बिना इस्तरी किये लोहिया के कपड़े तथा इस्तरी किये जेपी के कपड़े

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Jayaprakash Narayan and Dr. Ram Manohar Lohia

Parichay Das

— परिचय दास —

राममनोहर लोहिया का बिना इस्तरी का कुर्ता केवल वस्त्र नहीं था, वह उनके पूरे चिंतन की भौतिक उपस्थिति था। वह कुर्ता जैसे कहता था कि समाज को बदलने की लड़ाई में सतह की चमक का कोई विशेष महत्त्व नहीं। उसमें सलवटें थीं और उन्हीं सलवटों में वह असंतोष भी था जो व्यवस्था के प्रति उनके भीतर लगातार धड़कता रहता था। वह कपड़ा सधा हुआ नहीं था क्योंकि उनका समय भी सधा हुआ नहीं था। उसमें एक बेचैनी थी, एक असहमति, एक निरंतर प्रश्न।

लोहिया का व्यक्तित्व जैसे अपने कपड़ों के साथ एकाकार हो गया था। वहाँ कोई सजावट नहीं, कोई अतिरिक्त परिष्कार नहीं—सिर्फ एक सीधा, लगभग कठोर सादापन। यह सादापन भी किसी आध्यात्मिक त्याग का प्रदर्शन नहीं था बल्कि एक राजनीतिक वक्तव्य था। जैसे वे कह रहे हों कि जो समाज असमानताओं से भरा है, उसमें अत्यधिक सलीका भी एक तरह की दूरी पैदा करता है। इसलिए उनका कुर्ता उस दूरी को तोड़ने का प्रयास था—बिना किसी औपचारिक घोषणा के।

दूसरी ओर, जयप्रकाश नारायण के इस्तरी किए हुए कपड़े एक अलग तरह की सजगता का संकेत देते हैं। वहाँ भी सादगी थी पर वह सादगी व्यवस्थित थी, संयत थी। उनके कपड़ों की सीधाई में एक प्रकार का संतुलन दिखाई देता है—जैसे वे अराजकता के भीतर भी एक नैतिक अनुशासन बनाए रखना चाहते हों। यह अनुशासन केवल बाहरी नहीं था; वह उनके विचारों की संरचना में भी उपस्थित था।

जेपी के कपड़े यह नहीं कहते कि दुनिया को “जैसे है वैसे ही छोड़ दो” बल्कि यह संकेत देते हैं कि परिवर्तन भी एक संयमित प्रक्रिया हो सकता है। वहाँ विद्रोह है पर वह पूरी तरह विस्फोटक नहीं; उसमें एक धैर्य है, एक क्रमबद्धता। इस्तरी की हुई सिलवटें यहाँ किसी दमन का प्रतीक नहीं बनतीं बल्कि एक सजग आत्म-नियंत्रण का रूप ले लेती हैं।

इन दोनों के बीच कोई साधारण तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह केवल कपड़ों का अंतर नहीं है, यह दृष्टियों का अंतर है। लोहिया की सलवटें प्रश्न करती हैं, झकझोरती हैं, व्यवस्था को अस्थिर करती हैं। जेपी की सीधाई भरोसा दिलाती है, संयम रखती है और परिवर्तन को एक नैतिक दिशा देती है।

फिर भी, एक गहरे स्तर पर दोनों में एक समानता भी है—दोनों ही अपने कपड़ों को दिखावे का माध्यम नहीं बनने देते। दोनों के यहाँ वस्त्र विचार का विस्तार हैं, न कि उसकी जगह लेने वाली कोई चीज़। फर्क बस इतना है कि एक ने असमानता को सलवटों में व्यक्त किया और दूसरे ने उसे सीधी रेखाओं में संतुलित करने की कोशिश की।

मनुष्य की आदत है कि वह प्रतीकों को बहुत जल्दी अंतिम सत्य मान लेता है। पर सच यह है कि न तो हर सलवट विद्रोह होती है, न हर इस्तरी अनुशासन। कभी-कभी बिना इस्तरी का कपड़ा केवल आलमारी की लापरवाही होता है, और कभी इस्तरी किया हुआ कपड़ा सिर्फ एक सामाजिक अनिवार्यता लेकिन जब ये दोनों अपने-अपने समय के बड़े व्यक्तित्वों से जुड़ते हैं तो वे अर्थ से भर जाते हैं।

इसलिए लोहिया और जेपी के कपड़ों को देखना, दरअसल उनके विचारों की दो अलग लयों को देखना है—एक थोड़ी बिखरी हुई, बेचैन और दूसरी थोड़ी सधी हुई, संयत। दोनों ही अपने-अपने ढंग से आवश्यक, दोनों ही अधूरे बिना एक-दूसरे के। और बीच में खड़ा मनुष्य, अपनी अलमारी खोलकर रोज़ तय करता हुआ कि आज वह किस लय में जीना चाहता है—सलवटों में या सीधाई में।

लोहिया की सलवटों में जो असहमति थी, वह केवल सत्ता से नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता से भी थी जो हर चीज़ को एक ही ढाँचे में फिट करना चाहती है। उनका बिना इस्तरी का कुर्ता जैसे कहता था कि जीवन को पूरी तरह नियंत्रित करने की यह आदत ही असमानताओं को जन्म देती है। अगर सब कुछ पहले से तय, समतल और नियंत्रित हो जाएगा तो मनुष्य की स्वतंत्रता कहाँ बचेगी। इसलिए उनके वस्त्रों की हल्की-सी बिखरन दरअसल उस कठोर समरूपता के खिलाफ एक दृश्य प्रतिरोध थी।

इसके उलट, जेपी की इस्तरी की हुई कमीज़ में एक अलग तरह की नैतिक दृढ़ता थी। वह बिखराव को नकारती नहीं बल्कि उसे दिशा देने की कोशिश करती है। जैसे कोई नदी अपने किनारों के भीतर बहते हुए भी अपनी शक्ति नहीं खोती, वैसे ही उनका अनुशासन भी किसी दमन का रूप नहीं था। वह एक संयमित ऊर्जा थी जो समाज को टूटने से बचाते हुए बदलना चाहती थी।

दिलचस्प यह है कि दोनों ही रास्ते अंततः मनुष्य की गरिमा तक पहुँचते हैं। एक रास्ता कहता है कि गरिमा किसी बाहरी सलीके की मोहताज नहीं, वह भीतर की असहमति और साहस में है। दूसरा रास्ता कहता है कि गरिमा उस संतुलन में है, जहाँ व्यक्ति अपने भीतर और बाहर दोनों को व्यवस्थित रख सके। एक में उथल-पुथल है, दूसरे में लय है—और जीवन, जैसा कि वह अक्सर करता है, इन दोनों के बीच झूलता रहता है।

समय के साथ इन प्रतीकों की चमक थोड़ी धुँधली भी पड़ जाती है। आज कोई बिना इस्तरी का कुर्ता पहनकर निकले तो ज़रूरी नहीं कि वह लोहिया की परंपरा में खड़ा हो; और कोई सजी-धजी कमीज़ पहने तो वह जेपी की नैतिकता का प्रतिनिधि हो, यह भी तय नहीं। प्रतीक अक्सर अपने मूल अर्थ से अलग होकर केवल आदत में बदल जाते हैं और मनुष्य, जैसा कि वह बार-बार साबित करता है, आदतों को अर्थ समझ लेने में बड़ा कुशल है।

फिर भी, इन दोनों की स्मृति हमें एक सावधानी सिखाती है—कि हम अपने बाहरी रूप को लेकर जितने भी सचेत हों, यह न भूलें कि वह भीतर की किसी गहरी प्रक्रिया का विस्तार होना चाहिए, उसका विकल्प नहीं। कपड़े चाहे सलवटों से भरे हों या एकदम सपाट, वे तब ही अर्थवान होते हैं जब वे मनुष्य की ईमानदारी से जुड़े हों।

और शायद यहीं आकर यह पूरा प्रसंग एक शांत निष्कर्ष में बदल जाता है। लोहिया और जेपी, दोनों ही अपने-अपने ढंग से इस बात के साक्षी हैं कि मनुष्य की सच्चाई उसके वस्त्रों में नहीं बल्कि उस दृष्टि में है जिससे वह दुनिया को देखता है। कपड़े केवल उस दृष्टि की हल्की-सी झलक दे सकते हैं—कभी सलवटों के रूप में, कभी सीधी रेखाओं के रूप में।


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