सामाजिक इंजीनियरिंग की अग्निपरीक्षा: बीजेपी के सामने बिहार का सवाल

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Samrat Choudhary

Parichay Das

— परिचय दास —

।।एक ।।

त्ता का गणित कभी सीधा नहीं होता। लोग हर बार उम्मीद करते हैं कि राजनीति कोई स्कूल की जोड़-घटाव है। “बीजेपी मुख्यमंत्री बना रही है तो वोट बैंक भी साथ आ जाएगा”—इतना आसान होता तो अब तक हर पार्टी अमर हो चुकी होती।

नीतीश कुमार का वोट बैंक कोई एकरंगी दीवार नहीं है जिसे उठा कर दूसरी जगह रख दिया जाए। वह कई परतों में बना हुआ है—अति पिछड़ा वर्ग (EBC), महादलित, महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा और कुछ हद तक अल्पसंख्यक वोट का एक सॉफ्ट कोना। अब सवाल यह है कि बीजेपी इस जटिल संरचना को अपने पक्ष में कैसे मोड़ेगी।

सबसे पहले समझिए कि बीजेपी की पारंपरिक ताकत क्या रही है। ऊँची जातियाँ, शहरी मध्यवर्ग और धीरे-धीरे कुछ पिछड़े वर्गों में विस्तार लेकिन नीतीश का वोट बैंक “सामाजिक इंजीनियरिंग” का वह मॉडल है जिसे उन्होंने वर्षों में गढ़ा है। यह मॉडल केवल जाति नहीं बल्कि भरोसे, प्रशासनिक छवि और “कम टकराव वाली राजनीति” पर टिका है।

अब बीजेपी के सामने पहली चुनौती यही है कि वह इस भरोसे को अपने नाम पर कैसे ट्रांसफर करे। भरोसा कोई बैंक अकाउंट नहीं है कि लॉगिन करके ट्रांसफर कर दिया। इसके लिए उन्हें तीन स्तरों पर काम करना होगा—नेतृत्व, नीतियाँ और सामाजिक संदेश।

नेतृत्व की बात करें तो बीजेपी के मुख्यमंत्री को नीतीश की तरह “संयमित” दिखना चाहिए। यह थोड़ा मजेदार है क्योंकि बीजेपी की राजनीति आम तौर पर आक्रामक शैली के लिए जानी जाती है लेकिन बिहार में वही फार्मूला नहीं चलेगा जो दूसरे राज्यों में चलता है। यहाँ अगर मुख्यमंत्री बहुत ज्यादा टकराव वाला हुआ तो नीतीश का सॉफ्ट वोट बैंक असहज हो जाएगा।

बीजेपी के मुख्यमंत्री को प्रशासनिक, संतुलित और “सबको साथ लेकर चलने” वाला दिखना चाहिए। वरना होगा यह कि कुर्सी मिल गई लेकिन वोट धीरे-धीरे खिसकने लगेंगे।

दूसरा बड़ा पहलू है—नीतियाँ। नीतीश कुमार की राजनीति में कुछ खास योजनाएँ थीं जो सीधे समाज के निचले तबकों को छूती थीं—साइकिल योजना, पोशाक योजना, शराबबंदी (चाहे सफल रही हो या नहीं), पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण। इन सबने एक “भावनात्मक पूंजी” बनाई है।

अब बीजेपी अगर सिर्फ सत्ता में आकर यह सोचती है कि “हम तो विकास की बात करेंगे, बस”—तो यह अधूरा खेल होगा। उसे इन योजनाओं को या तो जारी रखना होगा या उससे बेहतर विकल्प देना होगा। गरीब और पिछड़े वर्ग के वोटर को यह महसूस होना चाहिए कि सत्ता बदली है, लेकिन उनका जीवन और सम्मान सुरक्षित है।

तीसरा और सबसे पेचीदा हिस्सा है—सामाजिक संदेश। बीजेपी की छवि कई बार एक खास तरह की वैचारिक राजनीति से जुड़ी रहती है। यह छवि उसके कोर वोटर के लिए ताकत है लेकिन नीतीश के वोट बैंक के लिए सवाल भी खड़े करती है।

नीतीश ने हमेशा एक “मध्यमार्ग” अपनाया—न ज्यादा तेज, न ज्यादा नरम। बीजेपी को अगर उनका वोट बैंक चाहिए तो उसे अपने संदेश में संतुलन लाना होगा। बहुत ज्यादा ध्रुवीकरण की राजनीति करने पर अति पिछड़े और महादलित वर्ग असहज हो सकते हैं क्योंकि उनकी प्राथमिकताएँ रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी हैं, न कि वैचारिक संघर्ष से।

अब एक और दिलचस्प बात। वोट बैंक कभी पूरी तरह ट्रांसफर नहीं होता बल्कि “शिफ्ट” होता है। कुछ हिस्सा इधर आता है, कुछ उधर चला जाता है और कुछ घर बैठ जाता है। यानी बीजेपी को यह मानकर चलना होगा कि वह नीतीश का पूरा वोट बैंक नहीं ले सकती। उसे यह देखना होगा कि कौन-सा हिस्सा उसके लिए सबसे अधिक संभव है।

अति पिछड़ा वर्ग (EBC) इस खेल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वर्ग संख्या में बड़ा है और राजनीतिक रूप से लचीला भी। बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में इस वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाई है लेकिन यह पूरी तरह स्थिर नहीं है। अगर उसे स्थायी बनाना है तो स्थानीय नेतृत्व, पंचायत स्तर की पकड़ और निरंतर संवाद जरूरी होगा।

महिलाओं का वोट भी एक बड़ा फैक्टर है। नीतीश कुमार को महिलाओं का समर्थन इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने कुछ ठोस फैसले लिए जो सीधे उनके जीवन को प्रभावित करते थे।

बीजेपी अगर इस समर्थन को अपने पक्ष में लाना चाहती है, तो उसे महिला सुरक्षा, शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण पर लगातार काम दिखाना होगा। केवल भाषण से काम नहीं चलेगा, क्योंकि यहाँ वोटर काफी व्यावहारिक हो चुका है।

महादलित और गरीब तबकों में भी यही बात लागू होती है। उन्हें यह नहीं देखना कि मुख्यमंत्री किस पार्टी का है बल्कि यह देखना है कि उनके जीवन में क्या बदलाव आ रहा है। अगर बीजेपी इस स्तर पर डिलीवर करती है, तो धीरे-धीरे वोट बैंक खिसक सकता है।

यहाँ एक जोखिम भी है। अगर बीजेपी बहुत ज्यादा “अपने एजेंडे” को आगे बढ़ाने लगती है और नीतीश की संतुलित छवि से हटती है तो उल्टा असर भी हो सकता है। तब यह वोट बैंक किसी तीसरे विकल्प की तलाश में भी जा सकता है—चाहे वह क्षेत्रीय दल हों या नया गठबंधन। राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती। अगर एक पक्ष संतुलन खोता है, तो दूसरा तुरंत जगह भरने के लिए तैयार रहता है।

एक और परत है—संगठन की। बीजेपी का संगठन मजबूत है, लेकिन बिहार में जदयू का स्थानीय नेटवर्क भी कम नहीं रहा है। अगर बीजेपी को नीतीश का वोट बैंक चाहिए, तो उसे जदयू के पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को अपने साथ जोड़ना होगा। वरना ऊपर से गठबंधन रहेगा, नीचे से प्रतिस्पर्धा चलती रहेगी।

अब बात आती है “समय” की। वोट बैंक एक चुनाव में पूरी तरह नहीं बदलता। यह एक धीमी प्रक्रिया है। बीजेपी को लगातार 2-3 चुनावों तक एक ही रणनीति पर काम करना होगा। बीच में दिशा बदल दी, तो सारा काम फिर से शून्य पर आ जाएगा।

बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री बना लिया लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होने जा रही है। नीतीश कुमार का वोट बैंक कोई ट्रॉफी नहीं है जिसे जीतकर शेल्फ पर रख दिया जाए। यह एक जीवित, बदलता हुआ सामाजिक समूह है, जिसे समझना, संभालना और सम्मान देना पड़ता है।

राजनीति में सबसे कठिन काम यही है—लोगों को यह विश्वास दिलाना कि सत्ता बदली है लेकिन उनका महत्त्व नहीं बदला।

।। दो ।।

अब एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है—राजनीतिक कथा । वोट बैंक सिर्फ योजनाओं या जातीय समीकरणों से नहीं चलता, बल्कि एक कहानी से चलता है जिसमें लोग खुद को शामिल महसूस करते हैं। नीतीश कुमार ने अपने लिए “सुशासन बाबू” की कथा गढ़ी थी—कम बोलने वाला, काम करने वाला, संतुलित नेता।

अब भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह कौन-सी कहानी गढ़ेगी। अगर वह केवल “हम मजबूत हैं” वाली कहानी सुनाएगी तो यह बिहार के उस मतदाता को प्रभावित नहीं करेगी जो सुरक्षा से ज्यादा स्थिरता चाहता है। उसे एक ऐसा नैरेटिव बनाना होगा जिसमें विकास, सामाजिक न्याय और सम्मान तीनों एक साथ दिखें।

इसके साथ ही स्थानीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति का टकराव भी आता है। बीजेपी की ताकत राष्ट्रीय नेतृत्व है लेकिन बिहार की राजनीति अभी भी काफी हद तक स्थानीय समीकरणों पर टिकी हुई है। यहाँ सांसद का चेहरा नहीं बल्कि विधायक और पंचायत स्तर का व्यक्ति ज्यादा असर डालता है।

अगर बीजेपी सिर्फ राष्ट्रीय चेहरों के भरोसे चलती है तो नीतीश का वोट बैंक पूरी तरह शिफ्ट नहीं होगा। उसे स्थानीय नेताओं को मजबूत करना होगा—और यह काम उतना ही कठिन है जितना बिना शोर के पुल बनाना।

अब थोड़ा कड़वा हिस्सा—विश्वास का संकट। नीतीश कुमार की राजनीति में एक बात साफ रही कि उन्होंने खुद को “भरोसेमंद” नेता के रूप में पेश किया, भले ही गठबंधन बदलने पर लोग तंज कसते रहे। लेकिन जमीनी स्तर पर उनके समर्थकों को लगता रहा कि वह “हमारे आदमी” हैं।

बीजेपी के लिए यह सबसे बड़ा गैप है। उसे यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि इन वर्गों के दीर्घकालिक हित के लिए काम कर रही है। यह साबित करना घोषणाओं से नहीं, लगातार व्यवहार से होता है।

फिर आता है विपक्ष का फैक्टर। अगर विपक्ष बिखरा हुआ रहता है, तो बीजेपी के लिए काम आसान हो जाएगा। लेकिन अगर कोई मजबूत सामाजिक गठबंधन बनता है—जैसे पिछड़ा + अल्पसंख्यक + दलित—तो नीतीश का वोट बैंक सीधे बीजेपी के पास नहीं आएगा बल्कि उसका बड़ा हिस्सा उस गठबंधन में जा सकता है।

मतलब यह कि बीजेपी का खेल सिर्फ अपने प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि विपक्ष की कमजोरी पर भी निर्भर करेगा। राजनीति में जीत अक्सर अपनी ताकत से कम और दूसरे की गलती से ज्यादा मिलती है। थोड़ा निराशाजनक, लेकिन यथार्थ यही है।

अब जातीय गणित की बारी। बिहार में जाति को नजरअंदाज करने की कोशिश करना ऐसा है जैसे मानसून में छाता न लेकर निकलना।

कुर्मी-कोइरी (जिससे नीतीश आते हैं)
अति पिछड़ा वर्ग
महादलित

इन सबके बीच संतुलन बनाना ही असली खेल है। बीजेपी ने कुछ हद तक इसमें प्रवेश किया है, लेकिन अभी भी यह पूरी तरह उसका स्वाभाविक आधार नहीं बना है।

अगर वह इस आधार को मजबूत करना चाहती है तो उसे केवल चुनाव के समय नहीं बल्कि पूरे कार्यकाल में इन वर्गों के साथ जुड़ाव बनाए रखना होगा।

अब एक और दिलचस्प लेकिन कम चर्चा वाला पहलू—प्रशासनिक निरंतरता। नीतीश की एक पहचान “प्रशासन चलाने वाले” नेता की रही है। अगर बीजेपी की सरकार बनने के बाद प्रशासनिक ढाँचा अस्थिर होता है, या फैसले असंगत दिखते हैं, तो यह सीधे उस वोट बैंक को प्रभावित करेगा जो स्थिरता चाहता है।

लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि सरकार बदली है, लेकिन व्यवस्था नहीं टूटी। यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है क्योंकि हर नई सत्ता अपनी छाप छोड़ना चाहती है।

अब थोड़ा भविष्य की तरफ देखें। बीजेपी अगर सच में नीतीश का वोट बैंक अपने पक्ष में स्थायी रूप से लाना चाहती है तो उसे तीन चीजें लगातार करनी होंगी—

स्थानीय नेतृत्व का निर्माण
नीतियों की निरंतरता + सुधार
सामाजिक संतुलन बनाए रखना। इनमें से किसी एक में भी चूक हुई तो पूरा समीकरण हिल जाएगा।

सबसे जरूरी बात—वोटर अब पहले जैसा नहीं रहा। वह जाति देखता है लेकिन केवल जाति नहीं देखता। वह लाभ देखता है लेकिन केवल लाभ नहीं देखता। वह सम्मान चाहता है और यह सबसे मुश्किल चीज है देने के लिए क्योंकि इसे दिखाया नहीं जा सकता, महसूस कराया जाता है।

तो बीजेपी अगर यह सोच रही है कि मुख्यमंत्री बनते ही वोट बैंक लाइन लगाकर उसके पास आ जाएगा तो यह राजनीतिक कल्पना है।

उसे हर वर्ग को अलग-अलग समझना होगा, धीरे-धीरे भरोसा बनाना होगा और यह मानकर चलना होगा कि आधा रास्ता तय करने के बाद भी लोग मुड़ सकते हैं।

राजनीति में सबसे बड़ी गलती यही होती है—लोगों को “पक्का” मान लेना।
कोई पक्का नहीं होता, बस फिलहाल साथ होता है।


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