‘आज की चुनौतियाँ और संपूर्ण क्रांति’ विषय पर आयोजित विचार-गोष्ठी का प्रारंभिक सत्र रिपोर्ट

0
Preliminary session report of the seminar organized on the topic "Today's Challenges and Total Revolution"

संपूर्ण क्रांति विचार मंच के तत्वावधान में आयोजित ऑनलाइन विचार-गोष्ठी का शुभारंभ संयोजक रामशरण ने स्वागत वक्तव्य के साथ किया। उन्होंने देशभर से जुड़े सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता एवं आम नागरिकों का स्वागत करते हुए कहा कि आज का भारत एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए लोग यह प्रश्न उठा रहे हैं कि आज की ‘अघोषित आपातकाल’ की स्थिति कहीं 1975 के घोषित आपातकाल से भी अधिक चिंताजनक तो नहीं है। समाज में व्याप्त इस चिंता और बेचैनी के बीच इन परिस्थितियों के वास्तविक कारणों पर चिंतन की आवश्यकता है।

रामशरण ने कहा कि केवल वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की आलोचना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि हम आत्ममंथन करें कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जिन आदर्शों और लक्ष्यों को लेकर हम आगे बढ़े थे, उनमें कहाँ चूक हुई। क्या हमारी अपनी राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समझ में कोई कमी रह गई, अथवा अन्य सामाजिक-राजनीतिक कारणों ने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया? इन प्रश्नों का वस्तुपरक विश्लेषण किए बिना भविष्य की दिशा निर्धारित नहीं की जा सकती।

उन्होंने स्पष्ट किया कि संपूर्ण क्रांति विचार मंच का उद्देश्य केवल समसामयिक समस्याओं की चर्चा करना नहीं है, बल्कि उनके मूल कारणों का विश्लेषण करते हुए समाधान की दिशा तलाशना है। इसी उद्देश्य से मंच ने विचार-गोष्ठियों की एक श्रृंखला प्रारंभ की है, जिसमें संपूर्ण क्रांति के मूल उद्देश्यों, उसके कार्यक्रमों तथा उसकी सीमाओं पर विमर्श किया जाएगा।

अपने स्वागत भाषण में रामशरण ने मुख्य वक्ता प्रो. आनंद कुमार का परिचय देते हुए कहा कि वे 1974 के छात्र आंदोलन के सक्रिय नेताओं में रहे हैं तथा आज भी समाजवादी आंदोलन के प्रमुख विचारकों और मार्गदर्शकों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अपने लंबे शैक्षणिक जीवन के दौरान उन्होंने समाजशास्त्र और सामाजिक आंदोलनों के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रो. आनंद कुमार अपने अनुभवों और विश्लेषण के आधार पर संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लक्ष्यों, उसकी कार्यपद्धति, उपलब्धियों तथा कमियों पर प्रकाश डालेंगे और यह बताएँगे कि वर्तमान परिस्थितियों में उन आदर्शों को किस प्रकार नए संदर्भों में आगे बढ़ाया जा सकता है।

अंत में रामशरण ने बताया कि व्याख्यान के उपरांत प्रतिभागियों को प्रश्न पूछने तथा संक्षिप्त टिप्पणियाँ रखने का अवसर दिया जाएगा। उन्होंने आशा व्यक्त की कि लगभग डेढ़ घंटे का यह संवाद देश की समकालीन चुनौतियों और संपूर्ण क्रांति की प्रासंगिकता पर सार्थक विचार-विमर्श का माध्यम बनेगा। इसके बाद उन्होंने प्रो. आनंद कुमार से अपने विचार रखने का आग्रह करते हुए कार्यक्रम के मुख्य सत्र का शुभारंभ किया।

मुख्य वक्ता प्रो. आनंद कुमार ने अपने संबोधन की शुरुआत सभी प्रतिभागियों का अभिवादन करते हुए की तथा कार्यक्रम आयोजित करने के लिए श्री रामशरण के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आज “मौजूदा चुनौतियाँ और संपूर्ण क्रांति” विषय पर विचार रखने का अवसर मिला है। उनके अनुसार वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि प्रत्येक संवेदनशील नागरिक अपने अनुभवों के आधार पर बेचैनी महसूस कर रहा है। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज, संगठन और संस्कृति की वर्तमान स्थिति को लेकर निश्चिंत हैं।

उन्होंने कहा कि अधिकांश लोगों को यह महसूस हो रहा है कि देश जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति में एक राष्ट्र, एक सरकार और एक नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि आज देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में आर्थिक संकट प्रमुख है। उनके अनुसार वर्तमान अर्थव्यवस्था रोजगार-विहीन होती जा रही है तथा लोगों की आमदनी बढ़ने के बजाय घट रही है। जो मध्यम वर्ग पहले आशावादी था, वह भी अब निराशा का अनुभव कर रहा है, क्योंकि दैनिक जीवन का खर्च लगातार बढ़ रहा है जबकि आय और रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जो सीमित रोजगार उपलब्ध भी हो रहे हैं, उनमें भ्रष्टाचार, राजनीतिक हस्तक्षेप और भाई-भतीजावाद जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। ऐसी परिस्थितियों ने लोगों के मन से भविष्य के प्रति आशा का भाव कम कर दिया है।

राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत लोकतंत्र है, लेकिन लोकतंत्र की आड़ में एक ऐसा ढाँचा विकसित हो रहा है जिसमें नागरिकों की सुनवाई नहीं हो रही है और कानूनों का महत्व लगातार कम होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चार स्तंभों में से तीन कमजोर पड़ चुके हैं और विशेष रूप से न्यायपालिका की स्थिति को लेकर समाज में व्यापक चिंता व्यक्त की जा रही है।

अपने वक्तव्य में प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के जिन आदर्शों को स्थापित किया, वे आज पूरी दुनिया के लिए स्वीकार्य मूल्य बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य का समाज ऐसा होना चाहिए जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा दे।

उन्होंने बताया कि 5 जून 1974 को पटना की विशाल रैली में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पहली बार “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया। उस समय उन्होंने कहा था कि देश की परिस्थितियाँ अत्यंत चिंताजनक हैं और छोटे-मोटे सुधारों से काम नहीं चलेगा, बल्कि संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है।

प्रो. आनंद कुमार ने जयप्रकाश नारायण के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ लोग संपूर्ण क्रांति को दिवास्वप्न मानते थे, किंतु जयप्रकाश जी का स्पष्ट मत था कि जो व्यक्ति सपने देखना छोड़ देता है, वह कभी क्रांतिकारी नहीं बन सकता। उन्होंने जीपी के जेल डायरी का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभात देर से ही सही, लेकिन होता अवश्य है। उन्होंने युवाओं को संपूर्ण क्रांति का इंजन बताते हुए कहा था कि समाज में नए मूल्यों की स्थापना, सामाजिक कुरीतियों, छुआछूत, तिलक, दहेज और जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष का दायित्व युवाओं पर है।

उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण किसी राजनीतिक दल के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने के पक्षधर नहीं थे। उनका आग्रह था कि ऐसा स्वतंत्र संगठन बने, जिसे सत्ता प्राप्त करने की लालसा न हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने’ छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी’ तथा संपूर्ण क्रांति के कार्यकर्ताओं के संगठन की कल्पना की और युवाओं का आह्वान किया कि वे इस आंदोलन से जुड़ें। उन्होंने कहा कि संपूर्ण क्रांति एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके लिए गांव-गांव, शहर-शहर और विद्यालयों तक संगठन खड़ा करना आवश्यक है।

प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि संपूर्ण क्रांति का सपना कभी समाप्त होने वाला सपना नहीं था, बल्कि यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया थी। उन्होंने बताया कि 6 मार्च 1975 को जयप्रकाश नारायण ने सामाजिक-आर्थिक अधिकारों, लोकतंत्र, चुनाव सुधार, शिक्षा सुधार तथा भ्रष्टाचार-निरोध से संबंधित अनेक ठोस सुझाव प्रस्तुत किए थे। इसके साथ ही बिहार के नवनिर्माण के लिए भी एक घोषणा-पत्र तैयार किया गया था, जिसमें संपूर्ण क्रांति के व्यावहारिक पक्षों को सामने रखा गया।

उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण को इन विचारों को आगे बढ़ाने के लिए बहुत कम समय मिला। उन्होंने बिहार आंदोलन के दौरान निर्दलीयता, अहिंसा और अनुशासन पर विशेष बल दिया। विभिन्न छात्र और युवा संगठनों ने राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर आंदोलन को प्राथमिकता दी और पूरे आंदोलन में अहिंसा तथा अनुशासन बनाए रखने का प्रयास किया। उन्होंने पटना की रैली तथा बिहार बंद जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय की तैयारी के बाद आंदोलन आगे बढ़ा, लेकिन 25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने के कारण उसे आगे विकसित होने का अवसर नहीं मिला। जयप्रकाश नारायण सहित देशभर के अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।

उन्होंने कहा कि संपूर्ण क्रांति के विचार को समझने के लिए जयप्रकाश नारायण की जेल डायरी, उनके संपूर्ण लेखन, जीवनी तथा आपातकाल से संबंधित पुस्तकों का अध्ययन किया जाना चाहिए। साथ ही गांधी मार्ग जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री भी इस विषय को समझने में सहायक है।

प्रो. आनंद कुमार ने वर्तमान परिस्थितियों की चर्चा करते हुए कहा कि लोकतंत्र की आधारशिला चुनाव है, इसलिए चुनाव सुधार आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका तथा चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं और राजनीतिक सुधार के बिना लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि आज की परिस्थितियों और आपातकाल के समय में एक समानता यह दिखाई देती है कि सत्ता का विरोध करने वालों को भय और दबाव का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार देश में भय का वातावरण है, किंतु ऐसी स्थिति स्थायी नहीं रह सकती।

उन्होंने कहा कि संपूर्ण क्रांति का सार यह था कि परिवार, गांव और समाज से लेकर पूरे देश में बुनियादी परिवर्तन किए जाएँ। इसकी आधारशिला चुनाव सुधार है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति युवाओं का आदर्शवाद है। उन्होंने किसानों, मजदूरों और युवाओं के आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संघर्षों के बीच व्यापक सामाजिक एकता का निर्माण अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन की कुछ उपलब्धियाँ अवश्य रहीं। अनेक युवाओं ने जाति से ऊपर उठकर विवाह किए, तिलक-दहेज और सांप्रदायिकता से दूरी बनाई, किंतु इन मूल्यों का व्यापक सामाजिक आधार नहीं बन पाया। उन्होंने इसका एक कारण सत्ता के आकर्षण को बताया और कहा कि समाज में बुनियादी परिवर्तन के लिए त्याग की अपेक्षा तात्कालिक राहत की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।

अपने वक्तव्य के समापन में प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि देश के सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं, जो बुनियादी परिवर्तन की मांग करती हैं। उन्होंने कहा कि संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में स्थापित करना, जनता का सच्चा राज कायम करना तथा सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक परिवर्तन लाना था। उनके अनुसार यह कठिन कार्य अवश्य है, लेकिन आवश्यक भी है। उन्होंने कहा कि आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में परिवर्तन के लिए युवाओं को आगे आना होगा और किसी भी आंदोलन को अंतिम आंदोलन मानने के बजाय निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।

वक्तव्य समाप्त होने के बाद संयोजक रामशरण ने प्रो. आनंद कुमार का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यह चर्चा यहीं समाप्त होने वाली नहीं है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा। इसके बाद प्रतिभागियों से प्रश्न आमंत्रित किए गए।

प्रश्नोत्तर सत्र में एक प्रतिभागी ने यह प्रश्न उठाया कि आजकल यह कहा जाता है कि जयप्रकाश नारायण ने जनसंघ अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आगे बढ़ाने का कार्य किया। इस पर प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि इस विषय पर कुमार प्रशांत द्वारा लिखे गए एक लेख का उल्लेख किया जा सकता है, जिसमें आंदोलन की परिस्थितियों और जयप्रकाश नारायण की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने कहा कि उस समय विभिन्न राजनीतिक दल आंदोलन में शामिल थे, किंतु जयप्रकाश नारायण स्वयं गांधी के मार्ग पर चलने की बात करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि जयप्रकाश नारायण के संदर्भ में लगाए जाने वाले आरोपों को उस समय की परिस्थितियों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर समझना चाहिए।

इस चरण में चर्चा मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रही—वर्तमान समय में युवाओं की भूमिका, आंदोलनों के आदर्श और सत्ता के बीच का संबंध, तथा समकालीन लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति समाजवादी दृष्टिकोण।

उत्तर भारत के युवाओं में आंदोलनात्मक ऊर्जा क्यों कम दिखाई देती है?

अजय कुमार ने प्रश्न उठाया कि गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने देश की राजनीति को बदल दिया था, लेकिन आज जबकि शिक्षा, बेरोज़गारी और सामाजिक संकट कहीं अधिक गहरे हैं, तब भी उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में वैसी व्यापक छात्र शक्ति क्यों दिखाई नहीं देती।

उत्तर में प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि इतिहास में आंदोलन केवल समस्याओं से नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और आशा के निर्माण से पैदा होते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 1971 के बाद विपक्ष पराजित था, समाजवादी आंदोलन बिखर चुका था और युवाओं में गहरी निराशा थी। उसी निराशा के बीच जयप्रकाश नारायण आशा के केंद्र बनकर उभरे।

उन्होंने कहा कि आज भी समाज में असंतोष अनेक रूपों में मौजूद है—किसान आंदोलन, आदिवासी क्षेत्रों के संघर्ष, लद्दाख और उत्तर-पूर्व के सवाल, नागरिक अधिकारों के आंदोलन तथा आरटीआई कार्यकर्ताओं की सक्रियता इसके उदाहरण हैं। लेकिन जब तक विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी संगठित होकर सक्रिय भूमिका नहीं निभाएँगे, तब तक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की संभावना सीमित रहेगी।

उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक आंदोलनों की लहर कब और कहाँ से उठेगी, इसका पूर्वानुमान लगाना कठिन है, लेकिन परिस्थितियाँ संकेत दे रही हैं कि भविष्य में नई जनलहर अवश्य बनेगी।

क्या हर आंदोलन अंततः सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाता है?

ओम द्विवेदी ने प्रश्न किया कि जयप्रकाश आंदोलन हो या अन्ना आंदोलन—दोनों में शामिल अनेक लोग अंततः सत्ता में पहुँचे, लेकिन आंदोलन के मूल आदर्श पीछे छूट गए। क्या हर आंदोलन का यही हश्र होता है?

प्रो. आनंद कुमार ने उत्तर देते हुए कहा कि यह केवल जेपी आंदोलन की नहीं, बल्कि विश्व इतिहास के लगभग हर बड़े आंदोलन की कहानी है।

उन्होंने उदाहरण दिए—
• रूसी क्रांति के बाद ट्रॉट्स्कीवादियों ने स्टालिन पर क्रांति को भटकाने का आरोप लगाया।
• गांधीवादी मानते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के कई आदर्श सत्ता प्राप्ति के बाद कमजोर पड़ गए।
• माओवादी वामपंथियों ने संसदीय वामपंथ की आलोचना की।
• डॉ. आंबेडकर के बाद दलित राजनीति में भी अनेक समझौते हुए, लेकिन उसी परंपरा से कांशीराम और मायावती जैसी नई नेतृत्वकारी शक्तियाँ भी उभरीं।

उन्होंने कहा कि आंदोलन का आदर्श और उसके बाद होने वाले राजनीतिक समझौते—दोनों इतिहास की वास्तविकताएँ हैं। आदर्श कभी समाप्त नहीं होते; वे हर नई पीढ़ी में नए रूप में पुनर्जीवित होते हैं। इसलिए केवल समझौतों को देखकर आंदोलनों के महत्व को नकारना उचित नहीं होगा।

क्या चुनावों के विकल्प के रूप में असहयोग आंदोलन फिर उभर सकता है?

प्रतीक पंकज ने प्रश्न किया कि यदि चुनावी व्यवस्था लगातार अधिक नियंत्रित और असमान होती जा रही है, तो क्या भविष्य में राजनीतिक दल पुनः असहयोग या गैर-सहयोग जैसे आंदोलनों की ओर बढ़ सकते हैं?

प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि यदि समाज में ऐसी व्यापक मांग पैदा होगी, तो राजनीतिक दलों को भी उस दिशा में बढ़ना पड़ेगा।
उन्होंने 1937 और 1939 का उदाहरण देते हुए बताया कि कांग्रेस ने पहले चुनाव लड़े, लेकिन परिस्थितियाँ बदलने पर गांधी के आह्वान पर सरकारों से इस्तीफा देकर सत्याग्रह का रास्ता भी अपनाया।

उन्होंने कहा कि आज भी अनेक लोग सांप्रदायिकता, कॉरपोरेट पूंजीवाद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण से चिंतित हैं, लेकिन अधिकांश विपक्षी दल अभी भी चुनावी प्रक्रिया से परिवर्तन की आशा रखते हैं। यदि वह आशा टूटेगी, तब नई राजनीतिक रणनीतियाँ जन्म लेंगी।

उन्होंने आपातकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रारंभ में लोग भयभीत थे, लेकिन जब दमन बढ़ा, तब जनता स्वयं आंदोलन में उतर आई। उनके अनुसार सामाजिक विस्फोट तब आता है जब जनता स्वयं परिवर्तन का निर्णय लेती है।
व्यक्तिगत परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन का संबंध

सुधीर गंडोत्रा ने कहा कि अधिकांश क्रांतियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं क्योंकि व्यक्ति स्वयं नहीं बदलता। यदि सत्ता में पहुँचने वाला व्यक्ति भीतर से परिवर्तित नहीं होगा, तो वह अंततः सत्ता के मोह में फँस जाएगा।

उन्होंने “साइलोस” और अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थायी सामाजिक परिवर्तन के लिए व्यक्ति और समाज—दोनों का समानांतर परिवर्तन आवश्यक है।

प्रो. आनंद कुमार ने इस विचार का स्वागत किया और कहा कि विश्व के अनेक देशों में मानवतावादी विकल्पों पर गंभीर कार्य हो रहा है तथा ऐसे प्रयास लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान और वर्तमान छात्र आंदोलन

डॉ. रज़िया पटेल ने सुझाव दिया कि वर्तमान छात्र आंदोलन को व्यापक लोकतांत्रिक समर्थन मिलना चाहिए और लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान को उसके साथ खुलकर खड़ा होना चाहिए।

प्रो. आनंद कुमार ने बताया कि लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान तथा समाजवादी समागम पहले ही इस आंदोलन के समर्थन में सक्रिय हैं। प्रतिनिधिमंडल आंदोलन स्थल पर जा चुका है और प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे गए हैं। उन्होंने कहा कि उद्देश्य किसी आंदोलन पर नेतृत्व थोपना नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक ऊर्जा को मजबूत करना होना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा—

“इस आंदोलन में गांधी, लोहिया या जयप्रकाश जैसा नेतृत्व नहीं है, लेकिन यही छोटी-सी दीपशिखा आज की सबसे बड़ी आशा है। इसकी आलोचना करने के बजाय इसे बेहतर बनाने में सहयोग देना चाहिए।”

आत्मालोचना और जनाधार की आवश्यकता

डॉ. रज़िया पटेल ने यह भी प्रश्न उठाया कि आंदोलनों की असफलताओं, वैचारिक कमजोरियों और जनाधार के क्षरण पर पर्याप्त आत्मालोचना नहीं होती। साथ ही उन्होंने कहा कि कई सामाजिक आंदोलन धीरे-धीरे वैचारिक जनआंदोलन से अधिक एनजीओ आधारित गतिविधियों में बदल गए हैं।

इस पर प्रो. आनंद कुमार ने स्वीकार किया कि किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसका जनाधार होता है।
उन्होंने स्मरण कराया कि 1974 में भी जयप्रकाश नारायण की प्रारंभिक सभाओं में बहुत कम लोग आते थे, लेकिन निरंतर जनसंपर्क और जनता के विश्वास ने कुछ ही महीनों में उसे विशाल जनांदोलन में बदल दिया।

उन्होंने कहा कि आज भी आवश्यक है कि आंदोलन अपनी सामाजिक पहुँच बढ़ाएँ, जनता के बीच जाएँ और अपने आचरण से विश्वास अर्जित करें। सत्ता प्राप्त करना ही सफलता का मापदंड नहीं है; यदि आंदोलन नई पीढ़ी को दिशा दे सके, तो वही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

बैठक के अंतिम चरण में चर्चा आंदोलन की रणनीति, राजनीतिक दलों की भूमिकालोकतांत्रिक एकता तथा वर्तमान छात्र आंदोलनों के समर्थन जैसे व्यावहारिक प्रश्नों पर केंद्रित रही। प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए प्रो. आनंद कुमार ने संपूर्ण क्रांति की मूल भावना को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ने का प्रयास किया।

संपूर्ण क्रांति का आंदोलन दलों से ऊपर होना चाहिए

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. संत प्रकाश के प्रश्न के उत्तर में प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि जयप्रकाश नारायण की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक समझ यह थी कि संपूर्ण क्रांति का आंदोलन किसी राजनीतिक दल का विस्तार नहीं, बल्कि जनता का स्वतंत्र आंदोलन होगा। उसमें विभिन्न विचारधाराओं और दलों के लोग भाग ले सकते हैं, किंतु उन्हें अपने दलगत आग्रहों से ऊपर उठकर काम करना होगा।

उन्होंने कहा कि जनता केवल उन्हीं लोगों पर विश्वास करती है जो व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए काम करते हैं। यदि आंदोलनकारी भी सत्ता या पद प्राप्ति की आकांक्षा से प्रेरित होंगे, तो जनता उन पर भरोसा नहीं करेगी। समाज पहले भी चालाक नेताओं से निराश हो चुका है; इसलिए आज ईमानदार, निस्वार्थ और जनता के प्रति उत्तरदायी नेतृत्व की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन का उद्देश्य प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनना नहीं, बल्कि जनता का प्रवक्ता बनना है।
राजनीति में पराजय अंत नहीं होती

प्रो. आनंद कुमार ने खेल का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी प्रतियोगिता में टीम हार जाती है तो उसे समाप्त नहीं किया जाता; बल्कि बेहतर प्रशिक्षण, बेहतर नेतृत्व और नए खिलाड़ियों के साथ उसे फिर तैयार किया जाता है। इसी प्रकार राजनीतिक आंदोलनों को भी असफलताओं से सीखकर स्वयं को अधिक सक्षम बनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन का अंतिम उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें लोगों को शिक्षा, रोजगार, बिजली, पानी और सम्मानजनक जीवन मिल सके।

व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकता

वरिष्ठ गांधीवादी एवं लोकशक्ति अभियान के नेता प्रफुल्ल सामंतरा ने प्रश्न उठाया कि वर्तमान परिस्थितियाँ आपातकाल से भी अधिक गंभीर प्रतीत होती हैं। राजनीतिक दलों की नैतिक विश्वसनीयता कमज़ोर हुई है, ऐसे में लोकतंत्र, समानता, बेरोज़गारी और कॉरपोरेट लूट जैसे प्रश्नों पर एक राष्ट्रीय आंदोलन कैसे खड़ा किया जा सकता है?

उत्तर में प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि बड़े आंदोलन अचानक नहीं बनते। किसान जिस प्रकार अलग-अलग खेतों में अनेक बीज बोता है, जिनमें से कुछ अंकुरित होते हैं और कुछ नहीं, उसी प्रकार समाज में भी अनेक छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े आंदोलन का आधार बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि इस समय पहली आवश्यकता यह है कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वाली सभी शक्तियाँ एक साझा मंच पर आएँ। लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा तभी समाजवाद, समान शिक्षा और सामाजिक न्याय की संभावनाएँ भी सुरक्षित रहेंगी।

कॉमन एजेंडा की आवश्यकता

प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि चुनाव सुधार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, महँगाई और रोजगार जैसे प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने जेपी आंदोलन के समय थे। इसलिए आज की परिस्थितियों में एक कॉमन एजेंडा (साझा कार्यक्रम) तैयार करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद विभिन्न लोकतांत्रिक समूहों के बीच संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से एक नेशनल मेंटर ग्रुप भी बनाया गया है। उन्होंने कहा कि चाहे राजनीतिक दल हों या सामाजिक संगठन—सबको परिवर्तनकारी राजनीति के लिए सहयोग की भावना विकसित करनी होगी।

उन्होंने प्रभुल्ल सामंतरा जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के लंबे संघर्ष और नैतिक नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे लोगों के अनुभव से नई पीढ़ी को दिशा मिल सकती है।

छात्र आंदोलन के समर्थन में सक्रिय सहयोग

सामाजिक कार्यकर्ता मीनाक्षी ने सुझाव दिया कि दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलन का केवल नैतिक समर्थन पर्याप्त नहीं है; लोकतांत्रिक संगठनों को अधिक सक्रिय सहयोग देना चाहिए।

प्रो. आनंद कुमार ने उनके सुझाव का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी आंदोलन को केवल नेतृत्व ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक समर्थन की भी आवश्यकता होती है। उन्होंने अन्ना हज़ारे आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि जब अनशन लंबा खिंच गया था, तब नागरिक समाज ने हस्तक्षेप कर आंदोलन को नई रणनीति देने का प्रयास किया था।

उन्होंने प्रस्ताव रखा कि लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान, समाजवादी समागम तथा अन्य सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों का एक समूह छात्र आंदोलन के नेतृत्व से मिलकर उनसे आग्रह करे कि वे अपने अनशन को समाप्त करें और आंदोलन को अगले चरण में संगठित रूप से आगे बढ़ाएँ। उन्होंने कहा कि आंदोलन की नैतिक शक्ति बनाए रखते हुए नेतृत्व की सुरक्षा भी आवश्यक है।
उनके अनुसार, यदि व्यापक लोकतांत्रिक समाज इस आंदोलन के साथ खड़ा होगा तो उसकी जनशक्ति और नैतिक शक्ति दोनों बढ़ेंगी।

चर्चा का समापन और आगे की दिशा

बैठक के संयोजक रामशरण ने समापन करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम किसी निष्कर्ष का अंत नहीं, बल्कि एक निरंतर संवाद की शुरुआत है। उन्होंने बताया कि चर्चा की विस्तृत रिपोर्ट सभी प्रतिभागियों तक पहुँचाई जाएगी और “संपूर्ण क्रांति विचार मंच” के व्हाट्सऐप समूह में सभी सदस्य अपने विचार और सुझाव साझा कर सकते हैं।

उन्होंने प्रस्ताव रखा कि मंच की बैठकें नियमित रूप से प्रत्येक महीने आयोजित की जाएँ और वर्तमान छात्र आंदोलन के समर्थन में एक सार्वजनिक अपील जारी की जाए। साथ ही दिल्ली के साथियों की एक बैठक बुलाकर यह तय किया जाए कि आंदोलन को किस प्रकार व्यावहारिक सहयोग दिया जा सकता है।

अंत में उन्होंने कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग और रिपोर्ट तैयार करने में सहयोग देने वाले साथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया तथा प्रो. आनंद कुमार के प्रति सभी प्रतिभागियों की ओर से आभार व्यक्त किया।

अपने समापन वक्तव्य में प्रो. आनंद कुमार ने सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद देते हुए कहा कि संपूर्ण क्रांति का विचार आज भी जीवित है। आवश्यकता केवल इतनी है कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनसंगठन की शक्ति पर विश्वास बनाए रखते हुए छोटे-छोटे प्रयासों को एक व्यापक राष्ट्रीय विकल्प में रूपांतरित किया जाए। यही आज के समय में जयप्रकाश नारायण की विरासत का सबसे सार्थक सम्मान होगा।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment