अतीत के प्रेरणास्रोत – चंद्रशेखर, पूर्व प्रधानमंत्री

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Chandra Shekhar

राष्ट्र की पराधीनता को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन ने अनेक युवक-युवतियों को बलिदान की भावना से प्रेरित किया। स्वतंत्रता और मानव-मर्यादा के लिए उन्होंने जिस लगन और आत्म-विश्वास के साथ आंदोलन में भाग लिया, उससे राष्ट्र को एक नई जीवन-शक्ति मिली। महात्मा गांधी के नेतृत्व ने इसे एक संबल दिया। आंदोलन आगे बढ़ा और इसमें देश के युवकों का एक बड़ा वर्ग शामिल हो गया।

राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का उद्देश्य लोगों के सामने स्पष्ट था, किंतु इस आजादी का अभीष्ट क्या होगा, इसके बारे में तरह-तरह की धारण गाएँ थीं। आजादी को सीधे मानव जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ने की आवश्यकता कुछ युवकों ने पहली बार कांग्रेस के अंदर अभिव्यक्त की। आचार्य नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, फरीद अंसारी जैसे लोगों से आजादी को अन्याय और शोषण एवं विषमता से पीड़ित समाज के हित में आर्थिक नीतियों को एक नया रूप देने का प्रयास प्रारंभहुआ। कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना इसी आधार पर हुई। इन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए आजादी आने के बाद एक नए समाज की रचना की कल्पना को राष्ट्र के सामने रखने का प्रयत्न किया। मानव-मूल्यों, समता और स्वतंत्रता की पूर्ण अभिव्यक्ति तभी संभव है, जब मनुष्य के जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज के साधनों का सही रूप में उपयोग किया जाए। इसके लिए इन लोगों ने एक नई विचारधारा कांग्रेस के अंदर प्रारंभ की।

उस समय के युवकों में इस विचारधारा को अंगीकार करने की एक होड़-सी लग गई। श्री अर्जुन सिंह भदौरिया, जिन्हें हम कमांडर साहब के नाम से जानते हैं, समर्पित युवकों में से एक सुप्रसिद्ध व्यक्ति रहे हैं। इन्होंने जीवन के उतार-चढ़ाव को देखा है। संघर्ष की कठिनाइयों का सामना किया है। त्याग और समर्पित जीवन के साथ-साथ इन्हें अनेक लोगों के संपर्क में आने का अवसर मिला। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि इन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। उनके जीवन की कहानी उन अनेक युवकों की भावनाओं और आकांक्षाओं की गाथा है, जो आजादी को गाँव, गलियों और गरीब की झोंपड़ी तक पहुँचाने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे और जिसके लिए उन्होंने सब कुछ न्योछावर करने का संकल्प लिया। उनकी अभिव्यक्ति में एक क्रांतिकारी के जीवन की टीस है। उसमें मनुष्य के जीवन के सुख-दुख के अनुभव की एक गहरी संवेदना है। उन्होंने जिंदगी को निकट से देखा और स्वयं को उन अभागे लोगों के जीवन से जोड़ा, जो सब कुछ उत्सर्ग करने के बाद भी नए भविष्य की कल्पना की प्रतीक्षा में लगे रहे। उन्होंने जिस सहज भाव से अपनी बातों को रखा, वह हृदयग्राही है।

1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रोमाचंक दृश्य उन्होंने हमारे सामने बड़ी सफलता के साथ प्रस्तुत किए हैं। कमांडर साहब स्वयं इस सब में पूरी तरह जुटे रहे। इसी कारण उनकी अभिव्यक्ति में सरलता एवं स्वाभाविकता है। उनकी पूरी रचना केवल स्मृतियों की गाथा बनकर नहीं रह गई है, बल्कि इसमें उन्होंने उन सारी भावनाओं को समाविष्ट करने का प्रयास किया जिससे प्रेरित होकर उस समय के युवकों ने समता के समाज की कल्पना की थी और उसे रचने के लिए स्वयं को न्योछावर किया था।

आजादी के बाद उन्होंने सत्ता और उससे जुड़े लोगों को निकट से देखा। जनतंत्र में अनेक पदों पर रहकर एक अहम भूमिका निभाई। इस कारण उनकी बातों में पैनी दृष्टि है, साथ ही प्रामाणिकता भी।

कमांडर साहब की धर्मपत्नि श्रीमती सरला जी को भी मैं दशकों से जानता हूँ। गांधी जी के संपर्क में रहकर उन्होंने जो संवेदनशीलता प्राप्त की, वह अत्यंत सराहनीय है, किंतु समाजवादी आंदोलन में सहभागी होने के कारण उनके व्यक्तित्व की अपनी एक प्रखरता है, वह संवेदनशीलता और संघर्षशीलता का अनुपम समन्वय सरला जी के व्यक्तित्व में देखने को मिलता है। मैं ऐसा मानता हूँ कि यह जोड़ी स्वयं में अनुपम है, अभिनंदनीय है। मैं इतने निकटसंपर्क में रहते हुए भी कमांडर साहब की आश्चर्यजनक लेखनी के प्रभाव को पहले नहीं जान सका। उनकी वाणी के ओज को मैं जानता था। इस पुस्तक ने हमारे सामने उनके कलात्मक पक्ष को प्रस्तुत किया। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक को अधिक-से-अधिक लोग पढ़कर अतीत के प्रेरणास्रोतों से परिचित हो सकेंगे। भविष्य के सपनों को साकार करने में सक्षम हो सकेंगे। कमांडर साहब की जीवनगाथा से इस भावना की पुष्टि होती है।

नई दिल्ली

19 जून, 1991

संदर्भ पुस्तक –
चंबल के महानायक अर्जुन सिंह भदौरिया (कमांडर)
प्रकाशक ; नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया


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