
बहुत कम राजनेता आम जन में अपनी पैठ लंबे समय तक बनाई रख पाते हैं। वे यदि लंबी उम्र पा लेते हैं तो भी अपने जीवन में गुमनामी में खो जाते हैं। पंडित रामकिशन उन विरले नेताओं में हैं जो सौ वर्ष की आयु पा जाने के बाद भी पूरी ऊर्जा और गतिशीलता से सक्रिय हैं और लोगों में प्रिय बने हुए हैं। उनसे साक्षात्कार के आधार पर उनकी जीवन गाथा कहती सद्य प्रकाशित किताब ‘मैं ज़िंदा हूं: शताब्दी का साक्षी समाजवाद का प्रहरी’ का प्रकाशन सेवा की राजनीति के विभिन्न आयामों को देखने का एक नया नजरिया देती है।
निर्धन परिवार से आने वाले पंडित रामकिशन ने जब से होश संभाला तब से वे समाजवाद का ध्वज थामे रहे हैं। अपनी लंबी राजनैतिक यात्रा में उन्होंने समाजवाद के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता कभी नहीं बदली। उनके नेता और साथी दल बदलते रहे, मगर वे स्वयं अपनी जगह पर दृढ़ रहे।
यह पुस्तक एक ऐसे व्यक्ति का जीवन सामने लाने का प्रयास करती है “जिसने सत्ता, धन और वैचारिक उलझन को हमेशा खारिज किया।”
28 मार्च 1925 को जन्मे पंडित रामकिशन विश्व के सबसे उम्रदराज सक्रिय और गतिशील समाजवादी कहे जा सकते हैं। वे राजस्थान में समाजवादी आंदोलन के संस्थापक माने जाते हैं।
पंडित जी से बातचीत पर आधारित करीब पौने तीन सौ पृष्ठों की पुस्तक में यही बात बार-बार उभर कर आती है कि समाज में गैर बराबरी और भेद भाव की पीड़ा को देख कर वे समाजवादी बने।
पौन सदी के अपने राजनैतिक अनुभव के आधार पर निर्णय देते हैं कि, “राजनीति झूठ बोलने को सबसे ज्यादा मजबूर करती है और आज की राजनीति झूठ से भरी हुई है।”
पुस्तक में पंडित जी यह स्पष्ट नहीं करते हैं कि “गांधी का प्रशंसक होने और भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद व सुभाष चंद्र बोस के प्रति भावनात्मक लगाव के बावजूद उनमें समाजवादी चिंतन किस प्रकार विकसित हुआ। वे इतना भर कहते हैं कि,”मुझे लगा कि यह गरीबी हटाने का समाधान है।”
किताब का सबसे दिलचस्प पक्ष उनके अपने समकालीन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनेताओं पर उनकी टिप्पणियां। जैसे वे हरिदेव जोशी के विरोधी होकर दोस्त थे, तो भैरोंसिंह शेखावत के दोस्त होकर भी विरोधी थे।
नीतियों की दृष्टि से अशोक गहलोत उन्हें आश्चर्यजनक रूप से समाजवादी साथी जैसे लगे।
उनकी यह टिप्पणी कि “समाजवादी (लोग) पार्टियां बदलने के लिए बदनाम हैं” देश में समाजवादी आंदोलन की असफलता के बड़े कारण को रेखांकित करती है।
पंडित जी के संस्मरणों में वे सभी बातें हैं जो राजनीति के शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। जैसे इंदिरा गांधी को परास्त करने वाले समाजवादी नेता राजनारायण के बारे में वे बताते हैं कि राजनारायण राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इतना डूब गए थे कि बरसों तक घर नहीं जाते थे। एक बार उनकी पत्नी मिलने आई। उस समय वे मंत्री थे। दूर से देख कर उन्होंने अपने पास खड़े किसी से कहा कि यह महिला कहीं देखी हुई लगती है।
किताब में अटल बिहारी वाजपेई, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, चरण सिंह, के दर्जनों राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं के साथ अपने रिश्तों के बारे में तो खूब बातें हैं।
खुद्दारी वाले सार्वजनिक जीवन जीने वाले पंडित रामकिशन की गाथा कहती इस किताब में सारा कथ्य बिखरा-बिखरा है। पंडित जी इससे बेहतर लिखे और संपादित किए ग्रन्थ के हक़दार हैं।
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