
बाबा साहेब अम्बेडकर की 14 अप्रैल को जयंती पर हर साल उनके अनुयायी उनके जन्मस्थल भीम जन्मभूमि डॉ. अम्बेडकर नगर, मध्य प्रदेश, बौद्ध धम्म दीक्षास्थल दीक्षाभूमि, नागपुर, उनके समाधि स्थल चैत्य भूमि, मुंबई जैसे कई स्थानीय जगहों पर उन्हें अभिवादन करने लिए एकत्र होते हैं. सरकारी दफ्तरों और भारत के बौद्ध-विहारों में भी अम्बेडकर की जयंती मनाकर उन्हें नमन किया जाता है.ध्यान रहे कि गूगल ने डॉ. अम्बेडकर जी की 124वीं जयंती 2015 पर अपने ‘गूगल डूडल’ पर उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें अभिवादन किया था तीन देशों में यह डूडल था.
पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने भी डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई थी, जिसमें 156 देशों के प्रतिनिधि यों ने भाग लिया था.संयुक्त राष्ट्र नेे डॉ. भीमराव आंबेडकर को विश्व का प्रणेता कहकर उनका गौरव किया. संयुक्त राष्ट्र के 70 वर्ष के इतिहास में वहाँ पहली बार किसी भारतीय व्यक्ति का जन्मदिवस मनाया गया था. उनके अलावा विश्व में केवल दों ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी जयंती संयुक्त राष्ट्र ने मनाई हैं – मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला. आंबेडकर, किंग और मंडेला ये तीनों लोग अपने अपने देश में मानवाधिकार संघर्ष के सबसे बड़े नेता के रुप में जाने जाते हैं.
बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर और डा0 लोहिया चाहते तो अपनी मेधा और मेघा द्वारा अर्जित विद्वता का प्रयोग कर सुखमय जीवन जी सकते थे, लेकिन दोनों ने देश-सेवा और समाज सुधार की कठिन राह चुनी और समूचा जीवन सतत संघर्ष में होम कर दिया। लोहिया की स्पष्ट मान्यता थी कि राजनीति व लोकजीवन में सिद्धान्त से बड़ा कुछ भी नहीं होता, सत्ता और सिद्धान्त में उन्हें जब भी किसी एक को चुनना पड़ा तो उन्होंने सिद्धान्त को चुना। बाबा साहब के सामने भी जब कभी सत्ता या सिद्धान्त में से किसी एक को चुनने का प्रश्न आया, उन्होंने सिद्धान्त का दामन थामा। उन्होंने हिन्दू-बिल के पश्चात देश का विधि मंत्री पद को छोड़ने में पल भर की भी देरी नहीं की। दोनों लोकसभा के चुनाव लड़े, प्रारम्भिक दो चुनाव दोनों हारे। किन्तु जीत के लिए जाति, धन, लोकलुभावन कारकों और अन्यान्य साधनों का प्रयोग नहीं किया।
बाबा साहब की सोच के अनुरूप लोहिया ने संसद को आम जनता के दुःख,दर्द का दर्पण बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और सफल रहे। दोनेां के दुःख और दुर्भाग्य भी एक जैसे रहे। बाबा साहब की तरह डा0 लोहिया भी बाल्यावस्था में ही माँ के आंचल से महरूम हो गए। बाबा साहब की माँ भीमाबाई का देहान्त 1896 में हुआ जब वे मात्र पांच वर्ष के थे, इसी तरह डा0 लोहिया मात्र ढाई वर्ष की अवस्था में मातृहीन हो गए। बाबा साहब के साथ के आम बच्चे जहाँ छुआछुत के आगे सर झुका लेते थे, वहीं आम्बेडकर छूआछूत के विरुद्ध आवाज उठाते थे, यथासम्भव लड़ते थे। हर मोड़ पर लड़े, सवाल खड़े किए। उपेक्षा व अवहेलना को शान्त होकर नहीं सहा। उन्होंने अपनी निजी पीड़ा को अपनी जाति व जमात की पीड़ा में जोड़ कर देखा। लोहिया ने भी जहाँ विभेद देखा खड़े हुए। वे अंग्रेजों से लड़े, उनके झूठ का कदम-कदम पर पर्दाफाश किया।
दोनों ने उच्च शिक्षा विदेशों में ग्रहण की। दोनों की पारिवारिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनके पिता उन्हें अमरीका या यूरोप में पढ़ा सके। आम्बेडकर ने जहाँ सयाजी राव गायकवाड़ को ज्ञान से प्रभावित कर वजीफा हासिल कियि और अमरीका में पढ़ाई पूरी की। वहीं लोहिया ने बंगाल के मारवाड़ियों से धन अर्जित कर यूरोप गए।
आम्बेडकर ने अमरीका से लौटने के बाद महाराज कोल्हापुर की मदद से मूकनायक का प्रकाशन किया ताकि उपेक्षा का दंश झेल रहे दलितों की मूक-वाणी को लेखनी के माध्यम से बुलंद किया जाय। परिवार चलाने के लिए आम्बेडकर ने नौकरी भी की। बड़ौदा रियासत में सैन्य सचिव बने, जहां उन्हें दलित जाति का होने का दंश प्रतिदिन मिला। उन्हीं का चपरासी उन्हें फाइल दूर से मेज पर फेंक कर देता था ताकि फाइल देते समय स्पर्श न हो जाए। उनकी सारी विद्वता महार जाति का होने के कारण निष्प्रयोज्य थी।
‘‘
बाबा साहब और लोहिया में कई गुण समान रूप से विद्यमान थे। दोनों प्रथम कोटि के लेखक, वक्ता, चिन्तक, संपादक और संगठक थे। बतौर लेखक लोहिया ने आम्बेडकर की भांति समाज की विकृतियों पर खूब लिखा। दोनों के लेखन में ऐतिहासिकता और विश्लेषणात्मक गवेषणा की अनुपम छटा मिलती है, दोनों ने जिस भी सामाजिक समस्या पर लेखन किया, उसके सभी पहलुओं को स्पर्श किया, न केवल समस्या के कारणों का विवेचन किया अपितु उनका सैद्धान्तिक व व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत किया चाहे वह जाति की समस्या हो या आर्थिक विषमता हो।
वे समाज व समसामयिक घटनाओं पर पैनी निगाह रखते थे। उन्होंने जाति, किसान, पाकिस्तान, गांधी, भाषा, भाषाई राज्य, साम्प्रदायिकता, विश्व की समस्याओं, रुपए की समस्या सदृश विषयों को चुना और अपनी राय समग्र रूप में रखा।
बाबा साहब ने अपनी बात कहने के लिए पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जिसमें मूकनायक, बहिस्कृत भारत, समता व प्रबुद्ध भारत को काफी प्रसिद्धि मिली। उन्हीं के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए लोहिया ने भी जन, मेनकांइड, कृषक, कांग्रेस-सोशलिस्ट, इंकलाब जैसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन व संपादन किया। सभी जानते हैं कि 1942 में लोहिया ने भूमिगत-जीवन के दौरान गुप्त-रेडियो का प्रयोग अपनी बात जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए किया करते थे। लोहिया की ही भांति बाबा साहब ने भी जनमत बनाने के लिए रेडियो का प्रयोग किया। नवम्बर 13, 1942 को रेडियो से प्रसारित उनका भाषण अद्भुत था, जिसने लाखों श्रोताओं को सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि अस्पृश्यता मिटाये बिना भारत का कल्याण सम्भव नहीं है। दोनों महान संगठक थे, दोनों ने स्थापित संगठन अथवा राजनीतिक दल में काम करने की बजाए नए संगठन का गठन किया। आम्बेडकर ने बहिस्कृत समाज, मई-जून 1929 में समता समाज संघ व समता सैनिक संघ, अगस्त 1936 में आजाद मजदूर पार्टी (Independent Labour Party) शेड्यूल कास्ट फेडरेशन (जुलाई 1942), पीपुल्स एज्यूकेशनल सोसाइटी (जुलाई 1945) व अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ गठित कर एक व्यापक सांगठनिक आधार बनाया। इसी तरह लोहिया ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, आजाद दस्ता, किसान पंचायत, सभा, गण सेना, भूमि सेना, अन्न सेना आदि के बैनर के तले लोगों को संगठित किया।
बाबा साहब सिंचाई के पानी पर लगने वाले कर को आधा करना चाहते थे। अगस्त 07, 1937 को बाबा साहब के मार्गदर्शन में आम्बेडकर दल के इंडिपेण्डेंट लेबर पार्ट का बीस सदस्यीय शिष्टमंडल महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंप कर सिंचाई कर आधा करने की मांग की। लोहिया जी ने 1954 में आबपाशी (सिंचाई-दर) बढ़ाने के विरोध में उत्तर प्रदेश में सत्याग्रह का आह्वान किया। इस आंदोलन में कई सत्याग्रहियों के साथ मात्र 15 वर्ष की अवस्था में मुलायम सिंह यादव ने गिरफ्तारी दी थी। आम्बेडकर के सत्याग्रह के 75 वर्ष और लोहिया के आबपाशी आंदोलन के 58 साल बाद जब उत्तर प्रदेश में लोहिया के शिष्य मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। अखिलेश यादव, के मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार में शिवपाल सिंह यादव सिंचाई मंत्री बने। उन्होंने पहला काम सिंचाई का पानी निःशुल्क किया। इस काम से यकीनन लोहिया व बाबा साहब की रुह को सुकून मिला होगा। लोहिया ने समाज में व्याप्त सामाजिक विषमता के विरुद्ध कई ठोस और सगुण कार्यक्रम दिए जिसमें ‘‘जाति तोड़ो अभियान’’, ‘‘दलित मंदिर प्रवेश’’ जैसी गतिविधियां उल्लेखनीय हैं। लोहिया के शिष्य व प्रख्यात समाजवादी नेता तथा भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव हराने वाले लोकबन्धु राजनारायण अपनी समाजवादी टोली के साथ दलितों को काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश कराने की कवायद में काफी चोटिल हुए। दिसम्बर 1957 में लोकबन्धु और दलितों के मंदिर में प्रवेश की घटना की पृष्ठभूमि लोहिया ने आम्बेडकर के महाड़ व वीरेश्वर सत्याग्रह (11 मार्च 1924) के विस्तार के रूप में बनाई थी। लोहिया ने 8 अगस्त 1956 को समाजवादियों से 1 अक्टूबर 1956 को वाराणसी में एकत्र होकर दलितों को मंदिर में प्रवेश कराने वाली समिति का साथ देने का आग्रह किया। आम्बेडकर की मृत्यु के साल भर के भीतर लोहिया व लोकबन्धु दलितों के मंदिर में प्रवेश के आंदोलन को नया आयाम देने और वहां पहुंचाने में सफल हुए जहाँ बाबा साहब पहुँचाना चाहते थे। लोहिया की तरह बाबा साहब भी अपने बाद के अनुयायियों की तरह सम्यक व सही रूप में प्रतिपादित नहीं हुए। उनके अनुयायियों ने बाबा साहब के दलितोत्थान तथा ब्राम्हणवादी शोषण के विरोध को ब्राम्हण विरोध व सत्ता प्राप्ति के साधन तक संकुचित कर दिया।
लोहिया और आम्बेडकर कार्यकर्ताओं के शिक्षण-प्रशिक्षण के पक्षधर थे। लोहिया के प्रशिक्षण शिविरों में कार्यकर्ताओं को पढ़ाई-लिखाई व संवाद करने के तौर-तरीके भी सिखाये जाते थे। आम्बेडकर का कथन ष्हमारी उन्नति तभी हो सकती है जब हम खुद को पहचानें, वाणी में विनम्रता और बात में बल होना चाहिए, स्वयं को विचारों से सुसंस्कृत करें।
दोनों लोकतंत्र में गहरी आस्था रखते थे। दोनों ने अधिकार और कर्तव्य को एक दूसरे से जोड़ कर देखा। दोनों ने कभी भी अपने अभिमत के आगे किसी अन्य प्रभाव को स्वीकार नहीं किया। अलोकप्रिय होने और अलग-थलग पड़ने तक का जोखिम उठाया। एक समय ऐसा आ गया कि बम्बई में बाबा साहब को प्रस्तावक तक नहीं मिले। संविधान सभा की सदस्यता के लिए उन्हें बंगाल कूच करना पड़ा और लोहिया को उन्हीं की सोशलिस्ट पार्टी से निकाल दिया गया पर दोनों ‘‘फीनिक्स’’ की भाति पुनः उठ खड़े हुए।
पाकिस्तान व भारत की एका पर भी दोनों के विचार समान थे। आम्बेडकर ने ‘‘Pakistan or partition of India’’ में लिखा है ‘‘मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि भले ही आज मुस्लिम लीग भारत विभाजन के लिए कमर कस चुकी है, परन्तु वह दिन जरूर आएगा जब मुसलमान भी सोचेंगे कि अखण्ड भारत सबके लिए हितकर है। भारत-पाक महासंघ के सबसे बड़े हामी लोहिया और समाजवादी दल रहे हैं। भारत-पाक विभाजन के कुछ ही दिन के भीतर लोहिया ने नई दिल्ली स्थित गोल मार्केट के पार्क में एक सभा कर दोनों देशों के एकीकरण का प्रस्ताव पारित किया, जिसकी शिकायत पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी से की। 1963 में लोहिया ने भारत-पाक महासंघ की अवधारणा दी। आज दोनों देशों की प्रबुद्ध जनता महसूस कर रही है कि भारत-पाक की लड़ाई भी दोनों देशों के पिछड़ेपन के कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण है।
चीन और तिब्बत के मामले में लोहिया व आम्बेडकर की एक राय थी, दोनों चीन को साम्राज्यवादी मानते थे और दोनों ने पंडित नेहरू को अलग-अलग स्थानों पर चीन से सावधान रहने की सलाह दी थी। दोनों ने अन्तर्जातीय विवाह की खुली पैरवी की। आम्बेडकर का मानना था कि रक्त सम्बन्धों के कारण ही आत्मीयता की भावना होती है। यदि अन्तर्जातीय विवाह अधिकाधिक होते जाएं तो जाति के बंधन कमजोर हो जायेंगे। दोनों शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर गंभीर थे। लोहिया ने ‘‘समान शिक्षा नीति’’ का प्रतिपादन किया और ‘‘राष्ट्रपति का बेटा हो, या भंगी की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’’ जैसा मंत्र दिया, इसका मूल ध्येय यह था कि सभी तक शिक्षा समान गुणवत्ता और समभाव से पहुँचे। बकौल आम्बेडकर, समाज के सबसे शोषित और उपेक्षित व्यक्ति तक शिक्षा की सुविधायें पहुँचनी चाहिए। परंपरा से नकारे गए वर्ग को उच्च शिक्षा हेतु अधिक खर्च न करना पड़े ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
बाबा साहब और लोहिया, दोनों का धार्मिक चिन्तन भी कमोबेश एक-दूसरे के करीब है। दोनों ने धर्म को न्याय, मुक्ति, समानता और भाई-चारे की चालक शक्ति के रूप में देखा है। दोनों ने धार्मिक रूढ़ियों का सदैव विरोध किया। दोनों का धर्म अस्पृश्यता व मानवीय विभेद को नकारता था। दोनों धर्म को मानव की अंतरात्मा की मुक्ति का व्यक्तिगत प्रकरण मानते थे, वे मानते थे कि धर्म को असहायों और अपाहिजों की मदद करना चाहिए। दोनों के लिए धर्म परलोक की बजाय इहलोक की अवधारणा थी। दोनों भ्रष्टाचार को लोकतंत्र के लिए खतरनाक मानते थे। दोनों राजनीति के शीर्ष तक पहुँचे किन्तु धनार्जन व सम्पत्ति संचय नहीं किया। लोहिया तो ऐसे संत हुए जिसके पास अपनी कुटी तक नहीं थी।
अमरीका, लंदन, बर्लिन-बोन, बंबई, कलकत्ता, दिल्ली व हैदराबाद ये वे स्थान हैं जो दोनों के जीवन-मानचित्र पर उभयनिष्ठ हैं। हैदराबाद का ही उदाहरण ले लें । लोहिया ने अपनी सोशलिस्ट पार्टी का गठन 1955-56 में हैदराबाद में किया था, यहीं उनकी पत्रिकाओं का केन्द्रीय कार्यालय भी था। अपने जीवन का एक बड़ा कार्यकाल यायावर होते हुए भी उन्होंने हैदराबाद की वीथिकाओं में गुजारा था। बाबा साहब को हैदराबाद इतना पसंद था कि उन्होंने इसे देश की दूसरी राजधानी बनाने की सलाह दे दी। हैदराबाद को उन्होंने दिल्ली से भी बेहतर शहर बताया।
दोनों महात्मा गांधी का सम्मान करते थे लेकिन असहमति होने पर सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने से भी नहीं चूके। अगस्त 14, 1951 को काफी ज्वर के बाद भी आम्बेडकर गांधी से मिलने पहुँचे थे, यह उनका गांधी के प्रति सम्मानदृभाव प्रदर्शित करता है, लेकिन जहाँ-जहाँ उन्हें लगा कि बापू गलत हैं, खुलकर बोलने से नहीं हिचके। उस दौर में गांधी के विरुद्ध बोलने का मतलब राजनीतिक आत्महत्या करना था। सुभाष चन्द्र बोस प्रकरण इसका उदाहरण है। लोहिया ने महात्मा गांधी के लेख ‘‘सत्याग्रह अभी नहीं’’ के प्रतिकार स्वरूप लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था, ‘‘सत्याग्रह तुरंत।’’
दुनिया भर में व्याप्त असमानता से दोनों दुःखी थे। अक्सर बाबा साहब के आलोचक दबी जुबान से बाबा साहब की देशभक्ति पर सवाल उठाते हैं। सच्चाई यह है कि बाबा साहब की देशभक्ति लोहिया व अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तरह ही असंदिग्ध व स्फटिक की भांति साफ थी। महात्मा गांधी ने आम्बेडकर को ष्
‘दैदीप्यमान देशभक्त’ की संज्ञा उनकी देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति उनकी अप्रतिम सेवाओं को ध्यान में रखते हुए ही दी थी। यह सही है कि बाबा साहब उस तरह से जेल नहीं गए जिस तरह आचार्य नरेन्द्र देव, लोहिया-जेपी-नेहरु-मौलाना आजाद गए थे। इसका कारण स्पष्ट करते हुए बाबा साहब ने एक जगह लिखा है कि आजादी की लड़ाई में युवाओं की एक बड़ी फौज लगी हुई है, दलित युवाओं को चाहिए कि दलितों की गुलामी से लड़े। जो काम बाबा साहब और उनके समर्थक कर रहे थे। प्रकारान्तर से वह आजादी की लड़ाई का अहम अंग था। बाबा साहब की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों को उन्हें आम्बेडकर को पुनः पढ़ना चाहिए।
डा0 भीमराव आम्बेडकर और डा0 राममनोहर लोहिया के मध्य समानताओं की ओर केवल इशारा मात्र है, यदि सलीके से सादृश्यताओं पर लिखने बैठा गया तो हजारों पृष्ठों की मोटा ग्रन्थ भी कम पड़ेगा। लोहिया, आम्बेडकर की प्रासंगिकता आज उनके जीवनकाल से भी अधिक समीचीन प्रतीत होती है क्योंकि जिन विडम्बनाओं, विकृतियों व विषमता से दोनों लड़ते रहे वे आज भी हमारे सामाजिक व लोकजीवन में विद्यमान हैं।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.








