— रणधीर कुमार गौतम —
पिछले कुछ समय से सोनम वांगचुक के आंदोलन के प्रति सहानुभूति का भाव दिखाई देने लगा है। यह एक तरह से उस आशा की किरण का संकेत है, जो हर कठिन समय में उभरकर सामने आती है। गांधीवादी परिवर्तनकारी सोच ऐसे समय में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जब किसी आंदोलन की ऊर्जा संयम, सत्याग्रह और शांति के माध्यम से परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है, तब यह लोकतांत्रिक परंपरा की उस निरंतरता का भी आभास कराती है, जो राजनीतिक दलों के बाहर भी जीवित रहती है।
शुरुआती दौर में CJP आंदोलन के प्रखर आलोचक रहे लोग भी अब इस आंदोलन में अपने विश्वास और उम्मीद को देखने लगे हैं। देखते-ही-देखते सोनम वांगचुक उस निराशा से बहुत आगे निकल गए, जिसमें यह मान लिया गया था कि अब इस देश का कुछ नहीं हो सकता। उनकी आलोचनाएँ पीछे छूटती चली गईं। लगभग हर सफल जनांदोलन के नायकों के साथ ऐसा ही होता है।
इंडियन एक्सप्रेस के सौरभ द्विवेदी के साक्षात्कार को देखने पर यह भी स्पष्ट होता है कि आज के अनेक युवाओं की राजनीतिक पाठशाला इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के बाद बनी। किसी भी जन आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उससे निकली राजनीतिक पार्टी सत्ता में आकर क्या कर पाई। उसका आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उस आंदोलन ने कितने नए युवाओं को राजनीति, लोकतंत्र और जनसरोकारों से जोड़ने का काम किया।
जैसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मूल्यांकन केवल कांग्रेस पार्टी की सफलताओं और असफलताओं के आधार पर नहीं किया जा सकता, और न ही जयप्रकाश आंदोलन को केवल जनता पार्टी के मूल्यांकन तक सीमित किया जा सकता है; उसी प्रकार अन्ना आंदोलन को भी केवल आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
जन आंदोलन का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि उसने समाज में कितनी राजनीतिक चेतना पैदा की, कितने नए युवाओं को सार्वजनिक जीवन और राजनीति से जोड़ा, और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा जनभागीदारी को कितना सशक्त बनाया।
आंदोलनों के माध्यम से युवाओं का राजनीतिक समाजीकरण होता है और बाद में वे गैर-दलीय एवं दलीय राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़कर भी राष्ट्र-निर्माण में योगदान देते हैं। आरटीआई आंदोलन से जुड़े हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
CJP आंदोलन से जुड़े अनेक युवा आज भी विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक पहलों के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं।
जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है, उसका विस्तार भी हो रहा है। धीरे-धीरे बॉलीवुड से लेकर अन्य प्रसिद्ध हस्तियों तक ने भी अपना समर्थन व्यक्त करना शुरू कर दिया है। सामान्यतः बॉलीवुड लोकप्रिय जनमत को ध्यान में रखते हुए ही अपनी सार्वजनिक प्रतिक्रिया देता है।
शुरुआत में इस पूरे आंदोलन को जैनजी प्रोटेस्ट के संदर्भ में देखा जा रहा था, लेकिन सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके सहित उनके साथियों ने इसे एक व्यापक ऐतिहासिक मोड़ देने की दिशा में आगे बढ़ाया है।
इस आंदोलन की व्याख्या करते समय कुछ सैद्धांतिक प्रश्नों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। मेरी एक प्रारंभिक परिकल्पना यह है कि इस प्रकार के आंदोलनों का राजनीतिक लाभ प्रायः भाजपा उठा लेती है, जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाती। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? कांग्रेस सिविल सोसाइटी के आंदोलनों से राजनीतिक ऊर्जा क्यों नहीं प्राप्त कर पाती?
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस आंदोलन नहीं करती, लेकिन वह अपने आंदोलनों को दीर्घकालिक संगठनात्मक शक्ति में बदलने में सफल नहीं हो पाती। उदाहरण के लिए, राहुल गांधी की पदयात्राओं में लाखों लोग शामिल हुए, किंतु यात्राओं के बाद उस ऊर्जा को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलने की प्रक्रिया कमजोर दिखाई दी। कांग्रेस को राजसत्ता और जनांदोलन के बीच के संबंधों, उनके सामाजिक आधार तथा संगठनात्मक सिद्धांतों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा।
क्या इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि कांग्रेस मूलतः एक mass-based पार्टी रही है और उसने स्वयं को कभी cadre-based पार्टी के रूप में विकसित नहीं किया? 1969 के विभाजन के बाद कांग्रेस संगठन के विज्ञान को व्यवस्थित रूप से विकसित नहीं कर सकी। यह भी देखने की आवश्यकता है कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी की अस्मिता उनके व्यक्तिगत और सामाजिक सरोकारों को किस सीमा तक संबोधित करती है। इस दृष्टि से भाजपा की तुलना में कांग्रेस अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है।
कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के भीतर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य और परंपराएँ कहीं-न-कहीं उसकी संगठनात्मक अस्मिता का आधार थीं। धीरे-धीरे यह आधार व्यक्तिकेंद्रित होता गया और बाद के दौर में यह केवल गैर-भाजपाई राजनीति तक सीमित होकर रह गया।
प्रश्न यह है कि राजनीतिक दलों में वैचारिक प्रक्रियाएँ और वैचारिक प्रतिबद्धता कैसे निर्मित होती हैं। इस संदर्भ में डॉ. राममनोहर लोहिया का कथन प्रासंगिक है—राजनीति में दो प्रकार के लोग आते हैं: एक वे, जो कुछ करने के लिए आते हैं, और दूसरे वे, जो कुछ बनने के लिए आते हैं। किसी भी राजनीतिक दल की दिशा इस बात से तय होती है कि उसमें किस प्रकार की राजनीतिक शक्ति और किस प्रकार की प्रेरणा अधिक प्रभावशाली है। यही वह पक्ष है, जिस पर कांग्रेस को सबसे अधिक आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
भाजपा सत्ता में रहते हुए भी संगठन के विस्तार को अधिक महत्व देती है। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद उसकी राजनीति केवल सत्ता-केंद्रित नहीं है। वह कार्यकर्ताओं के निर्माण और संगठन के विस्तार के अनेक आयाम विकसित करती रहती है। कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण से लेकर शिक्षा, राजनीतिक कार्यक्रमों और देश के विभिन्न सांस्कृतिक प्रश्नों पर उसके पास एक स्पष्ट वैचारिक दृष्टिकोण है। अल्पसंख्यकों के प्रश्न पर भी उसकी एक निश्चित राजनीतिक समझ और रणनीति दिखाई देती है। कहीं-न-कहीं उसके भीतर एक मिशनरी मॉडल काम करता है। यही कारण है कि वैचारिक रूप से भिन्न होने के बावजूद वह स्वामी विवेकानंद से लेकर अनेकों राष्ट्र नायको के प्रतीकों और विचारों का अपने संगठनात्मक विस्तार के लिए किसी-न-किसी रूप में उपयोग कर लेती है।
इसके विपरीत, कांग्रेस के सामने कभी रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से स्वराज के निर्माण का जो संकल्प था, वह आज दिखाई नहीं देता। उसकी राजनीति का बड़ा हिस्सा अब गैर-भाजपा राजनीति के संदर्भ में ही विकसित होता दिखाई देता है। सत्ता प्राप्ति की संभावनाएँ तो उसकी राजनीति में मौजूद हैं, किंतु राष्ट्र -निर्माण और संगठन-निर्माण की दीर्घकालिक दृष्टि अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है।
दूसरी ओर, समाजवादी परंपरा ने सत्ता और संगठन—दोनों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जाति-विमर्श को राजनीतिक रूप से मजबूत आधार देने के बावजूद संगठनात्मक शक्ति कमजोर रहने के कारण समाजवादी दल सत्ता से दूर होते गए। व्यवस्था परिवर्तन की वैचारिक स्पष्टता भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई। आज़ादी के बाद समाजवादी राजनीति अधिकतर प्रतिक्रियात्मक राजनीति बनकर रह गई, जबकि उसके भीतर रचनात्मक राजनीति की व्यापक संभावनाएँ मौजूद थीं। डॉ. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण ने इन संभावनाओं को दिशा देने का प्रयास किया था, लेकिन जिन वैचारिक और रचनात्मक कार्यक्रमों की कल्पना उनके पास थी, वे बाद की समाजवादी राजनीति में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के दौर में में विकसित नहीं हो सके।
फिर भी समाजवादी विरासत ने जाति-विमर्श को जिस व्यापक राजनीतिक आधार तक पहुँचाया, वह आज भी उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी है। लगभग सभी राजनीतिक दल चुनावों के समय किसी-न-किसी रूप में इस सामाजिक आधार का उपयोग करते हैं। सत्ता से उनकी दूरी कई बार केवल कुछ प्रतिशत वोटों के अंतर की होती है, लेकिन इसके बावजूद वैचारिक पुनर्निर्माण और संगठनात्मक विकास की दिशा में कोई गंभीर पहल दिखाई नहीं देती।
इसके साथ ही मैं उन राजनीतिक प्रयोगों को भी महत्वपूर्ण मानता हूँ, जो विभिन्न जनांदोलनों के बाद सामने आए। अन्ना आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी का उभार इसका प्रमुख उदाहरण है। इसी प्रकार आज तमिलनाडु में भी नई तरह की राजनीति विकसित होती दिखाई दे रही है। इन प्रयोगों में लोकलुभावन वादों की राजनीति प्रमुख रही है और बाद में उन्हीं वादों को पूरा करने के दबाव ने शासन पर अतिरिक्त बोझ भी डाला है। इन दलों में भी संगठनात्मक शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है। कई बार उनकी राजनीति एक निजी उद्यम (Private Enterprise) की तरह संचालित होती प्रतीत होती है। वैकल्पिक राजनीति के नाम पर उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति जनता की नाराजगी का लाभ उठाया और करिश्माई नेतृत्व के माध्यम से विशेषकर मध्यवर्ग को यह विश्वास दिलाया कि वे बहुत जल्दी व्यवस्था परिवर्तन कर देंगे। परिणामस्वरूप कल्याणकारी राजनीति और लोकलुभावन घोषणाओं के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास किया गया।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण के प्रति राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता आज कमजोर होती दिखाई देती है। ऐसे समय में सोनम वांगचुक के नेतृत्व में उभरता जनांदोलन एक नई दिशा प्रदान करता है। इस आंदोलन में नागरिकता-निर्माण का बोध है। साथ ही, विभिन्न राजनीतिक दलों पर सार्वजनिक दबाव (Public Pressure Group) बनाकर जवाबदेही तय करने की राजनीति की भी संभावनाएँ दिखाई देती हैं। इन संभावनाओं के केंद्र में गांधी और आंबेडकर की वैचारिक परंपरा का पुनर्स्मरण है और वर्तमान समय में सोनम वांगचुक उसी परंपरा के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उभरते दिखाई देते हैं।
चाहे शिक्षा का प्रश्न हो, पर्यावरण का मुद्दा हो या गरीबों के अधिकारों का सवाल—इन सबका समाधान केवल दलगत राजनीति में नहीं, बल्कि गैर-दलीय लोकतांत्रिक परंपराओं में भी निहित है। लोकशक्ति का निर्माण, जनांदोलनों की राजनीति, सामाजिक परिवर्तन और राजनीति के नैतिक पुनर्निर्माण का आह्वान—यही इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है।
सोनम वांगचुक की राजनीतिक उपस्थिति भले ही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और कॉकरोच आंदोलन जैसे घटनाक्रमों के बीच अधिक स्पष्ट होकर सामने आई हो, लेकिन अब उनकी उपस्थिति केवल किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं रह गई है। व्यवस्था परिवर्तन के सपने को नई दिशा और गति देने के लिए उनका सार्वजनिक हस्तक्षेप महत्वपूर्ण बन गया है। एक अर्थ में कहा जा सकता है कि गांधी हर कठिन दौर में अपने विचारों के नए प्रतीकों के माध्यम से समाज में पुनः उपस्थित होते हैं। आज के समय में सोनम वांगचुक उसी वैचारिक परंपरा के एक ऐसे प्रतीक बनकर उभरे हैं, जिन्होंने गांधी के विचारों को देश-निर्माण और नागरिक चेतना के प्रश्नों से एक बार फिर जोड़ने का प्रयास किया है।
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