सोनम वांगचुक: सत्य के लिए संघर्ष – डॉ योगेन्द्र

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Sonam Wangchuk

क्या भारत में एक अनशनकारी शहीद हो जायेगा? क्या सरकार अंधी- बहरी हो गई है? क्या शांतिपूर्ण आंदोलन का कोई मतलब नहीं रह जाएगा? बारह- तेरह दिन बीत गये । लद्दाख के सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे हैं । प्रधानमंत्री अपने विदेशी फ़ैशन शो पर जा रहे हैं, आ रहे हैं । सरकार , मीडिया और आर एस एस की पूरी कोशिश है कि किस तरह चंदा चोरों के गिरोह को बचाये जायें। आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में बनारस की गंगा ने बुलाया था। सच्चाई यह था कि बेचारी गंगा बनारस में प्रदूषण से अधमरी हो गई है, वह किसी को क्यों बुलायेगी? गंगा ने अपने दो सपूतों को शहीद होते देखा है। एक हरिद्वार के मातृसदन के थे स्वामी निगमानंद । वे बाईस- तेईस वर्षीय युवक थे । गंगा में हो रहे प्रदूषण के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर बैठे । किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। सरकार और लोग तमाशबीन रहे और उनकी शहादत हो गई । इसीतरह जी डी अग्रवाल आमरण अनशन पर बैठे और शहीद हो गए । जी डी अग्रवाल आई आई टी ले सिविल इंजीनियरिंग, पर्यावरण विभाग में प्राध्यापक, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में प्रथम सचिव और राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के सलाहकार भी रह चुके थे। दोनों की शहादत से भी सरकार की आँखें नहीं खुलीं । सरकार अपने तरीक़े से गंगा नमामि के ज़रिए लूट मचाती रही और गंगा पहले से और ज़्यादा प्रदूषित होती गई । आप यह भी जान लीजिए कि मनमोहन सिंह की सरकार ने 2012 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है । घोषणा से अगर हालात सुधर जाते तो स्वर्ग के देवता स्वर्ग में झख नहीं मारते, वे सब इकट्ठे भारत की धरती पर उतर आते। भारत में और चीज़ों की भले कमी हो, घोषणावीरों की कोई कमी नहीं है।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के लिए सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं । सोनम वांगचुक चर्चित पर्यावरणविद, इंजीनियर और शिक्षा सुधारक हैं । उन्होंने सरकारी स्कूलों की शिक्षा में सुधार के लिए ‘ आपरेशन न्यू होप’ कार्यक्रम शुरू किया था । सोनम ने बर्फ-स्तूप तकनीक का आविष्कार किया है जो कृत्रिम हिमनदों (ग्लेशियरों) का निर्माण करता है। शंकु आकार के इन बर्फ के ढेरों को सर्दियों के पानी को संचय करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है । स्वामी निगमानंद, जी डी अग्रवाल और सोनम वांगचुक देश के बेहतरीन शख्सियतों में से एक हैं, लेकिन उनकी ज़रूरी आवाज़ को सत्ता में बैठे लोग सुनने से इंकार करते रहे हैं । गर्व और गुमान में सत्ता होश खो बैठी है। सोनम वांगचुक राजनीति की मुख्यधारा के खिलाफ बैठे हैं । मुख्यधारा की राजनीति में जिनको मौज लूटना है, वे भाग भाग कर फेविकॉल की तरह सत्ता से चिपकते जा रहे हैं । धारा के विपरीत चलने में अपार कष्ट है, लेकिन यही धारा देश और दुनिया को रास्ता सुझाती है । रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि यदि तुम्हारी डाक कोई न सुने तो एकला चलो रे।

यदि तुम्हारी पुकार सुनकर कोई न आए, तो अकेले चलो रे!
यदि कोई बात न करे, यदि सब डर के मारे मुँह फेर लें,
तो तुम अपना हृदय खोलकर अपनी बात अकेले कहो रे!
यदि सब पीछे लौट जाएं, तो अपने रक्तरंजित चरणों के साथ अकेले आगे बढ़ो रे!

सोनम वांगचुक का हश्र जो हो। वे अगर शहीद भी हो गए तो उनका जीवन सार्थक होगा । मगर वे लोग जो यह सब देख कर चुप हैं या कम से कम कुनमुना भी नहीं रहे और सत्ता के झूठ और अन्याय के सामने नतमस्तक हैं, उन्हें एक दिन लगेगा कि अपनी ही लाश को अपने कंधे पर ढो रहे थे। निरर्थकता बोध से जीवन व्यर्थ न प्रतीत हो, इसके लिए सच का साथ दें।


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