— पंकज मोहन —
आजादी के कुछ वर्ष बाद बाबा नागार्जुन ने एक कविता लिखी थी:
“घुन खाये शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बांचे
फटी भीत है, छत चूती है आले पर बिसतुइया नाचे
बरसा कर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पांच तमाचे
इसी तरह दुखरन मास्टर गढ़ता है आदम के सांचे’
आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में भी मुझे समस्तीपुर में ठीक ऐसा ही स्कूल दिखा। सुबह में छोटे छोटे बच्चों से झाड़ू-बुहारू का काम लिया जा रहा था। कोरिया, चीन या इन्डोनेशिया जैसे एशिया के देशों ने साम्राज्यवादी प्रशासन से संघर्ष कर स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद समता के आदर्श पर ध्यान दिया। इन देशों में प्राथमिक शिक्षा (6-11 वर्ष की आयु) अनिवार्य और पूर्णतः निःशुल्क है, और प्राथमिक विद्यालय में नामांकन बच्चे के अभिभावक की इच्छा, आर्थिक सामर्थ्य और सामाजिक स्टेटस पर आधृत नहीं होता। बच्चों को उनके पंजीकृत पते के आधार पर स्वतः समीपवर्ती स्कूल में भेज दिया जाता है, और इसकी औपचारिक सूचना माता-पिता को दे दी जाती है — उन्हें कुछ करना नहीं पडता। भारत में एक ओर चिलचिलाती धूप में सडक पर पत्थर तोड़कर परिवार चलाने वाले दिहाड़ी मजदूरों की संतान के लिए झुग्गी-नुमा प्राथमिक विद्यालय हैं, तो दूसरी तरफ हाकिम-हुक्मरान और सेठ-साहूकार के बच्चे-बच्चियों के क्लास तरु-मालिका सज्जित “अट्टालिका प्राकार” में लगते हैं।
छोटे-से प्राथमिक विद्यालय में पढने वाले कुछ मेधावी गरीब बच्चे जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं, लेकिन अधिकांश बच्चे आजीवन सामाजिक और आर्थिक विषमता और अवमानना भुगतने के लिए अभिशप्त होते हैं। भारत के अधिकांश अधिकारियों के लिए गरीब और अशिक्षित/अल्पशिक्षित आम आदमी महत्वहीन होता है।
कुछ दिन पहले दुनियाभर की मीडिया ने जीतू मुंडा की खबर प्रकाशित की थी। उसकी बहन कालरा मुंडा जिसकी मौत जनवरी 2026 में हुई, के खाते में 19,400 रुपये जमा थे। मवेशी की बिक्री से मुंडा परिवार को जो रकम मिली थी, वही रकम ओडिशा ग्रामीण बैंक के कालरा मुंडा के खाते में जमा थी। जीतू मुंडा पैसे की निकासी के लिए बैंक गया, पर
बैंक के कर्मचारी ने कहा, बहन की मौत का प्रमाण लाना होगा। जीतू ने अपनी बहन के कब्र को खोदकर उसके अस्थि-पंजर को निकाला और उसे अपने कंधों पर लेकर बैंक के कर्मचारी के सामने हाजिर हो गया। निर्धन, निस्सहाय, निपट गंवार आदिवासी को मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त करने के विधि-विधान को समझाने के लिए धैर्य और करुणा की आवश्यकता होती है। परिवार और समाज ने यदि बैंक अधिकारी के अंदर सामाजिक समानता.और समरसता का बीजारोपन किया होता, तो म्युनिसिपल कार्पोरेशन के दफ्तर से मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त करने में सहायता प्रदान कर सकता था। भारतीय ब्यूरोक्रेशी का चरित्र मूलतः भ्रष्टाचार और ऊंच-नीच के भेदभाव से शिल्पित है, जबकि विकसित देश में ज्यादातर लोग निस्वार्थ सेवा और कर्मनिष्ठा की भावना के साथ अपनी कुर्सी पर बैठते हैं।
भारत के सत्तासीन दल के गुलाम बुद्धिजीवी यह दलील देते हैं कि “बहन ने अपनी जरूरत के लिए ही अपने खाते में बीस हजार रुपए रखे होंगे, तो मृत्योपरांत उसके भाई को क्यों चाहिए थे वो पैसे?” इनके हिसाब से बैंक का खाता खोलते समय में नॉमिनी (Nominee) का प्रावधान ही गलत है।
नये भारत में बुद्धिजीवियों की एक नस्ल उभरकर आई है। मैं NCERT और कुछ अन्य सरकारी संस्थाओं में सलाहकार की हैसियत से जब मीटिंग में भाग लेता था, तो DU, BHU आदि विश्वविद्यालयों से आये भगवाधारी सलाहकार कभी-कभी गलत को सही साबित करने के लिए ऐसे ऊटपटांग तर्क देते थे कि मैं माथा पीट लेता था। आजकल फेसबुक पर बंगाल के चुनाव की चर्चा हो रही है। कलकत्ता में रह रहे गैर-बंगाली कमल-छाप बुद्धिजीवी कमाल का तर्क दे रहे हैं। ऐसे लोग घुमा-फिराकर जो कह रहे हैं, उसका सीधा-सा मायने यह है कि जिनकी भाजपा में आस्था है, वे ही बंगाल की स्थानीय समस्याओं से अवगत होते हैं, वे ही अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। दूसरे लोग चुप रहें।
1929 में प्रकाशित “युवक कौन है” नामक लेख में प्रेमचन्द ने लिखा कि “विलासिता का दास, जरूरतों का गुलाम, स्वार्थ के लिए गधे को बाबा कहने पर तैयार” व्यक्ति “न जवान होता है न बूढा; वह मृतक है, जिससे न जाति का उपकार, न देश का भला हो सकता है।” पह सोलह आने सही बात है,, जो लोग सामाजिक भेदभाव और धार्मिक वैमनस्य में विश्वास करते हैं, सामाजिक समता के आदर्श के विरोधी हैं और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल अपनी पार्टी या अपनी सरकार की अनीति की लीपापोती में करते हैं, वे अपने देश को कमजोर कर रहे हैं।
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