राज्य सम्मेलन के दूसरे दिन संगठनात्मक मजबूती और जनसंघर्षों को तेज करने का आह्वान

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On the second day of the State Conference, a call issued to strengthen the organization and intensify mass struggles.

लुगू बुरु घंटाबाड़ी धोरोम गढ़, ललपनिया (गोमिया, बोकारो) में 13–14 अप्रैल 2026 को आयोजित झारखंड जनाधिकार महासभा राज्य सम्मेलन के दूसरे दिन के विमर्श और निष्कर्ष में यह बात मजबूती से उभरकर सामने आई कि हिंदुत्व के सांप्रदायिक और सांस्कृतिक हमलों के विरुद्ध झारखंडियत के मूल मूल्यों को और सशक्त करना होगा। 14 अप्रैल को सम्मेलन की शुरुआत आंबेडकर जयंती के अवसर पर डॉ. आंबेडकर को पुष्पांजलि अर्पित कर तथा संविधान की प्रस्तावना को पढ़कर और सामूहिक रूप से दोहराते हुए की गई। वक्ताओं ने आंबेडकर के संघर्षों को याद करते हुए कहा कि जहां आंबेडकर ने 1927 में पानी के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी, वहीं गांधी ने नमक सत्याग्रह किया। साथ ही यह भी रेखांकित किया गया कि केवल ‘जय भीम’ और ‘जय जयपाल’ के नारे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इन्हें जमीनी स्तर पर उतारना होगा।

आज के सत्र में संगठनात्मक मुद्दों और महासभा को मजबूत करने पर विस्तार से चर्चा हुई। साथ ही हेमंत सरकार से चुनावी वादों पर तुरंत कार्रवाई की मांग को लेकर 10 प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाई गई| मुख्य मांगे: भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून (2017) और लैंड बैंक नीति को रद्द करने, विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग के गठन, पेसा कानून के पूर्ण क्रियान्वयन, वन अधिकार दावों पर बिना कटौती पट्टा देने, भूमिहीन दलितों को भूमि व प्रमाण पत्र देने, स्थानीयता नीति लागू करने, मॉब लिंचिंग के खिलाफ कानून बनाने, आंगनबाड़ी व मध्याह्न भोजन में अंडे सुनिश्चित करने, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में बढ़ोतरी तथा विचाराधीन कैदियों की रिहाई और फर्जी मामलों की वापसी जैसी मांगें प्रमुख रहीं। सम्मेलन में रमेश जेराई, जेम्स हेरेंज, अफजल अनीस, मंथन, एलिना होरो, टॉम कावला, सिराज, मनोज भुइयां, सुरेंद्र सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

सम्मेलन के माध्यम से जल-जंगल-जमीन, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए व्यापक एकजुटता को मजबूत करने का आह्वान किया गया। वक्ताओं ने पूंजीपतियों की लूट और आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाई तथा अमीरों पर कर बढ़ाकर जनहित में संसाधनों के उपयोग की बात रखी। साथ ही एसआईआर की अलोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, लाखों लोगों के मतदान के अधिकार पर खतरे, परिसीमन, विचाराधीन कैदियों की स्थिति और असहमति को दबाने के लिए एफआईआर के दुरुपयोग के खिलाफ अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। यह भी उभरकर सामने आया कि आंदोलनों की उपलब्धियों, पेसा संघर्षों और आदिवासी सांस्कृतिक, खाद्य एवं ऐतिहासिक विरासत का दस्तावेजीकरण और संरक्षण बेहद जरूरी है। महासभा में युवा भागीदारी और नए विचारों को जोड़कर संगठन को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया। अंत में, झारखंड जनाधिकार महासभा ने इन सभी मुद्दों पर संघर्ष को और तेज करने का संकल्प दोहराते हुए झारखंड के सभी नागरिकों से एकजुट होकर समानता, लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने का सशक्त आह्वान किया।


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