कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस पर समाजवादी समागम द्वारा एक यादगार वैचारिक गोष्ठी का आयोजन

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A Memorable Ideological Seminar Organized by Samajwadi Samagam on the Foundation Day of the Congress Socialist Party

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस पर समाजवादी समागम द्वारा एक यादगार वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया।

17 मई 2026 को समाजवादी समागम के तत्वावधान में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर एक महत्वपूर्ण वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय था- “राष्ट्र निर्माण में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की भूमिका।” इस ऐतिहासिक अवसर पर 17 मई 1934 को पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में स्थापित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की विरासत, विचारधारा और राष्ट्र निर्माण में उसके योगदान को स्मरण किया गया।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए रणधीर कुमार गौतम ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और देश-विदेश से ऑनलाइन जुड़े समाजवादी साथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार,विस्तार, संगठनात्मक शक्ति और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का स्पष्ट कार्यक्रम प्रदान किया। उन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गोपाल सिंह का परिचय देते हुए उनके समाजवादी आंदोलन से जुड़ाव का उल्लेख किया। साथ ही मुख्य वक्ताओं प्रोफेसर राज कुमार जैन तथा रघु कुमार का परिचय कराया।
प्रारंभिक वक्तव्य के लिए आमंत्रित वरिष्ठ समाजशास्त्री आनंद कुमार ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1934 में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई, तब उसके नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित न रखते हुए उसे सामाजिक और आर्थिक न्याय के कार्यक्रम से जोड़ा। उन्होंने कहा कि समाजवादियों ने जमींदारी उन्मूलन, “जोतने वाला ही जमीन का मालिक हो, मजदूरों के अधिकार, आठ घंटे कार्य-दिवस, बाल श्रम निषेध, महिलाओं को मताधिकार तथा सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार जैसे ऐतिहासिक कार्यक्रम भारतीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किए।

प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा कि समाजवादियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को पूर्ण स्वराज की दिशा दी और यह स्पष्ट किया कि आजादी का अर्थ केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि जनता के हाथों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक निर्णयों की शक्ति होना चाहिए। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में समाजवादियों की निर्णायक भूमिका का उल्लेख करते हुए बताया कि जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब समादियों ने भूमिगत आंदोलन, कांग्रेस रेडियो तथा जनसंगठन के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाया।

उन्होंने समाजवादी आंदोलन की समकालीन प्रासंगिकता पर भी जोर दिया और कहा कि आज आवश्यकता है कि गांधी, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव तथा अन्य समाजवादी पुरोधाओं की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। उन्होंने बताया कि समाजवादी समागम पिछले कई वर्षों से मुंबई, पुणे, दिल्ली, बेंगलुरु और इंदौर सहित विभिन्न शहरों में वैचारिक सम्मेलनों का आयोजन करता रहा है और अब प्रत्येक महीने की 17 तारीख को नियमित वैचारिक संवाद आयोजित करने का निर्णय लिया।

अपने संबोधन के अंत में प्रोफेसर आनंद कुमार ने आयोजकों, वक्ताओं और देशभर से जुड़े समाजवादी साथियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान भारत में समाजवादी विचारधारा के पुनर्संगठन और पुनर्प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम आगे मुख्य वक्ताओं के विस्तृत व्याख्यानों के साथ जारी रहा।

अपने विचार रखते हुए डॉ. रघु कुमार ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी आंदोलन की विरासत को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अब तक चर्चा मुख्यतः समाजवादी आंदोलन की प्रथम पीढ़ी-जैसे जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव-पर केंद्रित रही है, किंतु समाजवादी आंदोलन की शक्ति उसकी दूसरी पीढ़ी और उसके दूरगामी सामाजिक प्रभावों में भी दिखाई देती है।

डॉ. रघु कुमार ने अपने वक्तव्य में चार प्रमुख क्षेत्रों- राजनीति, सामाजिक शोध एवं सेवा, सामाजिक सुधार तथा जनजागरण आंदोलनों का उल्लेख करते हुए बताया कि समाजवादी विचारधारा ने स्वतंत्र भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया है।

राजनीति के क्षेत्र में उन्होंने कर्पूरी ठाकुर का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जननायक कर्पूरी ठाकुर समाजवादी आंदोलन की उस विरासत के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने पिछड़े वर्गों को सत्ता के केंद्र तक पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू किया और सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी। उन्होंने कहा कि कर्पूरी ठाकुर ने जीवन भर सादगी, ईमानदारी और समाजवादी मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया और ऊँचे राजनीतिक पदों पर रहते हुए भी अत्यंत साधारण जीवन जिया।

सामाजिक एवं ऐतिहासिक शोध और सेवा के क्षेत्र में डॉ रघु कुमार ने धर्मपाल के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि धर्मपाल ने भारतीय शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, स्थानीय स्वशासन और कृषि संबंधी उपनिवेश-पूर्व भारतीय परंपराओं पर ऐतिहासिक दस्तावेजी शोध किया। उनकी प्रसिद्ध कृति The Beautiful Tree ने यह स्थापित किया कि ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत में एक समृद्ध स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था विद्यमान थी। डॉ. रघु कुमार ने कहा कि धर्मपाल का कार्य भारतीय चिंतन के decolonization की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक हस्तक्षेप है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि धर्मपाल ने 1942 के आंदोलन में भाग लिया, बाद में गांधीवादी परंपरा से जुड़े और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्पाठ में लगाया।

सामाजिक सुधार के क्षेत्र में डॉ. रघु कुमार ने हमीद दलवाई को समाजवादी आंदोलन की प्रेरणा से उभरे एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हमीद दलवाई ने मुस्लिम समाज के भीतर सुधार, लैंगिक समानता, समान नागरिक संहिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए संघर्ष किया। उन्होंने मुस्लिम सत्यशोधक मंडल की स्थापना की और मराठी भाषा में लिखकर अपने विचार सीधे जनता तक पहुँचाए। डॉ. रघु कुमार ने कहा कि दलवाई का कार्य भारतीय धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सुधार की परंपरा में एक ऐतिहासिक योगदान है।

अपने चौथे उदाहरण में उन्होंने तेलंगाना के समाजवादी चिंतक, लेखक और जनबुद्धिजीवी सूरमौली का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सूरमौली ने किशोरावस्था में ही समाजवादी आंदोलन से जुड़कर तेलुगु समाज में समाजवादी विचारों के प्रसार का कार्य किया। उन्होंने गांधी, समाजवाद और भारतीय सामाजिक प्रश्नों पर अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं और अनुवादों के माध्यम से समाजवादी विचारधारा को जनभाषा में पहुंचाया। डॉ. रघु कुमार ने कहा कि सूरमौली ने जाति-विरोध, सामाजिक समानता और अहिंसक सामाजिक परिवर्तन के प्रश्नों को अपने लेखन और सा कि जीवन का केंद्र बनाया।

अपने वक्तव्य के समापन में डॉ. रघु कुमार ने कहा कि समाजवादी आंदोलन की विरासत केवल राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने भारत के सामाजिक चिंतन, वैकल्पिक इतिहास लेखन, सामाजिक सुधार आंदोलनों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को भी प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि समाजवादी आंदोलन की दूसरी ओर तीसरी पीढ़ी के इन कम चर्चित नायकों को नई पीढ़ी के सामने लाया जाए, ताकि समाजवाद की परंपरा केवल इतिहास न रहे, बल्कि वर्तमान सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति बन सके।
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कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रो. Rajkumar Jain का व्याख्यान (समाजवादी समागम, 17 मई 2026)

प्रो. Rajkumar Jain ने अपने वक्तव्य की शुरुआत आयोजन से जुड़े सभी साथियों और श्रोताओं का अभिनंदन करते हुए की। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में Congress Socialist Party का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई Mahatma Gandhi के नेतृत्व में Indian National Congress के झंडे तले लड़ी गई, लेकिन 1930 के Dandi March और उसके बाद आंदोलनों की गति धीमी पड़ने से युवाओं में बेचैनी ओर असंतोष बढ़ रहा था। इसी पृष्ठभूमि में समाजवादी विचारधारा से जुड़े युवा नेताओं ने स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के प्रश्नों को उठाने का निर्णय लिया।

प्रो. जैन ने बताया कि नासिक जेल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में समाजवादी नेताओं के बीच हुए वैचारिक मंथन का परिणाम यह हुआ कि 17 मई 1934 को पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में Congress Socialist Party की स्थापना हुई। इसकी अध्यक्षता Acharya Narendra Deva ने की, जबकि Jayaprakash Narayan सहित अनेक युवा नेता इसमें सक्रिय थे। यह सम्मेलन पटना में हुआ था और आचार्य नरेंद्र देव इसके प्रथम अध्यक्ष बने।

उन्होंने स्पष्ट किया कि समाजवादियों की प्राथमिकता देश की स्वतंत्रता थी, लेकिन वे साथ ही यह भी तय करना चाहते थे कि आज़ादी के बाद भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना कैसी होगी। इसलिए समाजवादियों ने मजदूरों, किसानों, पिछड़ों और आम जनता के अधिकारों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा।

प्रो. जैन ने कहा कि समाजवादियों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ी-एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ, और दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर दक्षिणपंथी तथा अवसरवादी शक्तियों के खिलाफ। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि समाजवादियों को कम्युनिस्ट गुटों के साथ वैचारिक और संगठनात्मक संघर्ष का भी सामना करना पड़ा।

1942 के Quit India Movement का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि समाजवादियों ने इस आंदोलन को निर्णायक रूप दिया। Yusuf Meherally द्वारा दिया गया “Quit India’ का नारा, Aruna Asaf Ali द्वारा मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराना, और Usha Mehta द्वारा संचालित कांग्रेस रेडियो ये सभी समाजवादी नेतृत्व की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ थीं। 1942 में कांग्रेस रेडियो वास्तव में भूमिगत रूप से संचालित हुआ और इसमें Ram Manohar Lohia जैसे नेताओं की ऐतिहासिक भूमिका दर्ज है।

उन्होंने कहा कि Jayaprakash Narayan, Ram Manohar Lohia और अन्य समाजवादी नेताओं ने जेल यातनाएँ सहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाया और नेपाल तक जाकर “आजात दस्ता जैसे संगठनों के माध्यम से संघर्ष जारी रखा।

प्रो. जैन ने बताया कि समाजवादियों का मानना था कि स्वराज और समाजवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण अनिवार्य है।
उन्होंने 1947 के विभाजन के संदर्भ में कहा कि Jayaprakash Narayan और Ram Manohar Lohia ने कग्रेिस कार्यसमिति में भारत विभाजन का विरोध किया। विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भी समाजवादी नेता Mahatma Gandhi के साथ शांति और सद्भाव स्थापित करने के प्रयासों में लगे रहे।

प्रो. जैन ने यह भी उल्लेख किया कि स्वतंत्र भारत में सत्ता मिलने के अवसर आने पर भी समाजवादी नेताओं ने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने मंत्रिमंडलों में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र समाजवादी राजनीति को प्राथमिकता दी।

अपने समापन में प्रो. जैन ने कहा कि 1934 से 1948 तक कांग्रेस के भीतर रहकर समाजवादियों ने केवल स्वतंत्रता की लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि भारत के भावी सामाजिक-आर्थिक ढांचे की वैचारिक नींव भी रखी। आज भी हजारों समाजवादी कार्यकर्ता समानता, न्याय, सांप्रदायिकता विरोध और सामाजिक परिवर्तन की उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

उन्होंने अंत में समाजवादी आंदोलन के सभी पुरोधाओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि यह इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
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शिवदयाल जी का वक्तव्य

(समाजवादी समागम, 17 मई 2026)

शिवदयाल जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत पटना से जुड़ाव व्यक्त करते हुए की ओर कहा कि वे उसी ऐतिहासिक नगर से बोल रहे हैं जहाँ 17 मई 1934 को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी। उन्होंने स्मरण कराया कि इस ऐतिहासिक अधिवेशन में जयप्रकाश नारायण महासचिव बने थे तथा आचार्य नरेंद्र देव अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने कहा कि यह केवल एक संगठन की स्थापना नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की हमेशा के लिए दिशा बदल देने वाला ऐतिहासिक घटनाक्रम था।

उन्होंने प्रो. राजकुमार जैन के विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण की सराहना करते हुए कहा कि समाजवादी धारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे संघर्षशील धाराओं में से एक रही है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की धारा के बाद यदि किसी विचारधारा ने सबसे अधिक यातनाएँ और संघर्ष झेला, तो वह समाजवादी धारा थी। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी समाजवादी नेताओं ने सत्ता के अन्याय और दमन के विरुद्ध लगातार संघर्ष जारी रखा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डॉ. राममनोहर लोहिया बारह बार जेल गए और कभी समझौते की राजनीति नहीं की। इसी प्रकार जयप्रकाश नारायण ने 1954 में सक्रिय संसदीय राजनीति से अलग होने के बाद भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को कभी कमजोर नहीं होने दिया। बाद में जब स्वतंत्रता के पच्चीस वर्षों बाद जनता में गहरा मोहभंग पैदा हुआ, तब जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया और उम्र के आखिरी दहलीज पर जेल और नजरबंदी झेली। –

शिवदयाल जी ने कहा कि भारतीय समाजवादी आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने राष्ट्रवाद और समाजवाद-इन दोनों मूल्यों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। उनके अनुसार भारतीय समाजवादियों ने कभी राष्ट्रवाद को अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता का प्रतिरोध केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति भी था। यही समाजवादी आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन के बीच मूलभूत अंतर रहा।

उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण के अनुभवों ने उन्हें यह समझाया कि कम्युनिस्ट आंदोलन अंतरराष्ट्रीय निर्देशों से संचालित हो रहा था, जबकि समाजवादी धारा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की जरूरतों और भारतीय समाज की वास्तविकताओं से जुड़ी हुई थी। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद भारत का “Number One Enemy” है, और समाजवादियों ने इसी भावना के साथ स्वतंत्रता आंदोलन को गति और ऊर्जा प्रदान की।

शिवदयाल जी ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1932 में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बड़े नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुई, तब जयप्रकाश नारायण ने देशभर में भूमिगत संगठन और नेटवर्क खड़ा किया ताकि आंदोलन कमजोर न पड़े। बाद में नाशिक जेल में जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, यूसुफ मेहर अली, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन और अन्य समाजवादी नेताओं के बीच जो वैचारिक मंथन हुआ, उसी ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन का बीजारोपण किया।
उन्होंने कहा कि 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के पीछे यह स्पष्ट विचार था कि स्वतंत्रता आंदोलन के लक्ष्यों को समाजवादी लक्ष्यों से जोड़ा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समाजवाद के प्रति झुकाव ने इस समूह को ऊर्जा दी, लेकिन समाजवादियों ने गांधीजी की नीतियों की आलोचना करते हुए भी उनसे वैचारिक संवाद कभी समाप्त नहीं किया। गांधी और समाजवादियों के बीच यह रचनात्मक संबंध स्वतंत्रता आंदोलन की एक बड़ी शक्ति बना।

शिवदयाल जी ने जयप्रकाश नारायण के वैचारिक विकास पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाले चिंतक थे। उनकी 1936 की प्रसिद्ध पुस्तक Why Socialism? ने भारत में समाजवादी और मार्क्सवादी विमर्श को नई दिशा दी। इस पुस्तक के माध्यम से जयप्रकाश ने मार्क्सवाद, समाजवाद और भारतीय परिस्थितियों में उनके प्रयोग पर गंभीर विचार प्रस्तुत किए।

उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आर्थिक चिंतन को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया और कहा कि उनके चिंतन का यह पक्ष अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है। उन्होंने बताया कि अपनी पुस्तक “जयप्रकाशः परिवर्तन की वैचारिकी में उन्होंने इस विषय पर विस्तार से लिखा है ओर यह दिखाने का प्रयास किया है कि जयप्रकाश का चिंतन समय और परिस्थितियों के साथ निरंतर विकसित होता रहा।

शिवदयाल जी ने चिंता व्यक्त की कि स्वतंत्रता के बाद समाजवादी आंदोलन विखंडन का शिकार हो गया और यह भारतीय राजनीति तथा वैचारिक संघर्ष की बड़ी क्षति रही, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी।

अपने समापन में उन्होंने कहा कि आज के समय में समाजवाद में विश्वास रखने वालों को केवल संसदीय राजनीति की सीमाओं में बंधकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक और सामाजिक कार्यक्रमों पर सामूहिक चिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की बहुलता ओर जटिलता को ध्यान में रख समाजवादियों को राष्ट्रवाद और समाजवाद के अपने मूल आदर्शों की पुनर्व्याख्या करनी होगी।

उन्होंने विशेष आग्रह किया कि समाजवादी धारा को राष्ट्रवाद शब्द से दूरी बनाने के बजाय उसके लोकतांत्रिक, जनपक्षधर और समावेशी अर्थ को पुनः स्थापित करना चाहिए। इसी के साथ उन्होंने सभी साथियों का आभार व्यक्त किया और अपना वक्तव्य समाप्त किया।
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कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित समाजवादी समागम की वैचारिक गोष्ठी का समापन वरिष्ठ समाजवादी नेता Gopal Singh के अध्यक्षीय वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि आज का विचार-विमर्श अत्यंत सार्थक, ज्ञानवर्धक और ऐतिहासिक महत्व का रहा। उन्होंने आयोजक Randhir Gautam, समता मार्ग तथा समाजवादी समागम को बधाई देते हुए कहा कि इस मंच ने देशभर के समाजवादी साथियों और चिंतकों को एक सूत्र में जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

अपने वक्तव्य में उन्होंने विशेष रूप से Raghu Kumar के विद्वत्तापूर्ण योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने मार्क्सवाद, Ram Manohar Lohia और B. R. Ambedkar पर गंभीर अध्ययन और लेखन किया है। उन्होंने आग्रह किया कि भविष्य के सम्मेलनों और वैचारिक चर्चाओं में डॉ. रघु कुमार जैसे विद्वानों को निरंतर आमंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि समाजवादी विमर्श और अधिक समृद्ध हो सके।

गोपाल सिंह ने दक्षिण भारत के समाजवादी आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक समाजवादी कार्यकर्ताओं ने अंतरजातीय विवाह, सामाजिक समरसता और जिक न्याय के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए हैं। उन्होंने दक्षिण भारत के समाजवादी साथियों और विद्वानों को राष्ट्रीय समाजवादी संवाद से निरंतर जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया तथा इस दिशा में हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।

इसके साथ ही दर्जनों की संख्या में वरिष्ठ साथियों—डॉ. हरीश खन्ना, डॉ. शशि शेखर, डॉ. अनिल ठाकुर, श्री कादरी, श्री राज नारायण, श्री राजवीर पवार, श्री चंद्रशेखर मिश्रा, प्रोफेसर नंदिनी, श्री राकेश कुमार, श्री संजय कनौजिया तथा अन्य अनेक समाजवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की भी उपस्थिति रही।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभी प्रतिभागियों, वक्ताओं और आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए बैठक के समापन की घोषणा की।

इसके पश्चात समता मार्ग की ओर से धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। आयोजकों ने अध्यक्ष गोपाल सिंह तथा मुख्य वक्ताओं prof. Rajkumar Jain ,Raghu Kumar के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। यह भी घोषणा की गई कि समाजवादी समागम प्रत्येक माह की 17 तारीख को समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक विषयों पर नियमित चर्चा आयोजित करेगा।

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि वरिष्ठ समाजवादी नेताओं Chandra Shekhar, Rabi Ray , Surendra Mohan का जन्मशती के अवसर पर विशेष स्मृति-कार्यक्रम और संस्मरण-संग्रह का आयोजन किया जा रहा है। उपस्थित साथियों से आग्रह किया गया कि वे अपने संस्मरण और लेख भेजकर इस अभियान में सहभागी बनें। ( [email protected])

समापन के अवसर पर अनेक वरिष्ठ समाजवादी चिंतक, शिक्षाविद और कार्यकर्ता ऑनलाइन उपस्थित रहे। आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों के सहयोग, मार्गदर्शन और आशीर्वाद के लिए हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस प्रकार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ऐतिहासिक स्थापना दिवस पर आयोजित पह‌चैचारिक गोष्ठी समाजवादी आंदोलन की विरासत्, समकालीन चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर गंभीर मंथन के साथ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।


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