पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने का मामला: इतिहास, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा

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The Issue of Giving ₹55 Crores to Pakistan: History, Ethics, and International Prestige

भारतीय राजनीति में कुछ नारे ऐसे हैं जो बार-बार दोहराए जाते हैं, लेकिन उनके पीछे का पूरा इतिहास शायद ही कभी बताया जाता है। “गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलवाए” भी ऐसा ही एक नारा है। इसे अक्सर सोशल मीडिया पर इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो गांधीजी ने भारत के हितों के विरुद्ध जाकर पाकिस्तान को कोई इनाम या खैरात दिलवा दी हो।

लेकिन जब हम इतिहास के दस्तावेज़, तत्कालीन परिस्थितियाँ और नेताओं के तर्क देखते हैं, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल, संवेदनशील और गंभीर दिखाई देती है।
यह केवल “55 करोड़ रुपये” का प्रश्न नहीं था। यह नवस्वतंत्र भारत की विश्वसनीयता, विभाजन की शर्तों, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और नैतिक राजनीति की परीक्षा का प्रश्न था।

विभाजन के समय संपत्ति का बंटवारा

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, तब केवल जमीन का ही बंटवारा नहीं हुआ था। दो नए राष्ट्र बन रहे थे, इसलिए प्रशासनिक और आर्थिक संपत्तियों का भी विभाजन होना था।
सरकारी दफ्तरों से लेकर फौजी सामान, रेल, फर्नीचर, टाइपराइटर, यहां तक कि छोटे-छोटे कार्यालयी संसाधनों तक का बंटवारा हुआ। कहा जाता है कि कई जगहों पर मामूली वस्तुओं तक का विभाजन किया गया।
इसी क्रम में ब्रिटिश भारत की नकद संपत्ति का भी बंटवारा तय हुआ। रिजर्व बैंक में जमा कुल नकद राशि 400 करोड़ में से पाकिस्तान को उसके हिस्से के रूप में 75 करोड़ रुपये मिलने थे।

समझौते के अनुसार पहली किश्त के रूप में 20 करोड़ रुपये पाकिस्तान को तुरंत दे दिए गए। शेष 55 करोड़ रुपये बाद में दिए जाने थे।
यह कोई दान या कृपा नहीं थी; यह विभाजन परिषद द्वारा तय की गई वैधानिक और लिखित व्यवस्था थी।

कश्मीर युद्ध और 55 करोड़ का विवाद

इसी बीच अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक सैन्य संघर्ष शुरू हो गया।
स्थिति अचानक बदल गई। सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू सहित भारत सरकार के कई नेताओं का तर्क था कि यदि इस समय पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दे दिए गए, तो वह उसी धन से हथियार और गोलाबारूद खरीद सकता है, जिनका उपयोग भारत के विरुद्ध होगा। यह तर्क भावनात्मक ही नहीं, व्यावहारिक भी था।

एक नवस्वतंत्र राष्ट्र के लिए यह स्वाभाविक चिंता थी कि शत्रुतापूर्ण कार्रवाई कर रहे देश को आर्थिक संसाधन क्यों दिए जाएं। भारत सरकार ने इसलिए उस राशि को रोकने का निर्णय लिया।

गांधीजी का दृष्टिकोण: युद्ध अलग, समझौता अलग

गांधीजी ने इस प्रश्न को एक अलग दृष्टि और नैतिक दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की आक्रामकता अपनी जगह गलत है और उसका सैन्य प्रतिरोध किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि देश की रक्षा के लिए सेना भेजनी पड़े तो भेजो। सेना भेजी भी गई और अहिंसा के पुजारी ने फौज को आशीर्वाद भी दिया।

गांधीजी ने कहा भी था कि “अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अहिंसा से देश की रक्षा कैसे होगी, इसका रास्ता मैं अभी तक नहीं खोज पाया हूँ।”

लेकिन गांधीजी कहना था कि 55 करोड़ रुपये का मामला एक लिखित समझौते का हिस्सा था। भारत स्वयं उस समझौते को स्वीकार कर चुका था। यदि भारत अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटता है, तो नवस्वतंत्र राष्ट्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेगा। उन्होंने कहा था कि “पाकिस्तान की बदमाशी अपनी जगह है, लेकिन समझौते का पालन अपनी जगह।”

गांधीजी की सबसे बड़ी चिंता: दुनिया में भारत की साख

गांधीजी को यह चिंता भी थी कि यदि दो देशों के बीच हुए लिखित समझौते का भारत स्वयं उल्लंघन करेगा, तो पाकिस्तान इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, हेग (International Court of Justice) या विश्व समुदाय के सामने उठा सकता है। भारत अभी-अभी स्वतंत्र हुआ था। पूरी दुनिया नए राष्ट्र भारत को देख रही थी। ऐसे समय यदि भारत अपने ही हस्ताक्षरित समझौते से पीछे हटता, तो यह संदेश जाता कि नया राष्ट्र अपने खुद के वचनों का सम्मान नहीं करता।

गांधीजी का मानना था कि “युद्ध का उत्तर युद्ध से दिया जा सकता है, सीमा की रक्षा सेना कर सकती है, लेकिन राष्ट्र की प्रतिष्ठा केवल नैतिक विश्वसनीयता से बनती है। उनके लिए यह केवल पाकिस्तान का प्रश्न नहीं था; यह भारत के चरित्र का प्रश्न था।

क्या गांधीजी ने “जबरदस्ती” सरकार से पैसा दिलवाया?

यह आरोप भी अक्सर लगाया जाता है कि गांधीजी ने अनशन करके सरकार को “ब्लैकमेल” किया। इतिहास इससे अधिक सूक्ष्म है। गांधीजी ने 13 जनवरी 1948 को दिल्ली में आमरण अनशन शुरू किया। लेकिन इस अनशन की सार्वजनिक शर्तों में 55 करोड़ रुपये का कहीं उल्लेख नहीं था। उनके उपवास का मुख्य उद्देश्य दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम हिंसा रोकना, सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करना,
अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना ayr
शरणार्थी संकट को शांत करना। यानी उनका उपवास सीधे “55 करोड़” के लिए घोषित नहीं था।

माउंटबेटन की भूमिका

गांधीजी के अनशन से एक दिन पहले, गांधीजी की मुलाकात भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से हुई। माउंटबेटन ने गांधीजी से कहा कि भारत सरकार द्वारा 55 करोड़ रुपये रोकना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को असहज और अपमानजनक स्थिति में डाल सकता है।
उन्होंने इसे “unwise” और “dishonourable” जैसा निर्णय बताया।
गांधीजी पहले से इस विषय पर चिंतित थे।
माउंटबेटन की राय ने उनकी चिंता को और मजबूत किया कि भारत को अपने वचन का पालन करना चाहिए।

कहा जाता है कि अनशन के तीसरे दिन सरदार पटेल गांधीजी से मिलने पहुंचे और गांधीजी ने धीमी आवाज में उनसे कहा कि 55 करोड़ रुपये देकर इस झंझट को हमेशा के लिए खत्म कर दो। इसके बाद मंत्रिमंडल में पुनर्विचार हुआ और भारत सरकार ने पाकिस्तान को उसके हिस्से की राशि देने का निर्णय लिया।

लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि पैसा दिए जाने के बाद भी गांधीजी का अनशन तुरंत समाप्त नहीं हुआ। उनका उपवास सांप्रदायिक शांति के likhit आश्वासनों के बाद ही 18 जनवरी 1948 को टूटा। यदि उनका उद्देश्य केवल “55 करोड़ दिलवाना” होता, तो निर्णय होते ही अनशन समाप्त हो जाता।

55 करोड़ रुपये” का मामला इतिहास का एक जटिल अध्याय है, जिसे अक्सर आधे-अधूरे तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यह घटना हमें बताती है कि स्वतंत्र भारत के शुरुआती दिनों में उसके नेताओं के सामने कितनी कठिन नैतिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियाँ थीं। जब इतिहास को केवल राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है, तब सत्य सबसे पहले घायल होता है।


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