंच गए। २७ मई १९६४ को श्री जवाहरलाल नेहरू का महीनों की अस्वस्थता के बाद देहांत हो गया। १९६४ के बाद के अंतिम महीनों में श्री मधु लिमए भी मुंगेर से उपचुनाव में जीत कर लोकसभा को देश का आइना बनाने में लोहिया के साथ जुट गये।
7) नेहरू की जगह श्री लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री चुने गए लेकिन इस प्रक्रिया में कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी बढ़ गई। शास्त्री जी के कार्यकाल में १९६५ में भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ और सोवियत संघ की मध्यस्थता से भारत तथा पाकिस्तान के बीच ताशकन्द समझौता संभव हुआ। लेकिन शास्त्री जी की ताशकंद में ही रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। उनकी जगह श्रीमती इंदिरा गांधी कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के समर्थन से प्रधानमंत्री चुनी गई।
उन्हें श्री चंद्रशेखर के नेतृत्व में सक्रिय समाजवादी समूह का भी समर्थन मिला। श्री मोरारजी देसाई दूसरी बार पराजित हुए । कांग्रेस में वामपंथी और दक्षिणपंथी ध्रुवीकरण बढ़ गया जिसकी परिणति १९६९ में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस के विभाजन में हुई।
8) अपनी युवावस्था के लगभग १५ बरस कांग्रेस का विरोध करते हुए समाजवादी विकल्प के निर्माण में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को माध्यम बनाकर किये गये प्रयासों की निरर्थकता को स्वीकार करते हुए श्री चंद्रशेखर ने १९६५ में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। लेकिन प्रसोपा छोड़ते समय उन्होंने सौम्यता और शिष्टाचार का पूरा ख्याल रखा. वह कांग्रेस में शामिल होकर भी आचार्य नरेन्द्रदेव के प्रति समर्पित रहे और श्री जयप्रकाश नारायण और प्रभावती जी के साथ अन्राग बना रहा. समाजवादी परिवार से उनका सम्बन्ध विच्छेद नहीं हुआ. यह कांग्रेस में वैचारिक आत्ममंथन का दौर था जिसमें चंद्रशेखर जी का प्रवेश वामपंथियों विशेषकर आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण के प्रशंसकों के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ।
दो बरस के अंदर १९६७ में श्री चंद्रशेखर कांग्रेस संसदीय दल के महामंत्री चुन लिए गए। १९६८ में उनको कांग्रेस् पार्टी की तरफ से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया। १९६९ में इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई की टकराहट को समाजवादी और पूंजीवाद समर्थको की लड़ाई के रूप में प्रचारित करने की श्री चंद्रशेखर ने अगुवाई की। इंदिरा गांधी की तरफ से प्रस्तुत १० सूत्रीय कार्ययोजना के श्री चंद्रशेखर शिल्पी और व्याख्याकार बने।
उन्होंने १९६९ से ‘यंग इंडियन’ अंग्रेजी साप्ताहिक का संपादन प्रकाशन शुरू किया जिसके संपादकीय से कांग्रेस पार्टी में इंदिरा समर्थकों को मुद्दे और मुहावरे मिलते थे। ‘डायनमिक्स ऑफ सोशल चेंज’ शीर्षक से उनका एक लेख संकलन भी आया.
श्री चंद्रशेखर ने कांग्रेस में शामिल होने का १९६५ और १९७५ के बीच के दस बरसों में बड़ी सूझबूझ के साथ सदुपयोग किया। अपनी समाजवादी पहचान बनाए रखते हुए इंदिरा गांधी के खेमे के प्रवक्ता बने। केंद्रीय मंत्रीमण्डल में शामिल करने के प्रस्तावों को खारिज करके उन्होंने किसी को भी अपनी कीमत लगाने का मौका नहीं दिया। इससे श्रीमती इंदिरा गांधी को भी उन्हें अपना दरबारी बनाने की कोशिश छोड़नी पड़ी। श्री चंद्रशेखर ने जरूरत पड़ने पर श्रीमती इंदिरा गांधी को भी अपनी महत्ता का एहसास कराया। शिमला में कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी समिति की सदस्यता के चुनाव में इंदिरा गांधी की मर्जी के खिलाफ उतरे और जीते। राज्य सभा में १९७४ में उत्तर प्रदेश से इंदिरा गांधी की सहमति के बगैर विजयी हुए। बिहार आंदोलन के नाजुक मोड़ पर जयप्रकाश नारायण से कांग्रेसी सांसदों की चाय पर मुलाकात के लिए उन्होंने किसी से इजाजत की जरूरत नहीं समझी। चुनावी राजनीति में चौतरफा असफलता मिलने पर हतप्रभ होकर निष्क्रिय होने की बजाय नयी पीढ़ी के भरोसे कन्याकुमारी से दिल्ली की भारत यात्रा पर निकल पड़ना उनकी समझदारी का बेहतरीन नमूना साबित हुआ।
यह गुण उन्हें आचार्य नरेन्द्रदेव से मिला था. आचार्य जी की तरह वह राजनीति में ‘अल्पकालीन’ व ‘दीर्घकालीन और ‘क्षणिक’ और ‘शाश्वत’ के अंतर को जानते थे। नरेन्द्रदेव जी अल्पकालीन सुख को दीर्घकालीन संतोष के लिए को तैयार रहते थे। इसीलिए असहयोग आंदोलन के आवाहन पर फैज़ाबाद में वकालत छोड़कर बनारस में राष्ट्रीय शिक्षा के लिए गांधीजी की प्रेरणा से श्री शिवप्रसाद गुप्त द्वारा स्थापित काशी विद्यापीठ में शिक्षक बने. काशी विद्यापीठ में उनके विद्यार्थियों में अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद और प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री शामिल थे. आचार्य नरेन्द्रदेव को अपना प्रेरणा स्त्रोत माननेवाले में अपार धीरज था. इसलिए उन्होंने किसी के भी साथ छोड़कर चले जाने पर भला-बुरा नहीं कहा। श्री चंद्रशेखर विश्वासघात की पीड़ा महसूस करते थे लेकिन विश्वास तोड़ने वाले को लेकर हर किसी से दुःख साझा करना अपने को छोटा बनाने की नादानी मानते थे। वह राजनीति को संभावनाओं का खेल समझते थे। लेकिन हर मौके पर कूद पड़ने की प्रवृत्ति नहीं थी. अधीरता और असफलता को एक दूसरे से जुड़ा देखते थे. अपने दायरे में सक्रिय लोगों की कमजोरियां जानते हुए उन्होंने अपने सहयोगियों के गुणों का सदुपयोग किया। जब चूक हो हो गई तो उससे सबक भी लिया। यह अलग बात रही कि कुछ मामलों में भूल सुधार की गुंजाइश नहीं थी।
9) भारतीय राजनीति की पहली कतार में आधी शताब्दी की अपनी सक्रियता के दौरान श्री चंद्रशेखर ने अनगिनत सहयोगियों की मदद की. उनको ‘दोस्ती निभाने वाले नेता के रूप में माना जाता था. श्री बीजू पटनायक, श्री शरद पवार, श्री श्रीधर महादेव जोशी, श्री चंद्रजीत यादव, श्री अटलबिहारी वाजपेयी, श्री रबि राय, श्री राजेश्वर राव, श्री रामकृष्ण हेगड़े, श्री रामधन, श्री लालूप्रसाद यादव, श्री रामसुंदर दास, श्री रामविलास पासवान, श्री देवगौड़ा, श्री इंद्रकुमार गुजराल, सय्यद शहाबुद्दीन, श्री मुलायम सिंह यादव, श्री ओमप्रकाश चौटाला, श्री प्रकाश सिंह बादल, डा. फारूक अब्दुल्ला, श्री भैरोसिंह शेखावत, भाई वैद्य, इंदूभाई पटेल, यशवंत सिन्हा और श्री जार्ज फर्नांडीज से उनकी विशेष निकटता बनी। उन्होंने अपने वरिष्ठ सहयोगियों विशेषकर श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री मोरारजी देसाई, श्री चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम, चौधरी देवीलाल, श्री राजनारायण, श्री कर्पूरी ठाकुर, श्री मधु लिमये, श्री ज्योति बासु और श्री इ. एम्. एस. नम्बूदिरीपाद के साथ शिष्टाचार निभाया।
लेकिन उनको नयी पीढ़ी के साथ नयी पहल करने में विशेष रुचि थी. इसका सबसे बड़ा अवसर भारत यात्रा के दौरान मिला। हजारों युवक-युवतियों के वह सहज मार्गदर्शक बने. देश के १५ क्षेत्रों में सघन रचनात्मक कार्यों को अपनी देखरेख में शुरू कराया। पार्टी की समितियों से लेकर विधानसभा और संसद की सदस्यता के लिए उनकी प्राथमिकता नयी पीढ़ी के लोग थे.
इससे सुधींद्र भदौरिया, रामजीलाल सुमन, दिग्विजय सिंह, मेनका गांधी, भक्तचरण दास, अंजना प्रकाश, सुबोधकांत सहाय और नितीश कुमार से लेकर ओमप्रकाश सिंह, भरत सिंह, बी. एल. शंकर, जीवराज अल्वा, जयप्रकाश हेगड़े, सुकेतु शाह, रोजलिन, सूर्यकुमार, सुंदरलाल सुमन और राकेशधर त्रिपाठी को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला।
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