— शिवानंद तिवारी —
मशहूर फोटोग्राफर रघु राय नहीं रहे। 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
मैं रघु राय और उनकी फोटोग्राफी का जबरदस्त प्रशंसक रहा हूँ। पहली बार जिस तस्वीर ने मेरा ध्यान उनकी ओर खींचा, वह 1977 के लोकसभा चुनाव परिणामों से जुड़ी थी। उस समय उत्तर भारत में इंदिरा गांधी की पार्टी का लगभग सफाया हो गया था। उसी संदर्भ में दिल्ली से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार स्टेट्समैन के पहले पन्ने पर छपी उनकी एक तस्वीर आज भी मेरी स्मृति में ताजा है—एक सफाई कर्मी महिला झाड़ू लगा रही है, और झाड़ू पर सड़क किनारे पड़े इंदिरा जी का पोस्टर है, जिसे वह कचरे के डिब्बे में डालने के लिए उठाये हुए है. कचरे के डब्बे से सटे दिवाल पर परिवार नियोजन का नारा “हम दो, हमारे दो” लिखा था. लेकिन तस्वीर में रघु राय ने उसका सिर्फ़ “हम – हम” ही लिया था. अपने को ही सर्वस्व मानने वाले अहंकार के पतन का इससे बेहतर बयान शायद शब्दों में संभव नहीं था.
इसके बाद मैं लगातार रघु राय की तस्वीरों का प्रशंसक बना रहा। ताजमहल पर उनकी फोटो वाली किताब की दो-एक तस्वीर आज भी मेरे मन में अंकित हैं।
1974 के आंदोलन के दौरान पटना में जयप्रकाश नारायण के साथ जुड़ी उनकी एक तस्वीर दुनिया भर में छपी थी। जेपी पर लाठी चलने वाली उस तस्वीर में पुलिस चारों ओर से जेपी और उनके सहयोगियों को घेर रही है. एक लाठी उठी हुई है—जैसे वह जेपी पर गिरने वाली हो। आज़ादी की लड़ाई के एक नायक पर आज़ाद भारत में लाठी !
संयोग से मैं उस समय उसी भीड़ में मौजूद था. उनको पुलिस की लाठी नहीं लगी थी. लेकिन उस तनाव वाले माहौल में उनका कमजोर शरीर अपने को संभाल नहीं पाया और जेपी गिर पड़े थे। लोगों ने उन्हें सहारा दिया, पानी से उनका चेहरा धोया। बाद में लाठी वाली वही तस्वीर दुनिया भर में छपी थी और इतिहास का हिस्सा बन गई।
तीन चार वर्ष पहले वे रघु राय जी बिहार सरकार के एक कार्यक्रम में पटना आए थे. सरकार ने बिहार की संस्कृति और परंपरा पर आधारित फोटो वाली एक कॉफी टेबल किताब उनसे बनवाया था. उसीके विमोचन के लिए कार्यक्रम हुआ था। उस अवसर पर उन्होंने 4 नवंबर 1974 यानी जेपी पर लाठी वाली घटना का पूरा विवरण सुनाया था. कैसे वे फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, नानाजी देशमुख और अन्य साथियों के साथ एक खुली जीप में निकले थे, और धीरे-धीरे लोगों की भीड़ जुड़ती चली गई।
रघु राय सिर्फ एक फोटोग्राफर नहीं थे, वे एक संवेदनशील पत्रकार और समय के साक्षी थे।उनकी बोलने और घटनाओं की जीवंत कथा सुनाती तस्वीरें हमेशा उनकी याद दिलाती रहेंगी. शिवानन्द
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