तोड़ने नहीं जोड़ने के लिए जाने जाएंगे चंद्रशेखर – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Chandra Shekhar

Arun Kumar Tripathi
चंद्रशेखर(पूर्व प्रधानमंत्री) जब सन 1964 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो रहे थे तो इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा कि वे कांग्रेस पार्टी में क्यों शामिल हो रहे हैं तो उनका कहना था कि मैं इसे समाजवादी बनाना चाहता हूं। इंदिरा गांधी ने कहा कि अगर समाजवादी नहीं बना पाए तो क्या करोगे, इस पर चंद्रशेखर का जवाब था कि मैं उसे तोड़ दूंगा। लेकिन अपने पांच दशक के राजनीतिक कार्यकाल में चंद्रशेखर अगर किसी कार्य या प्रयास के लिए सर्वाधिक जाने जाएंगे तो वह तोड़ने नहीं जोड़ने के लिए। निश्चित तौर पर 1969 में जब बंगलूर अधिवेशन के बाद कांग्रेस पार्टी टूटी तो उस अधिवेशन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए जो दस सूत्री समाजवादी प्रस्ताव पेश किए गए उसे तैयार करने में चंद्रशेखर की बड़ी भूमिका थी। जिसके तहत बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने और राजाओं के प्रीवी पर्स छीने जाने जैसे कई रेडिकल कदम उठाए गए थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्मशती पर उन्हें स्मरण करने के कई कारणों में सबसे बड़ा कारण यही है कि वे समाजवाद के रेडिकल सुधारों से अधिक समाज के साझेपन के ताने बाने को बचाने के लिए याद किए जाएंगे।

चंद्रशेखर, चंद्रजीत यादव, रामधन, मोहन धारिया और दूसरे साथियों के साथ लगभग एक दशक तक कांग्रेस के युवा तुर्क कहे जाते थे। तुर्की में 1908 में क्रांतिकारी पार्टी के सदस्यों के लिए प्रयोग होने वाले इस विशेषण का तात्पर्य उनसे था, जिन्होंने सुल्तान अब्दुल हमीद की सत्ता को पलट दिया था। भारत में वे लोग मोरारजी देसाई जैसे कांग्रेस के बूढ़े पूंजीवाद समर्थक नेताओं की जगह पर इंदिरा गांधी जैसी युवा नेत्री और समाजवादी सदस्यों को आगे लाने के पक्षधर थे। इन्हीं नीतियों पर चलकर इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति पद के कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हराकर वीवी गिरि को जितवाया था। लेकिन कभी समाजवाद के लिए कांग्रेस को तोड़ने वाले चंद्रशेखर ने जरूरत पड़ने पर कांग्रेस के टूटे धड़े और जनसंघ और देश के दूसरे दलों को एक साथ जोड़ने में संकोच नहीं किया। जब चंद्रशेखर को परिवर्तनकारी क्रांतिकारी धारा इंदिरा गांधी के कांग्रेस के बजाय जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति में दिखी तो वे उससे जुड़ गए। हालांकि चंद्रशेखर इस कोशिश में थे कि इंदिरा गांधी और जेपी के बीच कोई समझौता करा सकें। इस बारे में उन्होंने अपनी जेल डायरी में लिखा भी है।

लेकिन जनसंघ के नेता नानाजी देशमुख, रामनाथ गोयनका और दूसरे लोग इस कोशिश में लगे थे कि ऐसा कोई समझौता न हो पाए। इन लोगों ने इंदिरा गांधी के उस पत्र का अवमानना वाला अर्थ निकाला जो जेपी को बिहार आंदोलन के बारे में लिखा गया था। स्थितियां टकराव की ओर गईं और आपातकाल लगा। तब चंद्रशेखर ने सरकार के साथ रहने के बजाय जेल जाने का विकल्प चुना। जेपी से मिलने गए चंद्रशेखर को मीसा के तहत गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। वे आपातकाल के 19 महीने रोहतक, चंडीगढ़ और पटियाला के जेलों में रखे गए। इस दौरान चंद्रशेखर ने स्वाधीनता संघर्ष की परंपरा का निर्वाह करते हुए इन जेलों की पूरी लाइब्रेरी खंगाल डाली। उन्होंने विपुल विश्व साहित्य का विषद अध्ययन किया। दुनिया भर के क्रांतिकारियों का साक्षात्कार किया। इसका वर्णन उनकी जेल डायरी में मिलता है।

चंद्रशेखर की प्रतिभा और प्रतिबद्धता को देखते हुए ही जयप्रकाश नारायण ने उन्हें उस जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया जिस पर आपातकाल की अंधेरी कोठरी से निकली दूसरी आजादी की हिफाजत की जिम्मेदारी थी। जेपी ने किसी प्रकार दबाव डालकर विपक्ष के विभिन्न दलों को एकजुट करके चुनाव तो जितवा दिया था और जनता सरकार का गठन भी करा दिया था, लेकिन सबसे कठिन काम था उन्हें एक रखना। इस मार्ग में नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षा तो चुनौती थी ही लेकिन उससे बड़ी चुनौती थी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ की दोहरी सदस्यता। संघ के नेता बाला साहेब देवरस ने जेपी को आश्वासन दिया था कि वे सांप्रदायिक राजनीति छोड़ देंगे। इधर जनसंघ के तमाम नेताओं ने जनता पार्टी में शामिल होने के साथ उस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किए थे कि वे संघ के दैनंदिन कार्यक्रमों में नहीं जाएंगे और उससे किनारा कर लेंगे। यही शर्त थी जनसंघ को जनता पार्टी में पूरी तरह विलय करने की। इस काम में चंद्रशेखर लगे और उनके साथ राजनारायण भी थे। लेकिन हमेशा की तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपना वचन भंग किया।संघ की प्रतिनिधि सभा ने उस प्रस्ताव को अनुमोदित करने से मना कर दिया। चंद्रशेखर लिखते हैं, “मुझे उम्मीद थी कि देवरस अपना वह वचन निभाएंगे। लेकिन मुझे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के चरित्र पर हैरानी नहीं हुई।”
जनता पार्टी टूटने और सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखऱ अपने भाषणों में यही कहते घूमते थे कि मैं जहाज का कप्तान था। मुझे मालूम था कि जहाज डूब रहा है लेकिन मैं कैसे भागता। आखिर तक डटा रहा। उन घटनाओं से चंद्रशेखर दुखी हुए लेकिन निराश नहीं हुए। उन्हें भारत के जनगण की आंतरिक शक्ति पर गहरा भरोसा था। वे उनसे प्रेरणा पाने और उसे जगाने के लिए 1983 के आरंभ में ही कन्याकुमारी से राजघाट तक की यात्रा पर निकल पड़े। तकरीबन 4260 किलोमीटर की यह यात्रा 6 जनवरी को शुरू होकर 25 जून को आपातकाल की वरसी पर राजघाट पर पूरी हुई। यात्रा में उन्होंने न सिर्फ कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया बल्कि देश के तमाम मसलों पर खुलकर अपनी बात रखी। इसी दौरान तीन जून को पंजाब में स्वर्ण मंदिर पर आपरेशन ब्लू स्टार की कार्रवाई हुई जिसका चंद्रशेखर ने स्पष्ट शब्दों में विरोध किया और कहा कि देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। उनकी बात सच निकली और 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई।

अस्सी का दशक भारत में सांप्रदायिक राजनीति के मजबूत होने और हिंसक होने की शुरुआत थी। यही दौर था उन राजनीतिक समझौतों और सामाजिक ताने बाने को तोड़ने के प्रयास तीव्र हो गए थे जिन पर भारत टिका था। संघ परिवार की अखिल भारतीय एकात्मकता यात्रा और पूना समझौते के विरुद्ध कांशीराम की पूना से दिल्ली तक की यात्रा भी इसी समय हुई। चंद्रशेखर इस विभाजनकारी राजनीति से लड़ने के लिए अपनी शक्ति जुटा रहे थे। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद था वह कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया। चंद्रशेखर बलिया से चुनाव हार गए। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा था कि खालिस्तान बलिया में ही बनने वाला है।

चंद्रशेखर जाति और धर्म के आधार पर देश के राजनीतिक ध्रुवीकरण के कायल नहीं थे। वे आजीवन मार्क्सवादी रहे आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य थे और जयप्रकाश नारायण में उन्होंने परिवर्तनकारी लोकतांत्रिक राजनीति का सार्थवाह देखा था। इसलिए एक अलग राजनीतिक धारा विकसित करने में लगे थे जो लोकतांत्रिक भी हो और परिवर्तनकारी भी और जिसमें न सांप्रदायिक जहर हो और न जातिवादी। लेकिन सामने उठते झंझावात की दिशा उन्होंने पहचान ली थी और आखिरी चरण में उन्होंने अपनी भूमिका महज एक फायरब्रिगेड के रूप में देखी। जैसा कि कभी आइंस्टीन ने युद्ध के खतरों को देखते हुए कहा था कि समाजवाद से अधिक शांति कायम करना जरूरी है वैसा ही शायद चंद्रशेखर ने भी सोचा। जब वे वीपी सिंह को हटाकर प्रधानमंत्री बने और बीमार वीपी सिंह को अस्पताल में देखने गए तो उन्होंने कहा कि आप अपनी तबियत का ध्यान रखिए, क्योंकि आप ने देश को जहां पहुंचा दिया है वहां से वह जल्दी स्वस्थ होने वाला नहीं है। निश्चित तौर पर वीपी सिंह के कार्यकाल में मंदिर-मस्जिद का विवाद और मंडल आयोग पर हुआ ध्रुवीकरण जिस हद तक पहुंचा उसे देश आज तक झेल रहा है। चंद्रशेखर ने अपने कार्यकाल में उस आग पर पानी डालने का काम किया।

चंद्रशेखर ने पंजाब समस्या के समाधान का प्रयास किया और अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि के विवाद का भी हल निकालना चाहा। महज चार माह के प्रधानमंत्रित्व काल में उन्होंने दोनों पक्षों को समाधान के करीब ला भी दिया था। लेकिन आडवाणी ने अशोक सिंघल से कहा कि उन्हें मंदिर थोड़े ही बनाना है उन्हें तो दिल्ली में सरकार बनानी है। बाद में चंद्रशेखर को लगा कि समस्याओं की जड़ में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां हैं। वे उसके विरुद्ध उड़ीसा से गुजरात तक की यात्रा पर भी निकले। चंद्रशेखर सचमुच भारतीय राजनीति के अजातशत्रु थे। सबसे संवाद और सबको खरी खरी। लोहिया के शब्दों में कहें तो उनकी आंखों में एक ओर केरल तो दूसरी ओर त्रिपुरा रहता था। बलिया जिले के इब्राहीम पट्टी के गरीब किसान परिवार के इस बेटे पर कवि अवध बिहारी की कविता खूब फबती हैः—

बालक ओ नंगे पांव का।
बलिया के पिछड़े गांव का।।
गमछे में दाना खा रहा।
स्कूल पैदल जा रहा।।

हालांकि चंद्रशेखर ने अपनी गरीबी का न तो कभी गौरवगान किया और न ही उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया। उनकी खूबी थी राष्ट्र निर्माण की साहसिक दृष्टि के साथ गंवई स्पष्टवादिता। लेकिन चंद्रशेखर को किसी मजबूत राजनीतिक संगठन की कमी सदैव सालती रही। यही वजह थी कि समन्वयवादी परिवर्तन का यह राजनीतिज्ञ देश की नफरती खाइयों को पाटने में खो गया।


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