सहजयान और सिक्खी का साझा : गुरु नानक देव की ‘सिद्ध गोष्ठी’

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chandra bhooshan

— चंद्रभूषण —

क पूरी तरह गेय ग्रंथ में- न केवल गाने योग्य, बल्कि पूरा का पूरा व्यवस्थित रागों ही में गाने के निर्देश के साथ संकलित-संपादित गुरु ग्रंथ साहिब में- उतनी अमूर्त दार्शनिक बहसें मौजूद होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जितने की आदत उपनिषदों और अन्य दार्शनिक ग्रंथों के प्रभाव में भारत के बौद्धिक दायरे में पड़ गई है। अमूर्तन और जटिलता के इस आग्रह को किनारे कर दें तो दार्शनिक बहसें गुरु ग्रंथ साहिब में भरी पड़ी हैं। गुरु अमरदास और गुरु अर्जुन देव ने कबीर और फरीद जैसे अति सम्मानित और खुद से सैकड़ों साल पुराने भगतों के कहे शबद में भी आई किसी धारणा के प्रति अपनी असहमति उसके नीचे लगभग उनके ही छंद में प्रस्तुत कर दी है।

जैसे, बाबा फरीद का प्रसिद्ध दोहा है- ‘फरीदा, तनु सूका पिंजरु थिआ, तलियां खूंढहि काग/ अजै सु रब न बाहुडिओ, देखु बंदे के भाग।’ (शरीर सूखकर कंकाल रह गया है, पसलियों में कौए चोंच मार रहे हैं, इतना सब करके भी रब से मिलना न हो पाया, जरा इस बंदे की किस्मत तो देखो।) इसके नीचे गुरु अमरदास का दोहा लिखा हुआ है- ‘अमरदासु कहै, काया कष्टु न कीजई, हरि सिउ रहहु समाइ/ सहजै ही हरि पाइए, गुरमुखि नामु धिआइ।’ (काया को कष्ट न दें। ईश्वर में ही समाए रहें। गुरु से उन्मुख होकर नाम का ध्यान करें, सहज ही ईश्वर-प्राप्ति होगी।)

बहरहाल, ऐसी बहसों का चरम है गुरु ग्रंथ साहिब के अंग (यानी पृष्ठ) 938 से 946 तक चलने वाली ‘सिद्ध गोष्ठी’, जहां गुरु नानक की सारी प्रस्थापनाएं उभरकर सामने आती हैं। रामकली राग में आने वाले इस हिस्से में गुरु नानक देव की बहस सिद्धों से है। और ये सिद्ध कौन से हैं, बहुत पहले भारत भूमि से अपना डेरा उठाकर नेपाल या तिब्बत में जा बसे बौद्ध, या मछिंदरनाथ की तरह शैव-शाक्त मिजाज के, या फिर नाथपंथी, इस बारे में अलग से यहां कुछ नहीं कहा गया है।

गोष्ठी के ब्यौरों में जाने पर ये नाथपंथ के ही करीब जान पड़ते हैं, जो सोलहवीं सदी के पंजाब को देखते हुए स्वाभाविक है। लेकिन अलग से उनकी पहचान रेखांकित करने का कोई प्रयास यहां नहीं किया गया है।

कुल 73 छंद ‘सिद्ध गोष्ठी’ में हैं, जिनमें एक तिहाई के आसपास हम यहां उदधृत करेंगे। किसी सिद्ध का नाम इसमें नहीं दिया गया है। पूरा हिस्सा गुरु नानक के ही शब्दों में है लेकिन कहन किसी गोष्ठी का ब्यौरा देने जैसी है। इसकी शुरुआत इस सूचना से होती है कि सिद्धों-संतों की सभा को प्रणाम करते हुए गुरु नानकदेव वहां प्रस्तुत हुए।

‘रामकली महला 1 सिध गोसटि
एक ओंकार सतिगुर प्रसादि॥

सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो॥
तिसु आगै रहरासि हमारी साचा अपर अपारो॥
मसतकु काटि धरी तिसु आगै तनु मनु आगै देउ॥
नानक संतु मिलै सचु पाईऐ सहज भाइ जसु लेउ॥’

इस औपचारिकता के बाद सिद्ध लोग पूछते हैं कि नानक बताओ, तुम्हारा मूल कहां है और तुम्हारे सिद्धांत क्या हैं?

सिध पूछहिं सुनि नानक बोलै॥
कवनु मूलु कवनु मति तुझि तोलै॥

जवाब में वे इतना ही कहते हैं कि अहंकार का रोग जाने से सुख होता है और जो गुरु के मुख से (या उनके सम्मुख रहते हुए) सारी चीजों को समझने का प्रयास करता है वह सब कुछ समझ लेता है।

हउमै रोगु गइआ सुखु होइ॥
गुरमुखि बूझै सो जनु होइ॥

फिर सिद्ध लोग साधना के चरम उद्देश्य पर आते हैं। यह कि ‘नानक, आप ब्रह्मज्ञान कैसे प्राप्त कर सकेंगे?’

कहहिं सिद्ध सुनहु रे नानक॥
किउ करि पाइऐ ब्रह्म गिआनक॥

इसका जवाब भी बहुत सरल है। ‘गुरु से उन्मुख होकर विरक्ति खोज रहा हूं। सत्य मेरे हृदय में आ बसा है।’

गुरमुखि खोजत महु उदासी ॥
सचु वसै मन आइ निवासी ॥

अब सिद्धजन योग पर आते हैं, जिसके बिना- उनकी समझ के मुताबिक- मुक्ति संभव ही नहीं हो सकती। ‘योग क्रिया आप कैसे करते हैं? इसके बिना तो संसार से आसक्ति छूट ही नहीं सकती।’

जोगु कइआ कइसे होई॥
किउ छूटै संसारु न सोई॥

इस सवाल का गुरु नानक देव जरा लंबा जवाब देते हैं। उनके जवाब से स्पष्ट है कि उनका सामना नाथपंथी योगियों से ही है। लेकिन साथ में एक बात और जुड़ी है। यह कि उनका सामना वैसे योगियों से नहीं हुआ है जो उनसे एक पीढ़ी पहले हो गए कबीर को आतंकित कर चुके थे- ‘ऐसा जोग न देखा भाई, भूला फिरै लिए गफिलाई… नारद कब बंदूक चलावा, व्यासदेव कब बंब बजावा।’ (बीजक, रमैनी-66)

यहां दोनों पक्ष शालीन हैं। सिद्धजन अपनी उत्सुकता नानक के सामने रख रहे हैं और वे बिना किसी कटुता के जवाब दे रहे हैं। योग के बारे में वे कहते हैं कि ‘कंथा (गुदड़ी, पैबंद लगा कपड़ा) योग नहीं है। जो डंडा लेकर आप लोग घूमते हैं वह योग नहीं है। पूरे शरीर में भस्म पोते रहना योग नहीं है। सिर मुंड़ाना योग नहीं है और सिंगी बजाना भी योग नहीं है।’

जोगु न खिंथा जोगु न डंडै॥
जोगु न भसम चढ़ाइऐ अंडै॥
जोगु न मुण्डी मूंडि मुडाइऐ
जोगु न सिंगी वाइऐ॥

यहां से आगे सिद्धों का सवाल है कि यह सब योग नहीं है सो तो ठीक है लेकिन ‘घर में रहकर भला योग कैसे प्राप्त किया जा सकता है? क्या त्याग के बिना किसी का भोग छूट सकता है?’

घरि रहि कै किउ पाइऐ जोगु॥
बिनु त्यागे किउ छूटै भोगु॥

गुरु नानक का जवाब इस बार भी लंबा है। ‘घर में रहते हुए विरक्त रहा जाए। सत्य नाम को सहज ही प्राप्त किया जाए। सहज शब्द में लौ लगाकर घर के भीतर ही आत्मिक घर भी देखा जाए। योग और भोग, दोनों ही मन की चीजें हैं और सहज का सौंदर्य भी मन में ही है। मन को शून्य समाधि में रत किया जाए।’

घर ही माहि उदासु रहै ॥
सहजे ही सचु नामु लहै ॥
घर ही भीतरि घरु दिखाइआ।
सहजि सबदि लिव लाई॥
अंतरि जोगु अंतरि भोगु।
अंतरि सहजु सुहाइआ॥
सुन्‍न समाधि सहजु मनि राता॥

यहां से आगे सिद्धों की भाषा शिष्य जैसी हो जाती है- ‘हे स्वामी, मन को वश में कैसे करें? माया का पाश कैसे टूटे?’

मनु कइसे बसि आवै नाथ॥
कइसे टूटै माया फाथ॥

जवाब में गुरु नानक मन के बारे में बहुत ऊंची राय रखते हैं- ‘मन कोई बंधन नहीं, प्रकाश है। अपना मूल पहचानो।’

मन तू जोति सरूपु है अपना मूलु पछाणु॥

फिर सिद्ध पूछते हैं- ‘वह गुरु कौन है, जिसने आपको दीक्षा दी है, और चेला कौन है, जिसने यह शिक्षा ली है? किसके शब्द ने आपको इतना स्थिर बना दिया है?’

कौनु गुरु जिसु दीजै दीख॥
कौनु चेला लेवै सीख॥
कवणु गुरु जिस का तू चेला।
किसु सबदि करहि तू अस्थिरु डेला॥

गुरु नानक का छोटा सा जवाब है- सब्दु गुरु सुरति धुनि चेला॥ (शब्द ही मेरा गुरु है और शब्द की धुन में लगी हुई चेतना उसका चेला है।)

सिद्धों के सवाल इससे आगे जाते हैं। वे पूछते हैं कि ‘जन्म-मरण से छुटकारा कैसे मिलेगा? अमर पद कैसे प्राप्त होगा?’

किउ करि छूटै जनमु मरनु ॥
किउ पाइऐ अमर पदु करनु ॥

नानक देव का जवाब है कि सत्य नाम जिसके मन में बसा रहे, उसे जन्म-मरण का कोई दुख नहीं होता।

सचु नामु वसै मन माहि ॥
जनमु मरनु दुखु नाहीं ताहि ॥

‘नानक, तुम्हारा तत्व विचार हमने सुन लिया, इस सत्य चिंतन को विस्तार से कहो।’

सुनि नानक तत्त्व विचारु॥ कहु सच्चा बीचारु अपारु॥

यहां से आगे सारी बातें गुरु नानक द्वारा अपने मत के प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करने जैसी हैं। कुछ बातें सहज पर हैं, जिन्हें समझने के लिए हमें आगे भी कुछ चर्चा करनी होगी। असल में सहज एक बहुअर्थी शब्द है और हर परंपरा में इसका अलग अर्थ है।

सुन्‍न समाधि सहजु मनि राता। तजि हउमै पावै ठाउ॥
सहजे ही सहज उपजै सहजै रहै समाइ ॥
सहजे आवै सहजे जाइ। मन ते उपजै मन माहि समाइ ॥

‘सहज मन से शून्य समाधि में लीन रहा जाए तो अहंकार से मुक्त होकर सही जगह पर पहुंचा जा सकता है। सहज से सहज उपजता है और (व्यक्तित्व में) वह सहज ही समाया रहता है। सहज ही आता है, सहज ही चला जाता है, मन से उपज कर मन में ही समा जाता है।’

अध्यात्म-दर्शन की इस चर्चा का चारो ओर फैले कड़वे सामाजिक यथार्थ से पहली नजर में कोई संबंध नहीं जान पड़ता। लेकिन गुरु नानक की आस्था ठोस यथार्थ पर टिकी हुई है लिहाजा शून्य समाधि, सहज और सत्य-नाम के बीच ही वे जाति पर भी एक गंभीर टिप्पणी करते हैं- ‘जाति का गर्व कोई न करे, सारी उत्पत्तियां ब्रह्म के बिंदु से हुई हैं।’

जाति का गरबु न करिअहु कोई,
ब्रह्म बिंद ते सभ उतपती होई॥

और अंत में, नानक का सिद्धों को यह संदेश कि-

नानक कहै सुनहु रे सिद्धो॥
सचु नामु बिनु कचु नाहीं॥
गुरमुखि होइ सोई जनु जाणै॥ अंतरि सचु समाणै॥

‘हे सिद्धो, नानक का यह कहना सुनो। सत्य-नाम के बिना कुछ नहीं। (सारी बहिर्मुख साधना व्यर्थ है।) ज्ञान और आंतरिक सत्य तक उन्हीं की पहुंच हो सकती है, जो गुरु से उन्मुख होकर इसके लिए प्रयास करते हैं।’

ऊपर हमने नानक देव के ‘सहज’ को समझने के लिए इसके बारे में कुछ चर्चा करने को कहा था, तो सबसे पहले सिद्ध सरहपा के ‘दोहाकोश’ में आए इस छंद को देखा जाए, जिसमें सहज की बारंबारता लगभग ऊपर उद्धृत ‘सिद्ध गोष्ठी’ के एक हिस्से जितनी ही है। नेपाल में मिले चर्यापद (चर्यागीतिकोश) में कुछ पद सरहपा के हैं जरूर, लेकिन यह वाला उसमें न होकर राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत में खोजे गए दोहाकोश में है।

सहजे सहजे सब कोई कहै,
सहज न चीन्है कोय।
सहजै ही जो सहज बुझै,
सहज कहावै सोय॥

कंथा, सिंगी, भस्म वगैरह से लगता है कि सिद्ध गोष्ठी में गुरु नानक देव की बहस मुख्यतः नाथ-सिद्धों से ही है, लेकिन इस पंथ के शीर्ष व्यक्ति, गुरु गोरखनाथ के यहां भी सहज का उपयोग बहुत अलग नहीं जान पड़ता- ‘सहजै रहिबा, सहजै गहिबा, सहजै करिबा जोग।’ (सहज रहना, (दुनियादारी को) सहज ढंग से पकड़ना और सहज तरीके से ही योग करना।)

यहां गौर करना जरूरी है कि गोरखनाथ के सहज और सरहपा के सहज में एक बुनियादी फर्क है। गोरख के यहां सहज एक विशेषण की तरह आ रहा है। जोर से पकड़ने, जटिलता की तरफ जाने के उलट हल्का पकड़ना, सरल रास्ते पर आगे बढ़ना। लेकिन सरहपा के यहां सहज दो अर्थों में आ रहा है। एक बार विशेषण की तरह और एक बार संज्ञा की तरह। वहां सहज खुद में एक चीज है, और गुरु नानक के यहां भी मामला ऐसा ही है।

जब नानक देव कहते हैं कि ‘सहज से ही सहज उपजता है’ तो इसमें पहला सहज एक विशेषण है जो साधना की सरल राह की ओर इशारा करता है। लेकिन इससे सहज नाम की जो चीज उपजती है वह कोई अलग अनुभव है, जिसकी बात वे यहां कर रहे हैं। यह बौद्ध अनीश्वरवादी सहजयानियों की खोजी हुई चीज है। बाद में वैदिक और अन्य ईश्वरवादी धाराएं इसको खींचकर ईश्वर के पाले में लेती गईं, फिर इसका किस्सा ही खत्म कर दिया। लेकिन नानक के यहां किसी तरह इसकी स्मृति बनी हुई है। वे स्वयं एक ईश्वरवादी चिंतक हैं। उनका धार्मिक केंद्रबिंदु ‘एक ओंकार’ निराकार ईश्वर ही है। लेकिन ‘सहज’ उनके यहां संज्ञा की तरह आने पर अलग अनुभव का अर्थ देता है।

अलबत्ता ऊपर जाति को लेकर आई गुरु नानक की उक्ति उनसे पांच सौ साल पहले हुए सहजयानी सिद्ध काण्हपा के यहां थोड़ा अलग तरीके से आई है- ‘किं तुहु ब्राह्मण किं तुहु चंडाल/ सहज स्वरूपे एक्क रसाल।’ (क्या तुम ब्राह्मण हो और क्या तुम चांडाल हो, सहज स्वरूप में तुम दोनों एक ही हो।) कुल पचास पदों के चर्यापद में सबसे ज्यादा, 13 पद काण्हपा या कान्हपा के ही हैं, हालांकि सहज को यहां विशेषण और संज्ञा दोनों तरह समझा जा सकता है।


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